Chhatrapati Sambhaji Ki Kahani: अपनों द्वारा विश्वासघात से छले गए थे संभा जी, कौन थे औरंगजेब के साथी गद्दार ?

Chhatrapati Sambhaji Maharaj History: संभाजी महाराज, जो कि शिवाजी के बड़े पुत्र और मराठा साम्राज्य के महान शासक थे, अपनों की दगाबाजी के शिकार हुए थे। उनके करीबी रिश्तेदारों ने ही औरंगजेब के साथ हाथ मिलाकर उन्हें कैद करवाने में मदद की थी।;

Written By :  Jyotsna Singh
Update:2025-04-04 11:56 IST

Chhatrapati Sambhaji Maharaj History (Photo Courtesy- Social Media)

Chhatrapati Sambhaji Ko Kisne Dhokha Diya Tha: भारतीय इतिहास में कई ऐसे शासक हुए जिन्होंने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए अपने ही लोगों की पीठ में छूरा घोंपा है और विश्वासघात कर विदेशी आक्रांताओं को भारत में पैर जमाने में मदद की है। उनकी गद्दारी के कारण ही कई स्वराज के लिए मर मिट जाने को तैयार भारतीय राजाओं को पराजय का सामना करने के साथ ही जान भी गवानी पड़ी है। इन्हीं की वजह से अंततः देश पर मुगलों और अंग्रेजों का शासन स्थापित हो गया। ऐसा ही एक किस्सा संभा जी महाराज से जुड़ा हुआ है।

असल में, मुगलों के भारत में आगमन के साथ स्वराज्य की स्थापना के लिए मराठों ने बड़े संघर्षों का सामना किया था और शिवाजी महाराज (Chhatrapati Shivaji Maharaj) की नीतियां और सिद्धांत उनके साम्राज्य के लिए आधार बने थे। लेकिन शिवाजी महाराज के निधन के बाद, मराठा साम्राज्य (Maratha Empire) के कुछ नेताओं ने गद्दारी की, जिसमें गणोजी शिर्के (Ganoji Shirke) और कान्होजी शिर्के (Kanhoji Shirke) का नाम प्रमुख है। दोनों ने अपनी स्वार्थी महत्वाकांक्षाओं के चलते औरंगजेब के साथ हाथ मिलाया, जिससे स्वराज्य को बड़ा धक्का पहुंचा। इन गद्दारों की गद्दारी और उनके अंत से जुड़े किस्से इस प्रकार हैं:-

बेहद नजदीकी रिश्तेदार थे गणोजी शिर्के और कान्हो जी (Ganoji Shirke Aur Kanho ji Kon The)

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

गणोजी शिर्के और कान्हो जी शिर्के छत्रपति संभाजी महाराज की पत्नी महारानी येसूबाई (Yesubai Bhonsale) के भाई थे। वे छत्रपति शिवाजी महाराज के समय में दाभोल क्षेत्र के प्रमुख थे। हालांकि, शिवाजी महाराज ने दाभोल पर कब्जा कर लिया था, फिर भी शिर्के भाइयों का अपने क्षेत्र और सत्ता के प्रति एक गहरा लगाव था। वे चाहते थे कि दाभोल की गद्दी पर वे स्वयं उत्तराधिकारी के रूप में बैठें। लेकिन उन्हें मराठा साम्राज्य में सूबेदार का पद मिला, जो वे स्वीकार नहीं कर पाए।

शिवाजी महाराज के निधन के बाद उनके बेटे छत्रपति संभाजी महाराज ने दाभोल को पुनः कब्जे में ले लिया। इसके बाद गणोजी और कान्हो जी शिर्के ने संभाजी महाराज से दाभोल की सत्ता को लेकर समझौता करने की कोशिश की। लेकिन संभाजी ने उन्हें नकारा। इस अस्वीकार के बाद, शिर्के भाइयों ने स्वराज्य के प्रति अपनी निष्ठा को त्यागते हुए, मुगलों से संपर्क किया और संभाजी महाराज के खिलाफ षड्यंत्र रचने लगे।

इस तरह की गणोजी और कान्होजी शिर्के ने गद्दारी- 1689 (Ganoji and Kanhoji Shirke Betrayal Story In Hindi)

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

1689 में, जब औरंगजेब ने मराठा साम्राज्य पर आक्रमण तेज किया, तब गणोजी और कान्होजी शिर्के ने उसे सांभा जी महाराज के बारे में महत्वपूर्ण भीतरी जानकारी दी। उन्होंने मुगल सेना के सरदार मकरब खान से मिलकर छत्रपति संभाजी महाराज को पकड़वाने में मदद की थी। मकरब खान ने उन्हें लालच दिया था कि अगर वे संभाजी महाराज को पकड़ने में मदद करते हैं, तो उन्हें दक्षिण का आधा राज्य दे दिया जाएगा। शिर्के बंधु पहले से ही शिवाजी महाराज के साथ कार्यरत थे। लेकिन वे सत्ता की लालच में आकर औरंगजेब से मिल गए। इसके परिणामस्वरूप, 1689 में ही सांभा जी महाराज को धोखे से गिरफ्तार कर लिया गया और औरंगजेब की सेना ने उन्हें बंदी बना लिया। सांभा जी को औरंगजेब ने कैद किया और उन्हें क्रूर यातनाएं दीं।

संभाजी महाराज को इस तरह दीं यातनाएं (Chhatrapati Sambhaji Maharaj Last Days And Death)

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

1 फरवरी, 1689 को छत्रपति संभाजी महाराज (Chhatrapati Sambhaji Maharaj) को औरंगजेब के सामने पकड़कर जंजीरों में बांधकर तुलापुर किले में ले जाया गया। वहां औरंगजेब ने उन्हें इस्लाम कुबूल करने के लिए कहा। लेकिन संभाजी महाराज ने इसका दृढ़ विरोध किया और अपने धर्म पर अडिग रहे। कहा जाता है कि औरंगजेब की सेना ने उन्हें लगभग 38 दिनों तक उल्टा लटका कर पीटा और उनकी आंखें निकाल दीं। इतना ही नहीं, उनके शरीर के अंगों को काटकर तुलापुर नदी में फेंका गया और 11 मार्च, 1689 को उनके सिर को तन से जुदा कर दिया गया। संभाजी महाराज का यह बलिदान स्वराज्य के प्रति उनके अडिग समर्पण और स्वतंत्रता के लिए लड़ने की उनकी भावना का प्रतीक था।

उनका शहादत भारतीय इतिहास में हमेशा एक प्रेरणा के रूप में याद किया जाएगा, लेकिन इस घटना के साथ जुड़ा एक और काला अध्याय भी है, जो मराठा साम्राज्य के भीतर विश्वासघात से संबंधित है। गणोजी और कान्हो जी शिर्के का विश्वासघात मराठा साम्राज्य के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है। उनके द्वारा रचा गया षड्यंत्र अंततः संभाजी महाराज के खिलाफ मुगलों के साथ मिलकर हुआ। शिर्के भाइयों का यह कदम न केवल उनके चरित्र को संदिग्ध बनाता है, बल्कि यह मराठा साम्राज्य के भीतर अंदरूनी संघर्ष को भी उजागर करता है।

गणोजी शिर्के और कान्हो जी शिर्के का अंत (Ganoji and Kanhoji Shirke Death)

छत्रपति संभाजी महाराज की मृत्यु (1689) के बाद मराठा साम्राज्य संकट में पड़ गया था और कई मराठा सरदारों ने मुगलों से हाथ मिला लिया था। गणोजी शिर्के और कान्होजी शिर्के भी उन्हीं में से थे, जिन्होंने मुगलों के पक्ष में कार्य किया और जिंजी, जहां छत्रपति राजाराम महाराज आश्रय लिए हुए थे, पर मुगलों का कब्जा कराने में मदद की। हालांकि, बाद में शिर्के भाइयों ने ही छत्रपति राजाराम महाराज को जिंजी से बाहर निकालने में सहायता की, जिससे औरंगजेब क्रोधित हो गया और उन्हें बंदी बना लिया गया।

1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद, मुगलों का नियंत्रण कमजोर पड़ा और शिर्के भाई मुक्त हो गए। इसके बाद उन्होंने छत्रपति साहू महाराज के शासन में फिर से मराठा साम्राज्य में शामिल होने के लिए भरसक कोशिश की। लेकिन उन्हें दोबारा वो सम्मान हासिल न हो सका। ये घटनाएं मराठा इतिहास में सत्ता संघर्ष, गद्दारी और वफादारी के उतार-चढ़ाव को दर्शाती हैं, जो उस दौर में काफी आम थे।

गणोजी और कान्होजी शिर्के का जीवन और उनका अंत यह सिद्ध करता है कि गद्दारी का कोई सम्मानजनक परिणाम नहीं होता। उनके विश्वासघात के परिणामस्वरूप, उनका नाम हमेशा इतिहास में गद्दारों के रूप में दर्ज रहेगा कि संभाजी का अंत गणोजी और कान्होजी शिर्के की दुष्टता और धोखेबाजी के कारण हुआ। ये घटनाएं हमें यह सिखाती हैं कि स्वराज्य की रक्षा के लिए निष्ठा और वफादारी की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

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