लाइलाज सिसकियां, बेकाबू चीत्कार नाम ‘चमकी’

Published by seema Published: June 21, 2019 | 4:21 pm
Modified: June 21, 2019 | 4:26 pm

लाइलाज सिसकियां, बेकाबू चीत्कार नाम 'चमकी

किसी को कुछ नहीं पता। वर्षों से इसी सीजन में अजीब बीमारी के साथ बच्चे आते हैं। लेटे-लेटे शरीर उछलता है। चमक की तरह। सो, चमकी नाम रख दिया। इलाज कुछ नहीं। वक्त मिला तो ग्लूकोज-सोडियम चढ़ाया। जान बचनी होगी तो बची, वरना परिवार वालों की सिसकियां बेकाबू चीत्कार में बदल कर अस्पताल से बाहर। मुजफ्फरपुर का दुर्भाग्य शाही लीची के साथ वर्षों से आ रहा, मगर राज्य से केंद्र तक की सरकार आश्वासन की ‘चमकी’ ही दिखाती रही है अब तक।

शिशिर कुमार सिन्हा
मुजफ्फरपुर: एक बेड, दो बच्चे। कहीं-कहीं तीन भी। सिर इधर-उधर। इसलिए, ताकि परिजन अपने-अपने बच्चों के सिर और शरीर का कंट्रोल कर सकें। सिसकियों के साथ सिर को सहलाती मां-दादी और कमर-छाती की चमक पर कंट्रोल करती दीदियां-चाचियां। बाकी पुरुष सदस्य डॉक्टर-नर्स को ढूंढते या अर्जी लगाते, दुहाई देते। बिहार की राजधानी पटना से महज 72 किलोमीटर दूर मुजफ्फरपुर के श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (एसकेएमसीएच) में पिछले 15 दिनों से लगभग यही सीन है। किसी दिन बहुत ज्यादा सिसकियां, चीख-पुकार तो किसी दिन कुछ कम। एक पखवाड़े से चल रही त्रासदी के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 18 जून को अस्पताल में भर्ती बच्चों को देखने पहुंचे तो उनके पहुंचने के ठीक पहले तीन बच्चों ने दुनिया को अलविदा कह दिया और एक ने तो उनके आसपास रहते ही दम तोड़ दिया। प्रदेश के मुखिया के पास कहने को आश्वासन के शब्द और भविष्य की सुविधा के लिए वायदे तो थे, नहीं था तो इन बच्चों को असमय मौत से बचाने का कोई रास्ता। रास्ता, धरती के भगवान कहे जाने वाले डॉक्टरों के पास भी नहीं। सोडियम-ग्लूकोज चढ़ाने से जिन बच्चों की जिंदगी बचनी रही बची, जिन्हें यह भी देर से मिला, वह पूरे सिस्टम के इलाज का सबक देकर चले गए।

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ड्रिप भरोसे चमत्कार का इंतजार
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 18 जून को उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी और मुख्य सचिव दीपक कुमार के साथ मुजफ्फरपुर में जब कथित चमकी बुखार से पीडि़त बच्चों को देखकर गए तो एक पखवाड़े के अंदर इससे मरने वाले बच्चों की संख्या 146 तक पहुंच चुकी थी। सिर्फ उस दिन 28 नए बच्चे इस बीमारी के लक्षणों के साथ भर्ती किए गए थे और 179 का इलाज चल रहा था। उस दिन कुल सात बच्चों की मौत हो गई। वैसे, इलाज के नाम पर बस यही भरोसा था कि डॉक्टर-नर्स आसपास हैं। ड्रिप के जरिए जिनमें जिंदगी जा सकती थी, जा रही थी। जिनका शरीर ड्रिप स्वीकार करने की स्थिति में नहीं था, उनके परिजन सांसें थामें चमत्कार का इंतजार भर कर रहे थे। जिनके बच्चे शव में तब्दील हो चुके थे, वह उन्हें ले जाने का इंतजार करते हुए सरकारी सिस्टम को कोस रहे थे और जो जिंदा हालत में अस्पताल पहुंच सके, वह डॉक्टरों के सामने हाथ जोड़ दुहाई दे रहे थे। यही कारण है कि खुद मुख्यमंत्री को भी यहां दौरे के दौरान ‘गो बैक’ के नारे की गूंज सुनाई पड़ी।

नाम तक पक्का नहीं, इलाज भी कच्चा
‘अपना भारत’ इसे कथित चमकी बुखार इसलिए कह रहा है, क्योंकि इस बीमारी को डॉक्टर भी सही तरीके से कोई पक्का नाम नहीं दे पा रहे हैं। यही कारण है कि डॉक्टर किस बीमारी की दवा दें, यह भी स्पष्ट नहीं है। एसकेएमसीएच के आईसीयू में इतना लोड है कि जैसे ही किसी बच्चे को होश आता है, उसे जनरल वार्ड में ट्रांसफर कर दिया जा रहा है। डॉक्टर सीधे कहते हैं कि बच्चों में ग्लूकोज और सोडियम की कमी देखी जा रही है, यही चढ़ाया भी जा रहा है। जो बच्चे देर से पहुंच रहे, उन्हें फस्र्ट लाइन का यह ट्रीटमेंट भी समय पर नहीं मिल पा रहा है सो इन बच्चों की जान नहीं बच पा रही। कई जिलों से डॉक्टर लगाए गए हैं, लेकिन कोई पक्के तौर पर सही बीमारी या पक्का इलाज बताने की स्थिति में नहीं है। इतने मरीजों के लिए डॉक्टर की कमी बताई तो जा रही, लेकिन औपचारिक तौर पर कोई इसे स्वीकारने को तैयार नहीं। आईवी फैनिटोइन को ही एक दवा के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, वह भी ज्यादा देने से बीपी घटने का खतरा रहता है। जान बचाने के लिए इसका ओवरडोज देने पर बीपी मैनेज करने का संकट है। इसके लिए थर्ड लाइन, फोर्थ लाइन की दवाओं के बाद वेंटिलेंटर तक की स्थिति आती है, लेकिन एसकेएमसीएच में ज्यादातर मौत इससे पहले ही हो जा रही है।

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बीमार और भी हैं, चर्चा सिर्फ मुजफ्फरपुर की
बिहार के वैशाली, मोतिहारी, मधेपुरा, बेगूसराय के साथ ही पटना में इस बीमारी से मौत हो चुकी है। सार्वजनिक आंकड़ा डेढ़ सौ के आसपास है तो सरकारी सौ के करीब। सरकारी आंकड़ों में प्राइवेट अस्पतालों की मौत का जिक्र नहीं है। पोस्टमार्टम तक मामला नहीं पहुंचने के कारण सरकार सिर्फ सरकारी कागजों में इन्सेफलाइटिस को चमकी बुखार से मौत दिखा रही है। जबकि, हकीकत यह है कि पटना के बड़े अस्पतालों में भी ऐसे लक्षण के साथ कई बच्चे आकर अंतिम सांस ले चुके हैं और कई इलाज भी करा रहे हैं। दरअसल, यह बीमारी आर्थिक रूप से पिछड़े परिवार के बच्चों को शिकार बना रही है इसलिए बड़े अस्पतालों में कुछ ही बच्चे पहुंच रहे हैं। इसके बावजूद, पटना से सटे वैशाली, बेगूसराय के अलावा सुदूरवर्ती मधेपुरा और मुजफ्फरपुर के निकटवर्ती मोतिहारी तक से मौत की खबरें आ चुकी हैं।

हालत देख मुख्यमंत्री ने दिए ताबड़तोड़ निर्देश
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 18 जून को सुबह मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच पहुंच कर एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) के हरेक मरीज को देखा। उनके देखने से कुछ देर पहले उस दिन तीन बच्चों ने अंतिम सांस ले ली, जबकि एक ने उनके आसपास रहते। घटना से दुखी मुख्यमंत्री ने तत्काल इस मामले पर बैठक की और मातहतों को आदेश दिया कि यहां 600 की जगह बेड की संख्या 2500 कराई जाए। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग को एक साल के भीतर बेड की संख्या 1500 करने का निर्देश देते हुए कहा कि परिजनों के ठहराव के लिए धर्मशाला भी बनवाएं। दो साल में अस्पताल के रेनोवेशन के साथ 100 बेड का नया शिशु आईसीयू बनाने का भी मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया। मुख्यमंत्री ने दिल्ली से बुलाए गए दो विशेषज्ञ चिकित्सकों की रिपोर्ट के साथ विभिन्न सरकारी संगठनों से प्रभावित परिवारों के सामाजिक-आर्थिक अध्ययन की बात भी कही। उन्होंने सरकारी एजेंसियों से प्रभावित परिवारों के घर व आसपास की साफ-सफाई और घरेलू वातावरण का भी आकलन करने का निर्देश दिया। साथ ही, साफ कहा कि चाहे प्रधानमंत्री हो या मुख्यमंत्री आवास योजना, मकान बनवाएं लेकिन मिट्टी के घरों को हटाएं।

आपदा नई नहीं, अफसरों-राजनेताओं का वास्ता भी पुराना
मुजफ्फरपुर की शाही लीची के मार्केट में आने के साथ ही पूरा बिहार एक बार सहमा हुआ नजर आने लगता है। बीच में एक-दो साल यह बीमारी आपदा की तरह नहीं टूटी, वरना वर्षों से इसका रिकॉर्ड रहा है। 2010 से अब तक करीब 500 बच्चों की जान इस बीमारी ने लीची के मौसम में ली है। खास बात यह है कि जिस तरह यह आपदा नई नहीं है, उसी तरह अफसरों-मंत्रियों के पास भी इसका खूब अनुभव है।
केंद्र में स्वास्थ्य मंत्रालय की अहम जिम्मेदारी संभालने से पहले अश्विनी कुमार चौबे बिहार के स्वास्थ्य मंत्री रहते इस आपदा को देख चुके हैं। खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी स्वास्थ्य विभाग रखकर इस आपदा से परिचित रहे हैं। केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन तो 22 जून 2014 को इस बीमारी को देखकर मुजफ्फरपुर में 100 बेड का बच्चों का अलग अस्पताल बनाने की बात भी कह गए थे। यह अलग बात है कि इस बार भी जब वह अपने सहयोगी अश्विनी चौबे और बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय के साथ आए तो फिर यही वादा दोहराते हुए चले गए। उन्होंने पिछली बार भी इस बीमारी की वजहों पर शोध की बात कही थी, इस बार भी कह गए। बिहार के वर्तमान मुख्य सचिव दीपक कुमार खुद स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव रहते हुए इस विषय पर कई बार योजनाएं बना चुके थे। इसी तरह राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के उपाध्यक्ष सीनियर आईएएस व्यासजी भी स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव का भार कंधों पर उठा चुके हैं। इस आपदा के अनुभवी इतने अफसरों-राजनेताओं के बावजूद समाधान का कोई संकेत आम जनता को दूर-दूर तक नहीं दिख रहा है।

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डॉक्टर लीची को दोषमुक्त नहीं कर रहे

कई पीडि़त बच्चों के परिवारवालों ने ‘अपना भारत ‘ को बताया कि भूख नहीं लगने के कारण बच्चे बिना खाए सो गए और सुबह तबीयत बिगड़ गई। कई ने सुबह खाली पेट लीची खाने की बात भी कही। लीची ताजी या पहले से टूटी हुई थी, इसका जवाब किसी के पास नहीं मिला। ऐसे में डॉक्टरों से बात करने पर कई और कारण सामने आए।
बिहार के सीनियर फिजीशियन डॉ. दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि ब्रेन का इन्फेक्शन-इन्फ्लामेशन है, इसमें कोई दो राय नहीं है। दूसरी चीज गर्मी में सोडियम और पानी की कमी है। जहां तक लीची का सवाल है तो एक रिपोर्ट पहले ही आ चुकी है कि इसमें एक टॉक्सिन होता है जो हाइपोग्लाइसीमिया भी कराता है और ब्लड में शुगर की कमी कराता है। खाली पेट लीची खाने से रातभर के गैप के कारण स्थिति बिगडऩा संभव है। डॉ. तेजस्वी कहते हैं कि चूंकि ब्रेन सेल्स मेटाबॉलिज्म के लिए सिर्फ शुगर-ग्लूकोज लेता है, इसलिए इसकी कमी से झटका, चमकी, सिरदर्द, गरदन में अकडऩ, भूख की कमी, डिहाईड्रेशन, उल्टी जैसे लक्षण दिखने लगते हैं। उलटी, भूख की कमी, दर्द वगैरह हो तो तुरंत ड्रिप चढ़ाना चाहिए।
इनोवेटिव फिजीशियन फोरम में संरक्षक और इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल नई दिल्ली के सीनियर कंसल्टेंट (गेरेएट्रिक मेडिसीन) डॉ. ओ.पी. शर्मा कहते हैं कि यह कोई पहला वाकया नहीं है। बहुत पहले इससे चेत जाना चाहिए। मास वैक्सीनेशन की जरूरत पर सरकार को तुरंत एक्शन लेना चाहिए। यह आपदा है और इसके खिलाफ बड़े स्तर पर काम करने की जरूरत है।
हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट डॉ. के.के. अग्रवाल इस केस में कुछ सामान्य बातों को नोटिस करते हैं। डॉ. अग्रवाल के अनुसार मुजफ्फरपुर के मामलों में इनसेफेलोपैथी जैसी स्थितियां अमूमन देखी जा रही हैं और ज्यादातर केस में वायरस नहीं मिल रहा है। पीडि़त बच्चे कुपोषित हैं और मृतकों के साथ भी ऐसी ही स्थितियां थीं। वह लीची सिंड्रोम के कारण हाइपोग्लाइसीमिया की आशंका से भी इनकार नहीं करते। इसके अलावा गर्मी के कारण पैदा हुई स्थितियां भी इसके लिए जिम्मेदार हैं।

केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में 2017 में तीन लाख मीट्रिक टन लीची की पैदावर हुई थी। पूरे देश को लीची की ज्यादातर सप्लाई मुजफ्फरपुर से ही की जाती है। स्वास्थ्य विभाग ने भी कहा है कि बच्चों को कच्ची या अधपकी लीची नहीं खाने देनी चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि लीची में मौजूद कुछ केमिकल 15 साल से कम उम्र के बच्चों के दिमाग में सूजन बढ़ा देते हैं। लीची के अभियुक्त बनने से उसकी कीमतें तेजी से गिरी हैं। इससे उन हजारों परिवारों को बच्चों पर भी असर पड़ रहा है जो आजीविका के लिए लीची की खेती पर ही निर्भर हैं। दरअसल, इलाके में मई और जून के महीने में लीची पकने लगती है। इस दौरान खासकर लीची की खेती करने वाले परिवारों के बच्चे बागानों में घूमते समय सुबह से ही लीची खाने लगते हैं। इसी से लीची खाने से बीमारी फैलने की थ्योरी को बल मिला है। बावजूद इसके कुछ सवालों के जवाब अब तक नहीं मिल सके हैं। मिसाल के तौर पर 2011 में मुजफ्फरपुर में पहली बार इस बीमारी का प्रकोप सामने आया था। तब छह महीने के बच्चों की भी मौत हो गई थी। इस सवाल का भी जवाब नहीं मिल सका है कि एक ही परिवार के कुछ बच्चों को तो यह बीमारी हो जाती है लेकिन कुछ पर इसका कोई असर नहीं होता।

देरी से पहुंचने वालों को बचाना मुश्किल हो रहा
‘झटके आने और बुखार के बाद देर से अस्पताल पहुंचने वाले बच्चों को बचाना मुश्किल हो रहा है। सरकार ने अब मरीजों को जल्द पहुंचाने के लिहाज से 400 रुपए एम्बुलेंस चार्ज देने का प्रावधान किया है। दवा की कमी हमारे पास नहीं है। ब्लड में ग्लूकोज या कैल्शियम-सोडियम की कमी के साथ किसी तरह इनफेक्शन भी इसकी वजह हो सकता है। कारणों पर रिसर्च के लिए मुख्यमंत्री से केंद्रीय मंत्री तक कह गए हैं, फिलहाल इसपर मैं कुछ नहीं कह सकता।’
– सुनील कुमार शाही, एमएस, श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज अस्पताल, मुजफ्फरपुर

.. और, राजनीति भी पीछे नहीं
मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत पर राजनीति भी कम नहीं हो रही है। पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने एयर एंबुलेंस से बच्चों को दिल्ली नहीं ले जाने पर सरकार को घेरा तो उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी खुद जवाब देने उतर आए और कहा कि लालू-राबड़ी सरकार ने पहले तो अस्पतालों को तबेला बना दिया, अब हमारे ऊपर सवाल कर रहे। फर्जी आंकड़ों से पूर्व मुख्यमंत्री बिहार सरकार को घेरने का षडयंत्र करने की जगह इस आपदा में सही सुझाव दें। वैसे, इसके पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मुजफ्फरपुर जाने में हो रही देर पर जब विपक्ष ने उन्हें घेरने की कोशिश की तो सत्ता पक्ष ने पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के गायब होने और विपक्ष धर्म नहीं निभाने की याद दिला डाली। इसपर राजनीति इतनी गरमाई कि राजद को औपचारिक रूप से बताना पड़ा कि तेजस्वी खुद बीमार हैं और बिहार से बाहर हैं।

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