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किंगमेकर थे बाला साहेब,आवाम का था बेहिसाब साथ, कभी नहीं लिया सत्ता का स्वाद

महाराष्ट्र की राजनीति को नई दिशा देने वाले बाल ठाकरे का जन्म 23 जनवरी 1926 को केशव सीताराम ठाकरे की  दूसरी संतान के रुप में हुई।  उनके पिता लेखक थे और मराठी भाषी लोगों के लिए अलग राज्य की मांग करने वाले आंदोलन ‘संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन’ के सक्रिय कार्यकर्ता भी थे

suman
Updated on: 17 Nov 2019 4:50 AM GMT
किंगमेकर थे बाला साहेब,आवाम का था बेहिसाब साथ, कभी नहीं लिया सत्ता का स्वाद
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जयपुर: महाराष्ट्र की राजनीति को नई दिशा देने वाले बाल ठाकरे का जन्म 23 जनवरी 1926 को केशव सीताराम ठाकरे की दूसरी संतान के रुप में हुई। उनके पिता लेखक थे और मराठी भाषी लोगों के लिए अलग राज्य की मांग करने वाले आंदोलन ‘संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन’ के सक्रिय कार्यकर्ता भी थे। वो असल जिंदगी में एक बेहतरीन कार्टुनिस्ट थे, बाद में महाराष्ट्र की राजनीति के संचालक बन गए।और मराठो के भगवान।

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शिवसेना का गठन

महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा बदलने वाले बाल साहेब अपने दोस्तों और विरोधियों को हमेशा यह मौका देते थे कि वह उन्हें राजनीतिक रूप से कम समझे ताकि वह मंजिल तक पहुंच कर अपने काम को अंजाम दें। वे कभी को जिम्मेदारी ना लेकर दूसरों के देना पसंद करते थे उनकी भूमिका किंगमेकर की तरह थी। थे। ठाकरे ने 19 जून 1966 को शिवसेना की स्थापना की और उसके बाद मराठियों की तमाम समस्याओं को हल करने की जिम्मेदारी अपने सिर ले ली। उन्होंने मराठियों के लिए नौकरी की सुरक्षा मांगी, गुजरात और दक्षिण भारत के लोगों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा था।

खुद को अडोल्फ हिटलर का प्रशंसक बताने वाले बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र में मराठियों की एक ऐसी सेना बनाई, जो कपड़ा मिलों और अन्य औद्योगिक इकाइयों में मराठियों को नौकरियां मिल सके। उनके इन्हीं प्रयासों ने उन्हें ‘हिंदू हृदय सम्राट’ बना दिया। हालांकि बाला साहेब ने खुद कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन शिवसेना को एक पूर्ण राजनीतिक दल बनाने के बीज बोए जब उनके शिव सैनिकों ने बॉलीवुड सहित विभिन्न उद्योगों में मजदूर संगठनों पर नियंत्रण करना शुरू किया। शिवसेना ने जल्द ही अपनी जड़ें जमा लीं और 1980 के दशक में मराठी समर्थक मंत्र के सहारे बृहन्मुंबई नगर निगम पर कब्जा कर लिया। भाजपा के साथ 1995 में गठबंधन करना ठाकरे के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मौका था और इसी के दम पर उन्होंने पहली बार सत्ता का स्वाद चखा। वे खुद कहते थे कि वे ‘रिमोट कंट्रोल’ से सरकार चलाते हैं। हालांकि उन्होंने मुख्यमंत्री का पद कभी नहीं संभाला। बहुत से लोगों का मानना है कि 1993 के मुंबई विस्फोटों के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों में शिव सैनिकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके चलते सेना-भाजपा गठबंधन को हिंदू वोट जुटाने में मदद मिली।

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लोगों से ज्यादा मिलना पसंद नहीं

मराठी मानुस’ की नब्ज को बहुत अच्छी तरह समझने का हुनर रखने वाले बाल ठाकरे इस कहावत के पक्के समर्थक थे कि ज्यादा करीबी से असम्मान पनपता है और इसीलिए उन्होंने सदा खुद को सर्वश्रेष्ठ बताया। अपने समर्थकों से ज्यादा घुलना-मिलना और करीबी उन्हें पसंद नहीं थी और वे अपने बेहद सुरक्षा वाले आवास ‘मातोश्री’ की बालकनी से अपने समर्थकों को ‘दर्शन’ दिया करते थे। मुस्लिम समुदाय को अकसर निशाने पर रखने वाले बाल ठाकरे ने एक बार मुस्लिम समुदाय को ‘कैंसर’ तक कह डाला था।

कट्टर हिंदूवादी

ठाकरे हमेशा से ही हिन्दू नीति पर काम करते रहे। उनके हर भाषण में हिन्दुओं की बात होती थी। किसी भी धर्म से पहले हिन्दु धर्म की बात करते थे। हालांकि शिवसेना के लोगों का कहना है कि ठाकरे कभी भी मुस्लिम विरोधी नहीं रहे। वो बस उन मुस्लमानों के विरोध में खड़े होते थे जो पाकिस्तान का साथ देते थे। ठाकरे हमेशा से ही हिन्दू नीति पर काम करते रहे। उनके हर भाषण में हिन्दुओं की बात होती थी। किसी भी धर्म से पहले हिन्दु धर्म की बात करते थे। हालांकि शिवसेना के लोगों का कहना है कि ठाकरे कभी भी मुस्लिम विरोधी नहीं रहे। वो बस उन मुस्लमानों के विरोध में खड़े होते थे जो पाकिस्तान का साथ देते थे।

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नहीं मानते थे उद्धव को वारिस

जिस आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय कहा जाता है बाल ठाकरे उसके समर्थक थे। उन्होंने इस दौरान खुलेआम इसके पक्ष में बयान दिए। बाल ठाकरे स्वभाविक वारिस बेटे उद्धव को नहीं , भतीजे राज को देखते थे। लोगों को उम्मीद थी कि ठाकरे कमान राज को हीं सौंपेंगे, लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। इसके बाद राज ने शिवसेना छोड़ अपनी पार्टी बनाई। बाल ठाकरे का फिल्मी दुनिया से गहरा नाता रहा है। संजय दत्त जब टाडा कानून के तहत मुश्किल में थे, उस मुश्किल वक्त में उन्हें बाल ठाकरे से हर संभव मदद मिली। दिलीप कुमार और बाल ठाकरे के बीच एक वक्त गहरी दोस्ती थी।ठाकरे ने एक इंटरव्यू में कहा था कि दिलीप उनके साथ शाम की बैठकी लगाते थे लेकिन बाद में पता नहीं क्या हुआ कि वो मुझसे दूर चले गए।

अंतिम यात्रा

जीवन के अंतिम दिनों में श्री ठाकरे के स्वास्थ्य में गिरावट आती रही जिस कारण 25 जुलाई 2012 को मुंबई के लीलावती अस्पताल में उन्हें भर्ती कराया गया था। 14 नवम्बर 2012 को अस्पताल में श्री ठाकरे ने खाना-पीना त्याग दिया था. फिर उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया और बाद में उनका इलाज घर पर हुआ और उन्हें प्राणवायु आक्सीजन के सहारे जिन्दा रखा गया। उनके चाहने वालो की मुंबई के मातोश्री घर के अंदर व बाहर सैकड़ो लोगों की लम्बी लाइने लगी होती थी। सब सुविधाएँ होने के बाद भी 17 नवम्बर 2012 को मुंबई मातोश्री में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी अंतिम यात्रा में लाखों की संख्या में लोग शामिल हुए थे।

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