UCC VS Shah Bano Case: समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) और शाह बानो केस – एक ऐतिहासिक निर्णय, विवाद और वर्तमान परिप्रेक्ष्य

UCC VS Shah Bano Case: शाह बानो केस केवल एक कानूनी मामला नहीं, बल्कि भारतीय समाज की संवेदनशील धार्मिक और सामाजिक संरचना पर एक प्रश्नचिह्न था। यह मामला आज भी समान नागरिक संहिता की बहस में प्रमुख उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।;

Update:2025-04-05 08:08 IST

UCC VS Sha Bano Case Introduction: शाह बानो केस भारतीय न्याय व्यवस्था, महिला अधिकारों और धार्मिक कानूनों के बीच टकराव का प्रतीक बन चुका है। यह मामला 1985 में सामने आया और इसके प्रभाव आज तक महसूस किए जाते हैं। यह केस समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code - UCC) की मांग को भी प्रमुखता से उजागर करता है।

मामले की पृष्ठभूमि: शाह बानो बेगम इंदौर, मध्य प्रदेश की एक बुजुर्ग मुस्लिम महिला थीं। उनके पति, मोहम्मद अहमद खान, एक मशहूर वकील थे। शादी के 43 साल बाद, उन्होंने शाह बानो को मौखिक तलाक देकर अलग कर दिया। तलाक के बाद शाह बानो ने जीवनयापन के लिए भरण-पोषण की मांग की।

कानूनी प्रक्रिया: शाह बानो ने भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत अदालत में याचिका दायर की। यह धारा सभी नागरिकों पर लागू होती है, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, और इसमें भरण-पोषण का प्रावधान है यदि पत्नी खुद को भरण-पोषण में असमर्थ साबित करे।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: 1985 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा कि उन्हें उनके पति से भरण-पोषण मिलना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 125 धर्म से ऊपर है और मुस्लिम महिलाओं को भी इसका लाभ मिलना चाहिए।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और विवाद: इस फैसले से देशभर में बहस छिड़ गई। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कई कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने इसे शरीयत (इस्लामी कानून) में हस्तक्षेप बताया। मुस्लिम समुदाय के एक बड़े वर्ग ने सरकार पर दबाव डाला।

तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी, जिनकी सरकार को मुस्लिम वोट बैंक की चिंता थी, ने इस दबाव में आकर "मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986" पारित किया। प्रारंभिक व्याख्या के अनुसार यह कानून तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को केवल 'इद्दत' (तीन माह की अवधि) तक ही भरण-पोषण का अधिकार देता था। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान केवल इद्दत तक सीमित नहीं है और महिला को उचित और न्यायसंगत भरण-पोषण का अधिकार है।

पक्ष और विपक्ष:

पक्ष में: सुप्रीम कोर्ट, महिला अधिकार संगठन, समान नागरिक संहिता के समर्थक।

विपक्ष में: मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, कट्टरपंथी संगठन, और अंततः राजीव गांधी सरकार।

वर्तमान संदर्भ में समान नागरिक संहिता और भाजपा का रुख: शाह बानो केस के बाद समान नागरिक संहिता (UCC) की मांग और भी प्रबल हो गई। भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) लंबे समय से UCC को अपने प्रमुख मुद्दों में शामिल करती आई है। भाजपा का मानना है कि सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून होना चाहिए, चाहे वे किसी भी धर्म या जाति के हों।

भाजपा के प्रस्तावित और समर्थित प्रमुख मुद्दे जिन पर कानून बनाए गए या बनाने की इच्छा है:

समान नागरिक संहिता (UCC): सभी धर्मों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति के मामलों में एकसमान कानून लागू करना।

तीन तलाक कानून (2019): मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के उद्देश्य से तीन तलाक को आपराधिक कृत्य घोषित किया गया।

धारा 370 की समाप्ति (2019): जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा हटाई गई।

राम मंदिर निर्माण: अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण को लेकर दीर्घकालीन आंदोलन और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद निर्माण कार्य शुरू हुआ।

लव जिहाद और जनसंख्या नियंत्रण कानून (कुछ राज्यों में प्रस्तावित): धार्मिक आधार पर विवाह या जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कानून की मांग और प्रयास।

विपक्ष के तर्क इन कानूनों को लेकर:

UCC को लेकर: विपक्ष का कहना है कि यह देश की विविधता और धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला है। विभिन्न धर्मों की परंपराओं को एक समान कानून के तहत लाना संभव नहीं और इससे अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन हो सकता है।

तीन तलाक कानून: कुछ विपक्षी दलों का तर्क है कि इस कानून के तहत मुस्लिम पुरुषों को जेल भेजने का प्रावधान भेदभावपूर्ण है और यह केवल एक समुदाय को निशाना बनाता है।

धारा 370 हटाने पर: विपक्ष का कहना है कि यह फैसला बिना कश्मीरियों की सहमति के लिया गया, जो लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ है।

राम मंदिर मुद्दा: विपक्ष का आरोप है कि भाजपा ने इसे चुनावी मुद्दा बना लिया और धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल किया।

लव जिहाद कानून: विपक्ष इसे असंवैधानिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन मानता है। उनका कहना है कि यह कानून अंतरधार्मिक विवाहों के खिलाफ वातावरण बनाता है।

धर्मनिरपेक्षता, तुष्टीकरण की राजनीति और अधिकारों की व्यापक चर्चा: भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, जहाँ सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए गए हैं। लेकिन जब धार्मिक कानून और संविधान के प्रावधान टकराते हैं, तब सरकारों को संतुलन बनाना पड़ता है।

धर्मनिरपेक्षता (Secularism): यह सिद्धांत कहता है कि राज्य किसी भी धर्म का पक्ष नहीं लेगा। लेकिन व्यवहार में कई बार सरकारें धार्मिक समुदायों को खुश करने के लिए तुष्टीकरण (Appeasement) की नीति अपनाती हैं।

महिला अधिकार: शाह बानो केस और तीन तलाक कानून जैसे मामलों ने महिला सशक्तिकरण को बल दिया। इन कानूनों ने महिलाओं को धार्मिक परंपराओं के बंधनों से मुक्त कर न्याय की ओर बढ़ने का रास्ता दिखाया।

पुरुष अधिकार: आधुनिक कानूनी ढांचे में कभी-कभी यह आरोप लगता है कि पुरुषों के अधिकारों की अनदेखी होती है। उदाहरण के लिए, तीन तलाक कानून में जेल की सजा का प्रावधान कुछ लोगों को असमान और कठोर लगता है। इसके अलावा घरेलू हिंसा या झूठे यौन उत्पीड़न के मामलों में पुरुषों की रक्षा के लिए मजबूत सुरक्षा की मांग की जाती है। समान नागरिक संहिता लागू होने की स्थिति में पुरुषों के अधिकारों की भी निष्पक्ष सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

आगे की राह:

संतुलनपूर्ण विधायिका: कोई भी कानून बनाते समय धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्ति की स्वायत्तता और संविधान के मूल अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

समावेशी संवाद: समान नागरिक संहिता जैसे विषयों पर व्यापक स्तर पर सभी समुदायों, धर्मगुरुओं, महिला संगठनों और सामाजिक विशेषज्ञों से संवाद कर आम सहमति बनाई जानी चाहिए।

कानूनी साक्षरता और जागरूकता: नागरिकों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों की जानकारी देने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कानूनी साक्षरता अभियान चलाए जाने चाहिए।

लैंगिक समानता के साथ लैंगिक न्याय: केवल महिलाओं के अधिकारों की बात न कर पुरुषों और LGBTQ+ समुदाय के अधिकारों की भी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सम्मान: न्यायिक निर्णयों को राजनीतिक लाभ-हानि की दृष्टि से न देखकर सामाजिक सुधार के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।

शाह बानो केस केवल एक कानूनी मामला नहीं, बल्कि भारतीय समाज की संवेदनशील धार्मिक और सामाजिक संरचना पर एक प्रश्नचिह्न था। यह मामला आज भी समान नागरिक संहिता की बहस में प्रमुख उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

यह निर्णय और इसके बाद का राजनीतिक घटनाक्रम भारत में धर्मनिरपेक्षता, महिला अधिकारों, पुरुष अधिकारों और अल्पसंख्यक appeasement की नीति के बीच संतुलन पर सवाल उठाता है। साथ ही, यह यह दर्शाता है कि किस प्रकार एक ऐतिहासिक मामला आज के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

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