सेना से राजनीति में आए थे जसवंत

जसवंत सिंह उन गिने-चुने राजनेताओं में से थे जिन्हें भारत के विदेश, वित्त और रक्षा मंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ था। 1966 में वह पहली बार राजनीति के मैदान में उतरे और राजस्थान के दिग्गज नेता भैरो सिंह शेखावत की छत्रछाया में आगे बढ़ते हुए 1980 में पहली बार राज्यसभा सांसद बने।

Published by Roshni Khan Published: September 27, 2020 | 12:28 pm
Modified: September 27, 2020 | 12:31 pm
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सेना से राजनीति में आए थे जसवंत (social media)

नीलमणि लाल

लखनऊ: जसवंत सिंह उन गिने-चुने राजनेताओं में से थे जिन्हें भारत के विदेश, वित्त और रक्षा मंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ था। 1966 में वह पहली बार राजनीति के मैदान में उतरे और राजस्थान के दिग्गज नेता भैरो सिंह शेखावत की छत्रछाया में आगे बढ़ते हुए 1980 में पहली बार राज्यसभा सांसद बने। वह भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में उन्होंने पार्टी का नेतृत्व किया।

जसवंत सिंह भारतीय जनता पार्टी के उन गिने-चुने नेताओं में से थे जो आरएसएस की पृष्ठभूमि से नहीं आते थे। घुड़सवारी, संगीत, किताबों, गोल्फ़ और शतरंज के शौकीन जसवंत सिंह हमेशा अपने को ‘लिबरल डेमोक्रेट’ कहते रहे। 2014 चुनाव से एक दिन पहले वो अपने बाथरूम में गिर पड़े जिससे उनके सिर में गहरी चोट लगी। वो पिछले छह सालों से लगातार कोमा में थे।

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अटल के हनुमान

जसवंत सिंह को अटल बिहारी वाजपेयी बहुत पसंद करते थे और उनको अपना संकटमोचक मानते थे। इसी वजह से जसवंत सिंह को अटल बिहाई वाजपेयी का हनुमान कहा जाता था। 1996 से 2004 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी सरकारों में जसवंत ने रक्षा, विदेश और वित्त जैसे बेहद अहम मंत्रालय संभाले। 1996 में वो वाजपेयी की 13 दिन की सरकार में वित्त मंत्री बनाए गए। जब वाजपेयी दोबारा सत्ता में आए तो वो जसवंत सिंह को फिर वित्त मंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन आरएसएस ने उनके मंत्री बनाए जाने का विरोध किया। वाजपेयी ने इस पर उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष बना दिया। कुछ दिनों बाद वाजपेयी ने उन्हें विदेश मंत्री बना दिया और वो 2002 तक भारत के विदेश मंत्री रहे। इसके बाद उन्हें दोबारा वित्त मंत्री बनाया गया।

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jaswant-singh (social media)

परमाणु परीक्षण

1998 में परमाणु परीक्षण के बाद दुनिया को साधने का जिम्मा वाजपेयी ने उन्हें ही दिया था और ये काम उन्होंने बखूबी किया। परमाणु परीक्षण के बाद दुनिया के सामने भारतीय पक्ष को रखकर उनकी ग़लतफ़हमियाँ दूर करना जसवंत सिंह के लिए एक विदेश मंत्री के रूप में बहुत बड़ी चुनौती थी। जसवंत सिंह ने इस भूमिका को ठीक तरह से निभाया और उनकी व अमेरिकी उप-विदेश मंत्री स्ट्रोब टालबॉट के बीच दो साल के बीच 14 बार मुलाक़ात हुई। बाद में टालबॉट ने अपनी किताब ‘इंगेजिंग इंडिया डिप्लॉमेसी, डेमोक्रेसी एंड द बॉम्ब’ में जसवंत सिंह की काफी तारीफ की थी। उनके ही प्रयासों की वजह से ही राष्ट्रपति क्लिन्टन की भारत यात्रा संभव हो सकी थी।

आतंकियों को कंधार छोड़ने गए थे

जसवंत सिंह की सबसे बड़ी आलोचना तब हुई जब 1999 में कंधार विमान अपहरण के बाद तीन आतंकवादियों को अपने विमान में कंधार ले गए। हालांकि बाद में उन्होंने अपनी सफ़ाई में कहा कि ऐसा उन्होंने अपने अधिकारियों की सलाह पर किया था। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘अ कॉल ट्रू ऑनर’ में लिखा है कि ‘कंधार में मौजूद हमारे तीनों अधिकारियों अजीत डोवाल, सीडी सहाय और विवेक काटजू ने मुझसे कहा कि किसी ऐसे शख़्स को कंधार भेजिए जो वहाँ ज़रूरत पड़ने पर बड़ा निर्णय लेने में सक्षम हो।’

‘हालांकि पहले आतंकवादी 40 लोगों की रिहाई की माँग कर रहे थे, हम 3 लोगों को रिहा करने पर राज़ी हुए। अगर इस तरह के हालात आख़िरी मिनट में दोबारा पैदा होते हैं, तो उस शख़्स को दिल्ली से पूछने के बजाए उसी जगह पर फ़ैसला लेना होगा। इस वजह से मैंने कंधार जाने का फ़ैसला लिया।’

जसवंत सिंह ने जो क़दम उठाया था वो उनका अपना फ़ैसला नहीं था। उसकी मंत्रिमंडल ने बाकायदा मंज़ूरी दी थी।

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book written by jaswant singh (social media)

जिन्ना पर किताब

१९ अगस्त २००९ को भारत विभाजन पर उनकी किताब ‘जिन्ना-इंडिया, पार्टिशन, इंडेपेंडेंस’ में नेहरू-पटेल की आलोचना और जिन्ना की प्रशंसा के लिए उन्हें भाजपा से निष्कासित कर दिया गया था हालाँकि बाद में उन्हें वापस ले लिया गया।

अंग्रेजी के मास्टर

जसवंत सिंह की इंग्लिश बहुत बढ़िया थी। कहा जाता है कि वाजपेयी उनकी अंग्रेज़ी भाषा, ख़ासकर क्वींस इंग्लिश पर उनकी महारत के कारण उनके मुरीद थे। जसवंत सिंह को मेयो कालेज में एडमिशन लेने से पहले इंग्लिश एकदम नहीं आती थी। ये उनके लिए बड़ी शर्मिंदगी की बात थी लेकिन उन्होंने बिना किसी की सहायता के इंग्लिश भाषा में महारथ हासिल की।

जन-राजनीति से कोई सरोकार नहीं

जसवंत सिंह के राजनीतिक जीवन की एक ख़ामी ये थी कि वो अपने आप को जन राजनीति के साँचे में कभी नहीं ढाल पाए। 1989 में उन्होंने जोधपुर और 1991 तथा 1996 में चित्तौड़गढ़ और फिर 2009 में दार्जिलिंग में जीत ज़रूर दर्ज की लेकिन उनके मतदाताओं को हमेशा शिकायत रही कि जीतने के बाद उन्होंने उनकी सुध नहीं ली।
सफर नामा

पंद्रहवीं लोकसभा में जसवंत सिंह दार्जिलिंग संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए।

5 दिसम्बर 1998 से 1 जुलाई 2002 के दौरान जसवंत सिंह अटल सरकार में विदेश मंत्री बने।

2002 में यशवंत सिन्हा की जगह वे एकबार फिर वित्तमंत्री बने और इस पद पर मई २००४ तक रहे।

2014 के लोकसभा चुनाव में राजस्थान के बाड़मेर-जैसलमेर संसदीय क्षेत्र से भाजपा द्वारा टिकट नहीं दिए जाने के विरोध में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। उन्हें इस बगावत के लिए छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित किया गया।

जसवंत सिंह का जन्म 3 जनवरी 1938 को राजस्थान के बाड़मेर जिले के जसोल गांव में हुआ था।

उनकी पढ़ाई अजमेर के मशहूर मेयो कॉलेज में हुई थी।

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1954 में जसवंत सिंह का चयन एनडीए, देहरादून के लिए हो गया। कुछ दिनों बाद एनडीए को पुणे के पास खड़कवासला शिफ़्ट कर दिया गया। वहाँ जसवंत सिंह ने पहली बार जवाहरलाल नेहरू, सोवियत नेताओं निकिता ख्रुश्चेव और बुल्गानिन को भी नज़दीक से देखा।

1966 में जसवंत सिंह ने 9 साल की नौकरी के बाद सेना के अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया। कुछ समय के लिए वो जोधपुर के महाराजा गज सिंह के निजी सचिव रहे। 1980 में वो भाजपा के टिकट पर पहली बार राज्य सभा के लिए चुने गए।

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