भारत लड़ रहा जंग: जल्द खत्म होगा वैक्सीन का इंतजार, दूर होगा बुरा समय

कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया के सिर में दर्द कर रखा है। जल्दी से जल्दी इस आफत से छुटकारा पाने के लिए सबने पूरी ताकत झोंक रखी है। कोरोना वायरस के खिलाफ टीका ढूँढने के लिए पूरी दुनिया के वैज्ञानिक रात-दिन एक किए हुये हैं। जंग जारी है और मानवता व विज्ञान की फतह जल्द होना तय है।

Published by suman Published: July 10, 2020 | 6:12 pm
Modified: July 10, 2020 | 6:40 pm

लखनऊ:  कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया के सिर में दर्द कर रखा है। जल्दी से जल्दी इस आफत से छुटकारा पाने के लिए सबने पूरी ताकत झोंक रखी है। कोरोना वायरस के खिलाफ टीका ढूँढने के लिए पूरी दुनिया के वैज्ञानिक रात-दिन एक किए हुये हैं। जंग जारी है और मानवता व विज्ञान की फतह जल्द होना तय है। दुनिया में अलग अलग तरह के 200 टीकों के परीक्षण चल रहे हैं और अगले 6 से 18 महीने के भीतर बाजार में एक असरदार टीका आ जाने की उम्मीद है।

 

डब्लूएचओ के अनुसार फिलहाल 19 टीके क्लीनिकल ट्रायल की स्टेज में हैं। इनमें से 10 टीकों के इनसानी ट्रायल की मंजूरी दी गई है। जो कंपनियाँ टीका विकसित करने में लगी हैं उन्होने टीके के उत्पादन के लिए भी कमर कस ली है क्योंकि ट्रायल में सफल हो जाने पर तत्काल बड़ी संख्या में टीके की डोज़ बाजार में लानी होंगी और इसके लिए सभी इंतजाम पहले से करके रखने होंगे। डिमांड को पूरा करने के लिए कुछ कंपनियों ने अभी से प्रोडक्शन भी शुरू कर दिया है।

 

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अभूतपूर्व साझेदारियाँ

कोरोना महामारी के चलते अभूतपूर्व पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप का जन्म हुआ है। इस तरह की साझेदारी अभी तक कभी नहीं देखी गई। अमेरिका में ‘ऑपरेशन वार्प स्पीड’ के तहत संघीय सरकार के विभिन्न विभागों और 18 से अधिक फार्मा कंपनियों के साथ साझेदारी हुई है। अमेरिकी सरकार ने ऑपरेशन वार्प स्पीड के तहत तीन टीकों के लिए फंडिंग की है यानी ये तीन टीके रेस में सबसे आगे हैं।

 

इनमें सबसे आगे ‘मोडेरना बायोटेक’ का टीका है जिसका अगले चरण का परीक्षान इसी महीने होना है। इसके बाद हैं ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी व आस्ट्रा ज़ेनेका का टीका जो अगस्त में ट्रायल में जाएगा और फ़ाइज़र व बायो टेक कंपनी का टीका जो सितंबर में परीक्षण में जाना है। अमेरिका के औषधि नियंत्रक यूएसएफडीए की गाइडलाइन के अनुसार इन टीकों को परीक्षण में कोविड-19 के खिलाफ न्यूनतम 50 फीसदी प्रभावी उतरना होगा इसके बाद ही इनके इस्तेमाल की अनुमति दी जाएगी।

कौन सा टीका किस स्टेज में

यूनिवेर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड – परीक्षण का तीसरा चरण।

सिनोवैक – परीक्षण का तीसरा चरण।

मोडेरना बायोटेक – परीक्षण का दूसरा चरण।

फ़ाइज़र, बायो एन टेक – परीक्षण का पहला व दूसरा चरण।

यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबोर्न, मर्डोक चिल्ड्रेन रिसर्च इंस्टीट्यूट – दूसरा चरण।

वुहान इंस्टीट्यूट, चाइना नेशनल फार्मा ग्रुप – परीक्षण का पहला व दूसरा चरण।

बीजिंग इंस्टीट्यूट, चाइना नेशनल फार्मा ग्रुप – परीक्षण का पहला व दूसरा चरण।

जीनेक्सीन – परीक्षण का पहला व दूसरा चरण।

गामलेया रिसर्च इंस्टीट्यूट, रूसी स्वास्थ्य मंत्रालय – परीक्षण का पहला व दूसरा चरण।

कैनसिनो बायोलोजी, चीन – दूसरा चरण

इनोविओ फर्मास्यूटिकल्स, अमेरिका – दूसरा चरण

क्योरवैक, जर्मनी – पहला चरण।

ग्लेक्सो स्मिथ क्लाइन, सनोफी – पहला चरण

भारत बायोटेक, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वाइरोलोजी – पहला चरण।

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ऐतिहासिक काम

मेडिसिन के इतिहास में अभी तक ऐसा कभी नहीं हुआ है कि कोई टीका पाँच साल से कम समय में विकसित कर लिया गया हो। अभी तक ‘मम्प्स’ यानी गलसुआ बीमारी का टीका ही सबसे कम समय में बनाने में सफलता मिली है। 1963 में एक बच्चे के गले से लिए गए नमूने से मम्प्स का वायरस आइसोलेट किया गया था।

उस बच्चे के पिता मौरिस हिलमैन एक बायोमेडिकल वैज्ञानिक थे। उन्होने कुछ महीनों तक अपनी लैब में इस वायरस को धीरे धीरे कमजोर किया। कमजोर किया गया ऐसा वायरस शरीर में बीमारी पैदा नहीं कर पाता बल्कि उस बीमारी के प्रति प्रतिरोधक क्षमता पैदा करता है। इसी क्षमता से भविष्य उस वायरस से पैदा होने वाली बीमारी से सुरक्षा मिलती है। मम्प्स के टीके के इनसानी परीक्षान अगले दो साल तक चले और दिसंबर 1967 में ‘मर्क’ कंपनी को इस टीके का लाइसेन्स मिला।

टीका विकसित करना एक लंबी प्रक्रिया होती थी। जो कांसेप्ट, डिजाइन, परीक्षण, मंजूरी जैसी स्टेजों से गुजरने के बाद निर्माण की अवस्था में पहुँचती थी। इसमें एक दशक या उससे ज्यादा समय लग जाता था। लेकिन कोविड-19 की तात्कालिक जरूरत ने सभी सिस्टम बदल डाले हैं। अब पूरा प्रोसेस एक साल या उससे से भी कम समय में पूरा हो जाने की उम्मीद है।

भारत भी रेस में

कोविड-19 का टीका विकसित करने की दौड़ में भारत भी आगे है। भारत बायोटेक और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वाइरोलोजी का ‘कोवैक्सिन’ 13 जुलाई को पहले चरण के परीक्षण में जाएगा। इस चरण में 100 लोगों को ‘कोवैक्सिन’ लगाया जाएगा। प्री क्लीनिकल ट्रायल में ‘कोवैक्सिन’ के नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे हैं। एक्स्पर्ट्स का कहना है कि सब कुछ ठीक रहा तब भी ये टीका बाजार में आने में साल भर का समय लग जाएगा।

 

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आयुर्वेद से बढ़े इम्यूनिटी

कोरोना से बचाव की दवा नहीं है और इलाज की भी सटीक दवाई नहीं है। ऐसे में साफ सफाई, मास्किंग, फिजिकल डिस्टेन्सिंग और इम्यूनिटी ही जान बचाएगी। गुनगुने पानी में नमक दाल कर गरारा रोज कम से कम दो मर्तबा करें। काढ़ा पियें, होम्योपैथिक दवा लेते रहें। विटामिन सी की गोली रोज लें। व्यायाम करें। ये सब आपको नुकसान नहीं बल्कि फायदा ही पहुंचाएंगी।

आयुर्वेद में कोरोना जैसी बीमारियों से बचाव के तरीके बताए गए हैं। इनका प्रयोग करके सिर्फ कोरोना ही नहीं बल्कि तमाम अन्य बीमारियों से बचा जा सकता है। इम्युनिटी को मजबूत बनाए रखने के लिए कुछ उपायों को जरूर अपनाना चाहिए।

–    हमेशा गर्म पानी ही पियें।

–    सौंठ, अदरक, तुलसी, गिलोय व लेमन ग्रास का काढा बनाकर पियें।

–    हल्दी व नमक के पानी के गरारे करें।

–    हल्दी मिला कर गर्म दूध पियें।

–    रोजाना गिलोय का सेवन कैप्सूल या जूस के रूप में करें।

–    रोजाना अश्वगंधा की एक कैप्सूल सुबह शाम खाएं।

–    रोजाना आंवला और नींबू का सेवन करें।

–    आयुर्वेद में तुलसी के पौधे का प्रत्येक भाग का उपयोग सेहतमंद बने रहने के लिए किया जाता है। लगभग एक लीटर पानी में तुलसी के पत्ते को अच्छी तरह उबाल लें। तुलसी के पत्तों को तब तक उबालें, जब तक एक लीटर पानी, एक चौथाई न हो जाए। अब एक चौथाई पानी के बचे होने पर 4-6 दाने काली मिर्च, थोड़ा सा गुड़ और एक चम्मच नींबू रस डालकर इसे तैयार किया जा सकता है। इसे हर्बल चाय के रूप में आप दिन में एक या दो बार भी पी सकते हैं।

–    सर्दी, खांसी होने पर अदरक के कटे हुए छोटे हुए टुकड़े, 1/2 चम्मच जीरा, 1/2 चम्मच हल्दी और एक चम्मच नींबू रस को एक कप पानी में मिलाकर इसका सेवन करना है।

 

 

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ओ ब्लड ग्रुप वालों के लिए कोरोना कम खतरनाक

 

यूरोप के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक ताजा अध्ययन में पता चला है कि कोरोना वायरस की चपेट में आने के बाद ए ब्लड ग्रुप वालों को तो गंभीर स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन ओब्लड ग्रुप वाले लोगों के लिए अपेक्षाकृत ये वायरस कम खतरनाक है। ये रिसर्च न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में छापा गया है। रिसर्च के लिए वैज्ञानिकों ने हजारों कोविड -19 पॉजिटिव मरीजों के जीन्स का अध्ययन किया और पाया कि जिन लोगों का ब्लड ग्रुप ए है,

 

ये वायरस उनके लिए बड़े खतरे पैदा कर सकता है। यानी अगर ए ब्लड ग्रुप वाले लोग कोरोना वायरस की चपेट में आते हैं तो उनके लक्षण ज्यादा गंभीर हो सकते हैं और खतरा अन्य लोगों से ज्यादा हो सकता है। वैज्ञानिकों ने बताया कि ए ब्लड ग्रुप वाले मरीजों को कोविड-19 की गंभीर स्थिति का खतरा 45% तक ज्यादा हो सकता है। वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि कोरोना वायरस ओ ब्लड ग्रुप वालों के लिए कम खतरनाक है। इसका अर्थ है कि अगर ओ ब्लड ग्रुप के लोग कोरोना वायरस की चपेट में आते हैं तो उनके लक्षण बहुत गंभीर नहीं होते हैं और उनका इलाज भी आसानी से किया जा सकता है।

 

अध्ययन के अनुसार ओ ब्लड ग्रुप वालों के लिए कोरोना वायरस 35% तक कम गंभीर हो सकता है। एक्सपर्ट्स यह भी कह रहे हैं कि स्वस्थ व्यक्तियों के लिए ये अध्ययन कुछ हद तक महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन कोरोना वायरस की गंभीरता कई और फैक्टर्स पर भी निर्भर करती है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। जैसे- कोई व्यक्ति पहले से ही किसी बीमारी का शिकार है, तो उसके लिए कोरोना वायरस खतरनाक ही साबित होगा, फिर उसका ब्लड ग्रुप कोई भी हो।