कोई सुने, न सुने अपनी बात कहते रहें

Hindi Language United Nations Status: हिंदी की स्थिति उस उदार मां जैसी है जिसके उदर से जन्में सारे बेटे स्वकेंद्रित, स्वार्थी और स्वाभिमानरहित हो चुके हैं ।

Update:2025-09-09 21:00 IST

Hindi in United Nations official language campaign (Image Credit-Social Media)

भारतीय गणराज्य के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदीजी की इस बार की विदेश यात्रा में हिंदी जन अभियान के प्रबल पैरोकार हमारे मार्गदर्शक जापान में हिंदी के केंद्र- पुरुष टोमियो मिजोकामी से मुलाकात हुई। श्री मिजोकामी हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ में आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के अभियान के प्रतिबद्ध और सशक्त स्वर हैं । मेरी इनसे विभिन्न देशों में पांच छह बार मुलाकात हो चुकी है । हिंदी को यूएनओ में आधिकारिक दर्जा का मान दिलाने की मांग करते - करते टोमियोजी बुजुर्ग हो गए , हमारी भी तरुणाई बीत गई , जवानी बीतने के कगार पर है लेकिन दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी भाषा होने के बावजूद हिंदी अपने सम्मान से वंचित है ।

हिंदी की स्थिति उस उदार मां जैसी है जिसके उदर से जन्में सारे बेटे स्वकेंद्रित, स्वार्थी और स्वाभिमानरहित हो चुके हैं । हम यदि राजनीतिक हैं , तो हम खुद सोचें कि हम जिस भाषा में वोट मांग कर अपने लिए शक्ति अर्जित करते हैं , उस भाषा के लिए हमने क्या किया ? मोदीजी से मेरी शिकायत है कि वे हिंदी में जरूर बोलते हैं पर हिंदी के लिए नहीं बोलते । हिंदी भाषी चैनलों पर मैंने कभी हिंदी के अधिकार और उसके प्रति हमारे कर्तव्य पर कोई डिबेट आज तक नहीं देखा । हमारी कोई लड़ाई अंग्रेजी से नहीं, हम हिंदी और सभी भारतीय भाषाओं के समर्थक हैं । हमारे सिनेमा के साथियों के लिए हिंदी सांस्कृतिक अस्मिता नहीं केवल कमाई का एक जरिया है, वरना वे भी हिंदी के लिए आवाज उठाते। अधिकारियों बात करना वक्त बर्बाद करने जैसा है, ज्यादातर अधिकारियों को अपनी सुविधाओं और मलाईदार पोस्टिंग के अलावा किसी से सरोकार नहीं है

जिस सूरज की आस हमें शायद वह भी आए

पर यह सोचें कि हमने खुद कितने दीप जलाए

मैंने टोमियोजी से एक बात सीखी है कि कोई आपकी बात सुने, न सुने , अपने देश, राष्ट्र, संस्कृति, समाज की बात कहते रहिए । गुरुदेव ने भी कहा है -

जोदि तोर डाक शुने केउ ना आशे तौबे ऐकला चौलो रे।

ऐकला चौलो, ऐकला चौलो, ऐकला चौलो, ऐकला चौलो रे!

जोदि केउ कौथा ना कौय, ओरे ओरे ओ औभागा,

तौबे पौरान खुले ओ तुई, मुखफुटे तोर मोनेर कौथा ऐकला बौलो रे!

हिंदी के लिए अभी कई यात्राएं और आवाजें उठानी शेष हैं । मुझे स्वीकारने में जरा भी हिचक नहीं कि राजनीतिक और दलीय व्यस्तताओं और अस्त व्यस्तताओं के कारण मैं हिंदी के अभियान को यथोचित समय और शक्ति नहीं दे पाया , इसीलिए तीन साल का अवकाश लिया है , अवकाश बढ़ भी सकता है ।

फिलहाल, हिंदी भाषी देश के प्रधानमंत्री से हिंदी की खुली पैरवी करने के जापान के विद्वान को साधुवाद .......।

( लेखक प्रख्यात समाजवादी चिंतक हैं।)

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