यूपीपीएससी भर्ती धांधली: 9 साल में 598 परीक्षाओं की जांच, 10 हजार बयान और 2 FIR, पर नतीजा अब भी सिफर
UPPSC Exam Scam: यूपीपीएससी भर्ती परीक्षाओं में कथित धांधली की सीबीआई जांच नौ साल बाद भी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंची। 598 परीक्षाओं और 10 हजार से अधिक अभ्यर्थियों के बयान के बावजूद सिर्फ दो FIR दर्ज हुईं।
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UPPSC Exam Scam: उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) की भर्ती परीक्षाओं में हुई कथित धांधलियों की सीबीआई जांच लगभग एक दशक बीतने के बाद भी किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है। वर्ष 2018 में बड़े वादों और उम्मीदों के साथ शुरू हुई इस जांच में जांच एजेंसी ने 598 परीक्षाओं की पड़ताल की, 10,000 से अधिक अभ्यर्थियों और टॉपर्स के बयान दर्ज किए, लेकिन नौ सालों में सिर्फ दो एफआईआर दर्ज करने के अलावा कोई प्रभावी गिरफ्तारी नहीं की जा सकी। नतीजा यह है कि लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ा यह बहुचर्चित मामला आज ठंडे बस्ते में नजर आ रहा है।
आंदोलन के बाद शुरू हुई थी जांच की कवायद
अप्रैल 2012 से मार्च 2017 के दौरान आयोजित भर्ती परीक्षाओं में व्यापक भ्रष्टाचार और पक्षपात के आरोप लगे थे। प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के नेतृत्व में प्रदेश भर में हुए बड़े छात्र आंदोलन के बाद, तत्कालीन सरकार के वादे के तहत जनवरी 2018 में सीबीआई ने आयोग परिसर में कदम रखा था। शुरुआती दौर में आयोग के तत्कालीन अधिकारियों द्वारा असहयोग और अदालती हस्तक्षेप के बाद जांच आगे बढ़ी।
जांच एजेंसी ने सबसे पहले पीसीएस-2015 में अनियमितताओं को लेकर प्राथमिकी दर्ज की। इसके बाद अपर निजी सचिव (एपीएस) भर्ती-2010 में धांधली के पुख्ता प्रमाण मिलने पर तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक प्रभुनाथ को नामजद करते हुए दूसरी एफआईआर दर्ज की गई। हालांकि, नामजदगी और सैकड़ों नोटिस जारी होने के बावजूद किसी भी मुख्य आरोपी के खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई नहीं हो पाई।
छह भर्तियों की पीई पर नहीं बढ़ी बात, छात्रों में गहराती हताशा
सीबीआई ने आयोग की छह अन्य प्रमुख भर्ती परीक्षाओं—जिनमें पीसीएस-2011, पीसीएस-2012 और चार सीधी भर्तियां शामिल हैं- में गड़बड़ी की आशंका पर प्राथमिक जांच (Preliminary Enquiry - PE) दर्ज की थी। विडंबना यह रही कि सालों बाद भी यह पीई नियमित केस (FIR) में तब्दील नहीं हो सकी।
जांच की कछुआ चाल से निराश प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के अध्यक्ष अवनीश पांडेय ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सीबीआई से मासिक प्रगति रिपोर्ट तलब करने और मामले में विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने की मांग की थी। प्रतियोगी छात्रों का कहना है कि इतने लंबे समय में कोई ठोस निष्कर्ष न निकलना पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है। वहीं, समिति के मीडिया प्रभारी प्रशांत पांडेय का मानना है कि समय-समय पर चुनावी सरगर्मियों के बीच यह मुद्दा फिर सुर्खियों में जरूर आता है, लेकिन नौ साल का लंबा इंतजार साफ बताता है कि ठोस कार्रवाई के अभाव में यह जांच सिर्फ कागजी कवायद बनकर रह गई है।