अंधेरे से बिगड़ जाता है जिस्म और दिमाग का सिस्टम

गुफा में प्राकृतिक रोशनी के अभाव में सभी लोगों की आंतरिक घड़ी गड़बड़ा गई। दिन और रात का पता नहीं चलने से समय का आभास खत्म हो गया। इसका असर ये हुआ कि कुछ लोग 48 घंटे के क्रम में सोने-जागने लगे।

लखनऊ: 1962 में फ्रेंच जियोलॉजिस्ट मिशेल सिफ्रे भूमिगत हो गए। मिशेल जानना चाहते थे कि सतह से नीचे की अंधेरी दुनिया में रहने पर इनसान पर क्या प्रभाव पड़ेगा। सो खुद मिशेल और उनके कुछ साथी अलग-अलग अंधेरी गुफाओं में उतरे। इनके पास न कोई घड़ी थी और न कोई कैलेंडर। सब अकेले-अकेले थे। बस ऊपर बैठी रिसर्च टीम रोजाना एक बार इन सबसे संपर्क करती थी। गुफाओं में एक बल्ब लगाया गया था जो सोते समय बंद हो जाता था और उठने के समय जल जाता था।

प्राकृतिक रोशनी के अभाव में आंतरिक घड़ी गड़बड़ा गई

अकेलेपन और अंधेरे का असर जानने के क्रम में मिशेल को ये पता लगा कि इनसानों के भीतर एक बायोलॉजिकल घड़ी होती है। ये एक आंतरिक मैकेनिज्म है जो अन्य चीजों के अलावा शरीर के सोने जागने को कंट्रोल करता है। गुफा में प्राकृतिक रोशनी के अभाव में सभी लोगों की आंतरिक घड़ी गड़बड़ा गई।

ये भी देखें: मोमोज का इतिहास! जानें कब-कैसे और कहां से हुई इसकी शुरुआत?

दिन और रात का पता नहीं चलने से समय का आभास खत्म हो गया। इसका असर ये हुआ कि कुछ लोग 48 घंटे के क्रम में सोने-जागने लगे। यानी 36 घंटे जागना और 12 घंटे सोना। जब शोधकर्ताओं ने इनको बताया कि प्रयोग खत्म हो गया है तो कुछ को काफी हैरानी हुई क्योंकि उन्हें लग रहा था कि अभी तो कई हफ्ते या महीने गुफा में रहना बाकी है।

मिशेल सिफ्रे के शोध ने क्रोनोबायोलॉजी की नींव रखी जो ये बताती है कि अंधेरे का हमारे शरीर और मस्तिष्क पर क्यों गहरा असर पड़ता है।
अंधेरे की समस्या सर्दियों के ठंडे और छोटे दिनों में वातावरण का अंधेरा हमारे भीतर के खराब मूड से मैच करता दिखता है। आधुनिक विज्ञान ने साबित किया है कि अमेरिकी लोगों के लिए जनवरी और फरवरी सबसे खराब महीने होते हैं। इन महीनों में 6 फीसदी लोग सीजनल इफेक्टिव डिसऑर्डर (एसएडी) से पीडि़त होते हैं। एकाग्रता में कमी, ज्यादा सोना, हताशा और वजन बढऩा एसएडी के लक्षण हैं।

रोशनी का प्रभाव

आंखों के रास्ते रोशनी भीतर जाने पर हाइपोथैलेमस ग्रंथि का एक हिस्सा जागृत हो जाता है और हमारी आंतरिक घड़ी सक्रिय हो जाती है। फिर ये मस्तिष्क के अन्य हिस्सों को सिग्नल भेजती है जिससे शरीर जागना शुरू हो जाता है। यदि अंधेरे और रोशनी को बदलते क्रम का सिग्नल मिलता रहे तो 24 घंटे तक आंतरिक घड़ी सही रहती है।

यदि ये सूचना न मिले तो घड़ी का 24 घंटे का क्रम बिगड़ ही जायेगा। अधिकांश लोगों के लिए इसका मतलब होगा कि वे लगातार देरी से जागते रहेंगे।

ये भी देखें: हॉलीवुड की राधा रानी: इनकी खूबसूरती के आगे फेल हैं बॉलीवुड एक्ट्रेस

‘सिक बिल्डिंग सिन्ड्रोम’

आप दुनिया के किसी कोने में रहते हों, ये तय है कि आपके वातावरण में व्याप्त अंधेरे का असर आपकी सेहत और व्यवहार पर पड़ सकता है। अर्किटेक्चर में इसे ‘सिक बिल्डिंग सिन्ड्रोम’ कहते हैं। पाया गया है कि किसी इमारत के अंधेरे वाले हिस्से में रहने और काम करने वाले कर्मचारियों की सेहत काफी प्रभावित होती है।

रिसर्च में पाया गया है कि किसी कक्षा में खिडक़ी के पास बैठने वाले छात्रों की अपेक्षा अंधेरे या कम रोशने वाले हिस्से में बैठने वाले छात्रों का प्रदर्शन खराब होता है। 2013 के एक अध्ययन में पाया गया है कि अंधेरे वातावरण से लोगों में झूठ बोलने और अनुचित व्यवहार करने की प्रवृत्ति आ जाती है।