भाजपा के प्रभुत्व वाले इलाकों में भी पिछड़े मनोज सिन्हा

भाजपा के प्रभुत्व वाले इलाकों में भी पिछड़े मनोज सिन्हा

रजनीश/दुर्गेश मिश्र
गाजीपुर: 2019 के लोकसभा चुनाव में जिस सांसद की हार पर सोशल मीडिया पर सर्वाधिक पोस्ट लिखे गए वह सांसद है गाजीपुर लोकसभा सीट पर चुनाव हारने वाले मनोज सिन्हा। इस पोस्ट में लोगों ने मन का गुबार निकालते हुए यहां तक लिख डाला कि जातीय समीकरण के आगे विकास हार गया। वैसे मनोज सिन्हा ने पिछला लोकसभा चुनाव भी कड़े मुकाबले के बाद जीता था। 2014 में सिन्हा ने अपनी प्रतिद्वंद्वी सपा प्रत्याशी शिवकन्या कुशवाहा को मात्र 30 हजार वोटों से हराया था। हालांकि अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने जिले में विकास के तमाम काम कराए। रेल राज्यमंत्री के रूप में काम करते हुए उनके विकास कार्यों से उनकी हार पर गुबार निकालने वालों की कमी नहीं है। उन्हें गठबंधन प्रत्याशी अफजाल अंसारी के हाथों शिकस्त झेलनी पड़ी।

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यदि गाजीपुर लोकसभा सीट के विधानसभा क्षेत्रों की बात करें तो इस संसदीय क्षेत्र में कुल पांच विधानसभा क्षेत्र गाजीपुर सदर, जंगीपुर, सैदपुर, जखनिया और जमानिया के मतदाता सांसद चुनते हैं। इनमें जंगीपुर और सैदपुर में समाजवादी पार्टी के विधायक हैं तो जखनिया में सुभासपा के विधायक, जबकि गाजीपुर सदर और जमानिया विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के विधायक हैं। मतगणना पर नजर डालें तो केंद्रीय रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा सपा-बसपा गंठबंधन प्रत्याशी अफजाल अंसारी से हर जगह पीछे रहे हैं। मतगणना के पहले चरण में ही सिन्हा अंसारी से करीब चार हजार से अधिक वोटों से पीछे चल रहे थे और 24वें चरण के आते-आते यह आंकड़ा एक लाख से अधिक मतों को पार कर गया।

चौंकाने वाली सच्चाई तो यह रही गाजीपुर सदर की भाजपा विधायक संगीता बलवंत के क्षेत्र में ही मनोज सिन्हा को किसी बूथ पर दो तो किसी पर पांच वोट मिले। गाजीपुर सदर विधानसभा के बूथ संख्या 318 की बात करें तो यहां गठबंधन प्रत्याशी को 550 वोट मिले हैं तो भाजपा को महज पांच वोट मिले हैं। इसी तरह बूथ संख्या 10 पर अफजाल अंसारी को 340 वोट मिले तो मनोज को महज 12 वोट मिले हैं। कमोबेश ऐसा ही हाल सदर विधनसभा के सभी बूथों का रहा। किसी बूथ पर मनोज को अफजाल से अधिक वोट नहीं मिला।

जिस जंगीपुर को बाजार दिया वहीं नहीं मिला वोट
गाजीपुर जनपद की सबसे बड़ी सब्जी मंडी को जिस मनोज सिन्हा ने खाड़ी के देशों से जोड़ा, उसी जंगीपुर विधानसभा क्षेत्र में उन्हें वोट नहीं मिला। यहां के भी वोट पोल का आंकड़ा सदर विधानसभा क्षेत्र के पोलिंग स्टेशनों पर पोल हुए वोटों के जैसा ही रहा। जंगीपुर के बूथ संख्या सात में गठबंधन प्रत्याशी को 338 तो भाजपा उम्मीदवार को महज 24 वोट मिले। इसी तरह बूथ संख्या 394 में अफजाल को 440 तो मनोज को मात्र 24 वोटों से ही संतोष करना पड़ा। कुछ यही हाल जखनिया और सैदपुर विधानसभा क्षेत्रों का भी रहा जहां मनोज सिन्हा निरंतर पिछड़ते गए और अंत में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

ले डूबा अत्यधिक उत्साह
जिला भाजपा के कुछ पुराने पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि गाजीपुर के विकास पुरुष को वर्करों का अत्यधिक उत्साह ही ले डूबा। नाम न प्रकाशित किए जाने पर जिला भाजपा कार्यालय के वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि नए कार्यकर्ताओं के उत्साह में पुराने कार्यकर्ताओं से संपर्क स्थापित नहीं किया गया जो हार के प्रमुख कारणों में से एक है। उनका कहना है कि सिन्हा ने गाजीपुर में विकास तो करवाया है। यह किसी से छिपा नहीं है। गाजीपुर का नाम अब देश के नक्शे पर दर्ज हो गया है। यह बात विपक्षी दलों की लीडशिप भी मानती है। कहीं न कहीं चूक हुई है। इसकी समीक्षा की जाएगी और गलतियों को सुधारने का प्रयास किया जाएगा।

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जातीय फैक्टर ने डुबाई नाव
पार्टी के पूर्व सहकारिता प्रकोष्ठ के जिला अध्यक्ष और वर्तमान में केंद्रीय कार्यालय गाजीपुर के प्रभारी गिरजाशंकर पाडेय सिन्हा के हार का कारण जातीय फैक्टर मानते हैं। उनका कहना है कि 2019 का चुनाव 2014 के चुनाव से एकदम अलग रहा। इस चुनाव में देशभर में जाति आधारित राजनीति खत्म हो गई,लेकिन गाजीपुर की राजनीति अभी भी जातियों में उलझी हुई है जिसका सबसे बड़ा उदाहरण मनोज सिन्हा के हार के रूप में सामने है। पांडे ने कहा कि जिस गाजीपुर में जल, सड़क, रेल और हवाई सेवा की सुविधा मिली उसी गाजीपुर में मनोज की हार ने भाजपा को ही नहीं बल्कि गाजीपुर की तरक्की पसंद लोगों को भी अचंभित कर दिया। हर बूथों की समीक्षा कर कमियों को दूर किया जाएगा।
भाजपा एमएलसी विशाल सिंह चंचल ने भी सिन्हा के हार का कारण जातीय राजनीति बताया। उन्होंने कहा कि जाति के आगे विकास हार गया। सदर विधायक संगीता बलवंत और जमानियां की भाजपा विधायक सुनीता सिंह ने भी जातीय राजनीति को ही हार का कारण बताया। सुभासपा के अध्यक्ष और प्रदेश सरकार में मंत्री रहे ओमप्रकाश राजभजर की बगावत के सवाल पर चंचल ने कहा कि प्रदेश कोई असर नहीं पड़ा है। गाजीपुर में थोड़ा बहुत ही असर दिखा।

गाजीपुर के विकास में नहीं आएगी कमी
हार के बाद मनोज सिन्हा ने कहा कि कहीं न कहीं चूक जरूर हुई है। हार के कारणों की समीक्षा की जाएगी और कमियों को दूर किया जाएगा। रही गाजीपुर के विकास की बात तो उसमें कोई कमी नहीं आने दूंगा क्योंकि मैं पहले गाजीपुर का बेटा हूं, राजनेता या मंत्री बाद में। राजनीति में तो हार-जीत लगी रहती है।

राजपूतों की नाराजगी भी बनी हार का कारण
भाजपा के कद्दावर नेता मनोज सिन्हा की हार के कारण प्रमुख कारणों में भितरघात और राजपूत वर्ग के वोटरों की नाराजगी भी एक कारण है। सिन्हा पर भी जातीय राजनीति का आरोप हमेशा से लगता आ रहा है। इसका उल्लेख अपना भारत ने अपने 29 अप्रैल के अंक में ही कर दिया था। इसमें मनोज सिन्हा के सामने अपनों की ही चुनौतियों का जिक्र करते हुए बताया गया था कि 2019 के चुनाव में राजपूतों का वोट मनोज से कट सकता है। राजपूतों का आरोप था कि सिन्हा केवल भूमिहारों की ही बात सुनते हैं। इस चुनाव में सिन्हा राजपूतों का समर्थन पाने में नाकाम रहे।
गाजीपुर जनपद में भूमिहारों और राजपूतों के राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई कोई नहीं हैं। जानकारों का कहना है कि इन दोनों जातियों की जंग उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय कमलापति त्रिपाठी के जमाने से रही है। यह दौर था 1971 का । तब कांग्रेस की सरकार थी। उस दौर में गाजीपुर से कांग्रेस विधायक होते थे। वशिष्ठ नारायण शर्मा भूमिहार जाति के थे। उस जमाने में भी राजपूत वर्ग उन पर जातिवाद का आरोप लगाता रहा। यही नहीं गाजीपुर में हमेशा केंद्र के उलट सांसद होता रहा है। यानी जब केंद्र नेहरू की सरकार होती थी तो यहां से कम्युनिस्ट के सरयू पांडे सांसद बनकर जाते थे। वैसे इस बार यह तिलिस्म टूटा है।