विदेशी कंपनियां देंगी छोटे उद्योगों को मदद, पढ़ें ये खास रिपोर्ट

एक अन्य अधिकारी ने कहा कि विभिन्न फंडिंग एजेंसियों से बात चल रही है कि लघु और मध्यम फर्मों के लिए क्या किया जा सकता है। इन अधिकारियों ने ज्यादा जानकारी तो नहीं दी लीकिन कहा कि बातचीत प्रारंभिक स्टेज में हैं।

विदेशी कंपनियां देंगी छोटे उद्योगों को मदद, पढ़ें ये खास रिपोर्ट

नई दिल्ली: देश के छोटे व्यवसायियों को लोन की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए भारत सरकार विदेशी ऋणदाताओं से बात कर रही है। समझा जाता है कि इन ऋणदाताओं से करीब 14.5 बिलियन डालर (दस खरब रुपए) की रकम पर विचार-वमर्श चल रहा है।

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‘रायटर’ की एक खबर के अनुसार, भारत सरकार जर्मनी के सरकारी विकास बैंक केएंडब्लू ग्रुप, विश्व बैंक और कुछ कनाडियन संस्थानों समेत कई विदेशी ऋणदाताओं से बात कर रही है कि वे छोटे उद्यमों को ऋण सुविधा प्रदान करें।

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केएफडब्लू के भारत स्थित कार्यालय ने ऐसे विचार विमर्श की पुष्टिï की है। हालांकि इसका कहना है कि बातचीत का मुख्य फोकस छोटे उद्यमों के सोलर पावर जनरेशन को मदद करने का रहा है। विश्व बैंक ने इस बाबत पूछे गए सवालों का कोई जवाब नहीं दिया।

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भारत सरकार के एक अधिकारी ने बताया कि सरकार की योजना विदेशी संस्थानों से एक लाख करोड़ रुपए जुटाने की है क्योंकि भारतीय बैंक लघु उद्योग सेक्टर को पर्याप्त पूंजी उपलब्ध कराने की स्थिति में नहीं हैं। यह सेक्टर रोजगार पैदा करने के लिए अति महत्वपूर्ण है।

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एक अन्य अधिकारी ने कहा कि विभिन्न फंडिंग एजेंसियों से बात चल रही है कि लघु और मध्यम फर्मों के लिए क्या किया जा सकता है। इन अधिकारियों ने ज्यादा जानकारी तो नहीं दी लीकिन कहा कि बातचीत प्रारंभिक स्टेज में हैं।

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वैसे, एमएसएमई मंत्रालय विदेशी बैंकों की मदद लेने के बारे में वित्त मंत्रालय से विचार विमर्श कर रहा है क्योंकि अंतिम फैसला वित्त मंत्रालय को ही करना है। इस महीने की शुरुआत में भारत सरकार ने घोषणा की थी कि विदेशों में सरकारी (सॉवरेन) बांड जारी कर 70000 करोड़ रुपए उधार लेने की योजना है।

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भारत में एमएसएमई सेक्टर में करीब साढ़े 6 करोड़ उद्यम हैं जो देश के विनिर्माण और सर्विस में एक चौथाई आउटपुट देते हैं। देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए इस सेक्टर में नई जान फूंकने की जरूरत है।

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ये सेक्टर देश के कुल निर्यात का 45 फीसदी हिस्सा देता है। इतना होने के बावजूद इस सेक्टर को ऋण की उपलब्धता काफी खराब हो गई है, और इसके लिए बैंकिंग उद्योग में नकदी का संकट है।

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सरकारी बैंकों तो 145 बिलियन डालर के एनपीए के बोझ से दबे हुए हैं। इन हालातों में छोटे व्यवसाय के लिए क्रेडिट की सुविधा का जबर्दस्त संकट बना हुआ है जिस कारण उन्हें नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (एनबीएफसी) की तरह देखना पड़ता है। ये एनबीएफसी 20 फीसदी तक का ब्याज ले लेते हैं। पिछले महीने रिजर्व बैंक के एक अध्ययन में बताया गया कि एमएसएमई सेक्टर के लिए कुल ऋण डेफिसिट 20 से 25 लाख करोड़ रुपए का है।