Sambhaji Ka Itihas: कट्टर हिंदुत्वादी सम्राट छत्रपति शिवाजी के उत्तराधिकारी शाहूजी प्रथम ने क्यों दी थी इस क्रूर मुगल शासक को श्रद्धांजलि, क्या थी इनकी नीति, जानिए वजह

Sambhaji Ka Itihas: क्या आप जानते हैं छत्रपति शिवाजी महाराज के पोते ने औरंगजेब को श्रद्धांजलि दी थी। लेकिन आखिर इसके पीछे क्या कारण था, आइए समझते हैं विस्तार से।;

Written By :  Jyotsna Singh
Update:2025-04-02 13:52 IST

Sambhaji Ka Itihas (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

Shahuji I Ki Kahani: मुगल साम्राज्य और मराठा शक्ति के बीच संघर्ष 17वीं और 18वीं शताब्दी में भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने एक स्वतंत्र हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की। लेकिन उनके उत्तराधिकारी शाहूजी प्रथम को मुगलों के प्रति एक अलग नीति अपनानी पड़ी। शाहूजी प्रथम ने औरंगजेब (Aurangzeb) की मृत्यु के उपरांत उसे श्रद्धांजलि देकर हिंदू शासकों के बीच हलचल मचा दी थी। यह श्रद्धांजलि उन्होंने अपने लगाव के चलते दी थी या उन्हें देने के लिए मजबूर किया गया था, जो तत्कालीन राजनीतिक और सैन्य परिस्थितियों का परिणाम था।

असल में छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु के बाद उनके वंशजों को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। शिवाजी महाराज के पोते शाहूजी प्रथम (बालाजी) का जीवन इसी संघर्ष की कहानी कहता है। शाहूजी प्रथम की औरंगजेब को दी गई श्रद्धांजलि और उनकी 18 वर्षों की कैद के ऐतिहासिक पहलुओं पर आइए विस्तार से नजर डालते हैं :-

शाहूजी प्रथम का जन्म और प्रारंभिक जीवन (Shahuji-1 Birth and Early Life)

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

शाहूजी प्रथम का जन्म 1682 में हुआ था। वे छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजी महाराज के बेटे थे। जब वे केवल सात वर्ष के थे, तब उनके पिता संभाजी को 1689 में मुगल बादशाह औरंगजेब ने पकड़कर क्रूरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद शाहूजी और उनकी मां येसूबाई को मुगलों द्वारा कैद कर लिया गया। शाहूजी प्रथम को मुगल दरबार में कैद किया गया था, जहां उन्होंने अपनी किशोरावस्था और युवावस्था बिताई। औरंगजेब ने शाहूजी को इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार, शिक्षित कराने का प्रयास किया। लेकिन वे अपनी मराठा पहचान को बनाए रखने में सफल रहे। इस दौरान मुगलों ने उन्हें प्रभावित करने की। कोशिश के चलते शाहूजी को एक रईस की तरह पालने की व्यवस्था की गई। उन्हें इस्लामी शिक्षा और फारसी भाषा का ज्ञान दिया गया।

औरंगजेब ने शाहूजी का उपयोग मराठों को कमजोर करने के लिए करना चाहा। शाहूजी ने अपनी कैद के दौरान ही मराठा राजनीति और मुगल रणनीति को समझना शुरू कर दिया था।

छत्रपति शिवाजी और औरंगजेब का संघर्ष (Conflict between Chhatrapati Shivaji and Aurangzeb)

छत्रपति शिवाजी (1630-1680) और मुगल सम्राट औरंगजेब (1618-1707) के बीच संघर्ष 1660 के दशक से शुरू हुआ। शिवाजी ने मुगल किलों और क्षेत्रों पर आक्रमण कर मराठा शक्ति को सुदृढ़ किया। 1665 में पुरंदर की संधि के बाद भी, शिवाजी और औरंगजेब के बीच तनाव बना रहा। 1674 में शिवाजी के राज्याभिषेक के बाद, मराठाओं ने स्वतंत्रता की घोषणा की।

शाहूजी प्रथम से जुड़ी मुगलों की कैद से स्वतंत्रता तक की कहानी

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजी (1657-1689) ने उनके बाद गद्दी संभाली। लेकिन औरंगजेब ने 1689 में पकड़कर उनकी हत्या कर दी। इसके बाद, औरंगजेब ने मराठा राज्य को समाप्त करने के लिए एक व्यापक सैन्य अभियान चलाया। इसी बीच, शाहूजी प्रथम (1682-1749) को मुगलों ने बंदी बना लिया था। औरंगजेब की मृत्यु (1707) के बाद शाहूजी को रिहा किया गया और मराठा साम्राज्य का नेतृत्व करने का अवसर मिला।

शाहूजी प्रथम ने क्यों दी थी मुगलों को श्रद्धांजलि (Why Did Shahuji-I Pay Tribute To The Mughals)

शाहूजी प्रथम ने भारत में अपनी जड़े मजबूत कर चुके मुगलों से निपटने के लिए एक व्यावहारिक नीति अपनाई, जिससे मराठा साम्राज्य को पुनर्जीवित किया जा सके। इन नीतियों के तहत शाहूजी को मराठा सत्ता पर अधिकार पाने के लिए अपने चाचा राजाराम की पत्नी ताराबाई के विरोध का सामना करना पड़ा। इस आंतरिक संघर्ष के कारण उन्होंने मुगलों के प्रति कूटनीतिक नीति अपनाई।

वहीं, रणनीति के तहत शाहूजी ने मुगलों के प्रति अस्थायी रूप से अधीनता स्वीकार की, ताकि मराठा शक्ति को पुनः संगठित किया जा सके। उन्होंने एक संधि के तहत मुगलों को श्रद्धांजलि दी और शासन में मराठों ने चौथ और सरदेशमुखी की वसूली की अनुमति प्राप्त की, जिससे मराठा आर्थिक शक्ति बढ़ी।

मुगलों के प्रति नीतिगत परिवर्तन (Policy Change Towards Mughals)

शाहूजी ने प्रारंभ में मुगलों के प्रति लचीली नीति अपनाई। लेकिन जैसे-जैसे मराठा शक्ति मजबूत होती गई, उन्होंने मुगल प्रभाव को कम करने की दिशा में कार्य किया। और एक मजबूत सैन्य संगठन तैयार किया। जिसका दूरगामी परिणाम भी मिला।

मराठाओं ने अपनी शक्ति को किया पुनः स्थापित

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य तेजी से कमजोर हुआ। शाहूजी प्रथम के नेतृत्व में मराठाओं ने अपनी शक्ति को पुनः स्थापित किया और 18वीं शताब्दी के मध्य तक दिल्ली सहित कई क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ाया। मराठाओं का जीत का बिगुल एक-एक कर मुगलों के किले ध्वस्त करता गया। जो कि इस प्रकार है -

1. मुहम्मद शाह (1719-1748) के शासनकाल में मराठा प्रभाव

मराठा सेनापति बाजीराव प्रथम के नेतृत्व में मराठाओं ने 1737 में दिल्ली तक आक्रमण किया।

2. 1761 तक मराठा विस्तार

पानीपत के तीसरे युद्ध (1761) से पहले, मराठा शक्ति ने उत्तरी भारत में प्रमुखता प्राप्त कर ली थी। शाहूजी प्रथम द्वारा औरंगजेब को श्रद्धांजलि देना तत्कालीन राजनीतिक और सैन्य परिस्थितियों का परिणाम था। यह नीति मराठाओं की दीर्घकालिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की दिशा में एक सामरिक निर्णय थी। 18वीं शताब्दी में मुगलों की शक्ति लगातार घटती गई और अंततः मराठाओं ने भारतीय राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाई। शाहूजी की नीति ने मराठाओं को मुगलों की निर्बलता का लाभ उठाने का अवसर प्रदान किया, जिससे वे भारत की प्रमुख शक्ति बन सके।

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