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बिहार चुनाव 2020: राजनीतिक जमीन तलाश रहे बाहुबली, तो कुछ जेल में काट रहे सजा

बिहार की राजनीति में अस्सी के दशक के पहले नेता चुनाव में बहुबलियों का सहयोग लेते थे। धीरे-धीरे इन तत्वों का राजनीति में दखल बढ़ने लगा, ये खुद राजनीति समझने लगे और नेताओं का मददगार बनने के बदले ये सीधे चुनाव मैदान में कूद पड़े।

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NewstrackBy Newstrack

Published on 3 Oct 2020 10:28 AM GMT

बिहार चुनाव 2020: राजनीतिक जमीन तलाश रहे बाहुबली, तो कुछ जेल में काट रहे सजा
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बिहार चुनाव 2020: राजनीतिक जमीन तलाश रहे बाहुबली, तो कुछ जेल में काट रहे सजा
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नील मणि लाल

पटना। बिहार चुनाव आते ही बाहुबली चर्चा में हैं। बहुत से बाहुबली आजकल या तो जेल में सजा काट रहे हैं या फिर अदालत द्वारा माफी के बाद राजनीतिक जमीन की तलाश में जुटे हैं। चुनावी नजरिये से देखें तो बिहार के करीब हर विधानसभा क्षेत्र में कोई न कोई स्थानीय दबंग प्रभावी है और सभी पार्टियां इनका सहयोग लेने को आतुर दिखतीं हैं। 2017 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद जो किसी न किसी मामले में आरोपित ठहरा दिए गए थे, उन्हें चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा दिया गया। ऐसे बाहुबलियों ने अपनी पत्नियों के सहारे सत्ता के गलियारे में पहुंचने की कोशिश की और कुछ कामयाब भी रहे।

बिहार में भागवत झा आजाद जब मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं पर नकेल कसने की कोशिश की, किंतु अपराधी-राजनेता गठजोड़ के आगे वे कामयाब न हो सके और उन्हें अपनी कुर्सी गंवाकर इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। इस बार विधानसभा चुनाव के लिए निर्वाचन आयोग ने और सख्त प्रावधान किए हैं। अब ये जिम्मेदारी मतदाताओं की है कि वे चुनाव में ऐसे अवांछित तत्वों को वोट न देकर एक अच्छी परम्परा बनायें।

बढ़ता गया दखल

बिहार की राजनीति में अस्सी के दशक के पहले नेता चुनाव में बहुबलियों का सहयोग लेते थे। धीरे-धीरे इन तत्वों का राजनीति में दखल बढ़ने लगा, ये खुद राजनीति समझने लगे और नेताओं का मददगार बनने के बदले ये सीधे चुनाव मैदान में कूद पड़े। बिहार में सबसे पहले कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में एक घोषित अपराधी दिलीप सिंह को टिकट दिया था। वे माननीय बन भी गए। ऐसे लोगों को राजनीतिक संरक्षण की जरूरत थी और राजनेताओं को चुनाव जीतने और अपना रसूख बरकरार रखने के लिए इनकी आवश्यकता थी।

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लिस्ट लम्बी है

बिहार में बहुत से ऐसे बाहुबली रहे जिनमें कोई विधानसभा का सदस्य बन गया तो कोई सांसद बनने में कामयाब रहा। इस सूची में सबसे चर्चित नाम है सीवान के मोहम्मद शहाबुद्दीन का। भाकपा-माले के खिलाफ गरीबों के मसीहा बनकर उभरे शहाबुद्दीन पर पहला मुकदमा 21 साल की उम्र में दर्ज हुआ। 1990 में जब उसने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की तो लालू प्रसाद की नजर पड़ी और उसको राजद में शामिल करा लिया। लगातार बढ़ते आपराधों के बावजूद लालू-राबड़ी के शासन काल में उसे गिरफ्तार करने की कोशिश तक नहीं की गई।

2001 में जब पुलिस ने गिरफ्तार करने की कोशिश की तो इतनी गोलीबारी हुई कि दो पुलिसकर्मियों समेत दस लोगों की जान चली गई लेकिन शहाबुद्दीन को गिरफ्तार नहीं किया जा सका। साहेब के नाम से मशहूर मोहम्मद शहाबुद्दीन आज तेजाब हत्याकांड व चश्मदीद की हत्या में संलिप्तता के आरोप में दिल्ली की तिहाड़ जेल में सजा काट रहा है। लेकिन लालू प्रसाद के चहेते रहे शहाबुद्दीन का रसूख आज भी बरकरार है तभी तो राजद उनकी पत्नी हिना शहाब को चुनावों में टिकट देने से गुरेज नहीं करता। शहाबुद्दीन दो बार विधायक और चार बार संसद रह चुका है। इसी इलाके में एक और बाहुबली अजय सिंह है जिसकी पत्नी कविता सिंह सीवान से सांसद है। कविता सिंह ने हिना शहाब को पराजित कर ही लोकसभा का चुनाव जीता।

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प्रभुनाथ सिंह

मशरख (सारण) विधानसभा क्षेत्र से 1985 में जीत दर्ज करने वाले सीमेंट कारोबारी रहे प्रभुनाथ सिंह भी ऐसे ही तत्व हैं जिन्हें कभी नीतीश कुमार तो कभी लालू प्रसाद यादव का साथ मिलता रहा है। 1990 में जनता दल के टिकट पर चुने गए किंतु 1995 में जब वे अपने ही शागिर्द अशोक सिंह से चुनाव हार गए तो उसे बम से उड़वा दिया। अशोक की हत्या में प्रभुनाथ सिंह और उनके भाई दीनानाथ सिंह को आरोपित किया गया था। 1998 में समता पार्टी के टिकट पर प्रभुनाथ सिंह महाराजगंज सीट से सांसद चुने गए।

2004 में जदयू के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत गए। 2012 में प्रभुनाथ राजद में शामिल हो गए और 2013 में इसी सीट से लोकसभा का उपचुनाव जीता। प्रभुनाथ सिंह का हाल ये रहा कि इनके भाई केदारनाथ सिंह बनियापुर (सारण), बेटे रणधीर सिंह छपरा (सारण), समधी विनय सिंह सोनपुर (सारण) और बहनोई गौतम सिंह मांझी (सारण) से विधायक रह चुके हैं। विधायक अशोक सिंह की हत्या के आरोप में भाइयों समेत दोषी पाए जाने पर वे अभी आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं।

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अनंत सिंह

मोकामा के विधायक अनंत सिंह उर्फ़ छोटे सरकार अपने भाई दिलीप सिंह की हत्या के बाद राजनीति में आए और 2005 में पहली बार विधायक बने। अनंत सिंह को कभी नीतीश कुमार का करीबी माना जाता था। 2015 में जदयू से रिश्ते तल्ख होने के बाद अनंत सिंह ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। अनंत पर रंगदारी, हत्या व अपहरण के 30 से अधिक मामले दर्ज हैं और एके-47 बरामदगी के मामले में वे फिलहाल जेल में बंद हैं।

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आनंद मोहन

आनंद मोहन 1990 में पहली बार सहरसा से विधायक बने। उन दिनों लालू यादव के काफी करीबी रहे पप्पू यादव से इनकी खासी अदावत रही। ये दो बार सांसद बनने में भी कामयाब रहे। बाद में इनकी पत्नी लवली आनंद भी सांसद बनीं। गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैया की हत्या में आनंद मोहन उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। पत्नी लवली आनंद अब भी राजनीति में सक्रिय हैं और हाल में ही अपने बेटे चेतना आनंद के साथ राजद की सदस्यता ली है।

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पप्पू यादव

कभी लालू के खासमखास रहे राजेश रंजन यादव उर्फ पप्पू यादव मधेपुरा जिले की सिंहेश्वर विधानसभा क्षेत्र से 1990 में पहली बार विधायक बने। कई बार वे सांसद भी बने। 2015 में पप्पू को राजद से बाहर कर दिया गया जिसके बाद उन्होंने जन अधिकार पार्टी की स्थापना की। करीब 15 से ज्यादा मामलों में आरोपित पप्पू यादव को पूर्णिया के मार्क्सवादी विधायक अजीत सरकार की हत्या में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया। पप्पू यादव इस बार के विधानसभा चुनाव में नीतीश सरकार को शिकस्त देने की कोशिश में जुटे हैं।

इनके अलावा सांसद रहे सूरजभान सिंह (बेगूसराय) व रामा सिंह (वैशाली), विधायक रहे सुनील पांडेय (भोजपुर), राजन तिवारी (चंपारण), मुन्ना शुक्ला (वैशाली), सुरेंद्र यादव (जहानाबाद) एवं बीमा भारती के पति अवधेश मंडल (पूर्णिया), पूनम यादव के पति रणवीर यादव (खगड़िया), गुड्डी देवी के पति राजेश चौधरी (सीतामढ़ी) व गोपालगंज के कुचायकोट से निवर्तमान जदयू विधायक अमरेंद्र पांडेय भी उन बाहुबलियों में शुमार हैं, जिनकी दंबगई आज भी अपने-अपने इलाके में कायम है।

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