भारत में नया नहीं पाकिस्तान का जासूसी का खेल, पहले भी मिले हैं सबूत

पाकिस्तान भारत में उथल-पुथल मचाने के लिए किस हद तक जा सकता है इसका अंदाजा आप इस बात से ही लगा सकते हैं कि उसने अपने दो जासूसों को जासूसी के लिए हमारे देश में भेज रखा था।

नई दिल्ली: पाकिस्तान भारत में उथल-पुथल मचाने के लिए किस हद तक जा सकता है इसका अंदाजा आप इस बात से ही लगा सकते हैं कि उसने अपने दो जासूसों को जासूसी के लिए हमारे देश में भेज रखा था।

शुक्र मनाइए भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का जिन्होंने समय रहते पाकिस्तानी जासूसों के बारें में पता लगा लिया और दिल्ली पुलिस की मदद से इन्हें रंगे हाथों धर लिया और उन्हें सोमवार को वापस पाकिस्तान भेज दिया।

लेकिन यहां पर एक सवाल उठ रहा है कि क्या ऐसा पहली बार है जब पाकिस्तान ने इस तरह की सजिश भारत के खिलाफ रची थी। इसका सीधा सा जवाब है नहीं, पाकिस्तान पहले भी इस तरह की हरकतें करता आया है।

ढाई साल पहले एनआईए ने अपनी चार्जशीट में साफ तौर पर यह बात कही थी कि पाकिस्तानी उच्चायोग के जरिए आतंकियों को धन व दूसरी मदद पहुंचाई जा रही है।

विभिन्न जांच एजेंसियों ने ‘पाकिस्तानी उच्चायोग-आईएसआई-आतंकी संगठन’, इन तीनों के नापाक गठजोड़ को लेकर केंद्र सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी थी। दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग में जासूसी की घटना कोई नई बात नहीं है।

एनआईए अपनी चार्जशीट में ये बात भी कह चुकी है कि पाकिस्तानी उच्चायोग से आतंकियों को धन एवं दूसरी मदद पहुंचाई जा रही है। सूत्र बताते हैं कि उच्चायोग में बैठे आईएसआई के गुर्गे पहले अलगाववादियों और कथित सामाजिक संगठनों से संपर्क करते हैं।

आतंकियों को धन एवं दूसरी मदद पहुंचाने का यह पहला पड़ाव है। ये संगठन अपने सामाजिक कार्यों की आड़ में आईएसआई के मंसूबों को पूरा करने में मदद करते हैं।

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एजेंटस के जरिये दूसरे देशों में भेजते हैं पैसे

दुबई और दूसरे देशों में बैठे आईएसआई के एजेंट कश्मीर में आतंकियों के लिए धन भेजते हैं। चूंकि यह आर्थिक मदद सीधे तौर पर अलगाववादियों या कश्मीर के संगठनों तक भेजना थोड़ा मुश्किल काम होता है। ऐसे में उन्हें कई तरह की जांच का सामना करना पड़ सकता है। जब वही मदद पाकिस्तानी उच्चायोग से आती है तो राह आसान बन जाती है।

यहां आपको ये भी बता दें कि एनआईए ने पिछले साल 26 फरवरी को कई अलगाववादी नेताओं के ठिकानों पर छापे मारे थे। इनमें जेकेएलएफ चेयरमैन यासीन मलिक, जम्मू-कश्मीर डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी के अध्यक्ष शब्बीर शाह, अवामी एक्शन कमेटी के चेयरमैन मीरवायज उमर फारुख, तहरीक-ए-हुर्रियत के चेयरमैन मोहम्मद अशरफ खान, एपीएचसी के महासचिव मशरत आलम, जेकेएसएम के चेयरमैन जफर अकबर भट्ट और सैयद अली गिलानी के पुत्र नसीम गिलानी शामिल हैं।

इनके कब्जे से कई अहम दस्तावेज, जिनमें प्रॉपर्टी पेपर, बैंक स्टेटमेंट व रुपयों के लेन-देन से संबंधित अन्य कागजात आदि बरामद किए गए थे। लेपटॉप, ई-टेबलेट, मोबाइल फोन, पेनड्राइव और डीवीआर सिस्टम भी मिले थे।

इन नेताओं के घर-दफ़्तरों से कई आतंकवादी संगठनों के लैटर हैड और पाकिस्तान के शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए वीजा फार्म भी बरामद किए गए। इतना ही नहीं, मीरवायज उमर फारुख के निवास से हाईटेक इंटरनेट संचार उपकरण जांच एजेंसी के हाथ लगे थे।

अब नए आतंकवाद-विरोधी कानून के तहत एक्शन लेना आसान

मालूम हो कि जांच एजेंसियां नए आतंकवाद-विरोधी कानून के तहत आतंकी संगठनों की संपत्तियां जब्त कर रही हैं। जब यह कानून नहीं बना था, तो इसके लिए जांच अधिकारी को संबंधित राज्य के डीजीपी की पूर्व अनुमति लेनी पड़ती थी।

अब एनआईए का कोई अफसर ऐसे मामले की जांच कर रहा है, तो आरोपी की संपत्ति को जब्त करने के लिए उसे संबंधित राज्य के डीजीपी की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी।

इसके लिए केवल एनआईए के महानिदेशक की मंजूरी ही काफी रहेगी। केंद्र सरकार के इस बिल के जरिए आतंकियों के मददगारों को यह संदेश दे दिया गया है कि अब उनका बचना मुश्किल है; वे बहुत जल्द कानूनी शिकंजे में आ सकते हैं।

गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) कानून, 1967 में संशोधन किए जाने के एक महीने बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी कर दी थी। इसमें मौलाना मसूद अजहर और दूसरे कई खूंखार लोगों को आतंकवादी के रूप में अधिसूचित किया गया।

एनएसए अजीत डोभाल और एनआईए प्रमुख वाईसी मोदी कह चुके हैं कि आतंकवाद को पूरी तरह खत्म करने के लिए जरुरी है कि पहले उनकी सप्लाई चेन को तोड़ा जाए। आतंकियों के मददगार, जो पर्दे के पीछे रह कर उन्हें हथियार और रुपया पैसा देते हैं, अब उन पर कार्रवाई करने का समय आ गया है।

आईएसआई भारत के खिलाफ लगातार रच रहा साजिशें

रक्षा मंत्रालय से जुड़े सूत्र बताते है कि कि पाकिस्तानी उच्चायोग में केवल ये दो ही जासूसी नहीं कर रहे थे, बल्कि वहां पर ऐसे अधिकारियों की लंबी फेहरिस्त है। देर-सवेर वे भी जांच एजेंसियों के हाथ लग सकते हैं।

दरअसल, ये आईएसआई एजेंट हैं। किसी को इन पर शक न हो और उच्चायोग का सुरक्षा कवच इन्हें मिलता रहे, इसलिए इन्हें यहां तैनात किया जाता है। उच्चायोग में बैठकर ये लोग आसानी से स्लीपर सेल बना सकते हैं।

किसी से मिलना जुलना हो तो उसके लिए भी इन्हें कोई दिक्कत नहीं आती। उच्चायोग की गाड़ी को वैसे भी कोई रोकता नहीं है। वे देश के दूसरे हिस्से में भी आ जा सकते हैं।

कश्मीर में मौजूद पाकिस्तान के आतंकी संगठनों को कौन कहां से और किसके जरिए मदद पहुंचा रहा है, भारतीय जांच एजेंसियों ने इसका पता लगा लिया है। एनआईए और ईडी के अनुसार, आतंकियों के हमदर्द बने पाकिस्तानी उच्चायोग के कई अधिकारी और कर्मचारी रडार पर हैं।

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ऐसे आतंकियों तक पहुंचती है मदद

एनआईए और ईडी, आतंकियों के ऐसे कई मददगारों का खुलासा कर चुकी है। जिनकी जांच एजेंसियों ने ‘संपत्तियां भी जब्त की हैं। सुरक्षा एजेंसियों को शक न हो, इसलिए आतंकी संगठन पाकिस्तानी उच्चायोग की मदद लेते हैं। कश्मीर में बैठे आतंकियों के मददगार उच्चायोग से वह राशि आसानी से रिलीज करा लेते हैं।

आतंकी फंडिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने हिज्बुल मुजाहिदीन के सरगना सैयद सलाउद्दीन की जम्मू-कश्मीर में डेढ़ दर्जन संपत्तियों को जब्त किया है। सलाउद्दीन पाकिस्तान के रावलपिंडी में रहता है।

ईडी ने सलाउद्दीन, अहमद शाह वटाली और कई दूसरे लोगों के खिलाफ गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत दायर किए गए आरोप पत्र पर संज्ञान लेने के बाद धनशोधन का आपराधिक मामला दर्ज किया था।

यहां ये भी बता दें कि पड़ताल में पता चला था कि आतंकवादी हाफ़िज सईद के लिए कैशियर का काम कर रहे अहमद शाह वटाली जो कि कश्मीर में व्यवसाय करते थे, वे हुर्रियत एवं दूसरे अलगाववादी संगठनों की मदद से आतंकियों व पत्थरबाजों को धन और दूसरे संसाधन उपलब्ध कराते रहे हैं।

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