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इलाज और मेडिकल पढ़ाई में होगा सुधार, सरकार ने उठाया यह कदम

डाक्टरों की कमी और मेडिकल शिक्षा की गड़बडियों को दूर करने के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन बिल राज्य सभा में पास हो गया है। लोकसभा ने इसे 29 जुलाई को पास कर दिया था।

Dharmendra kumar

Dharmendra kumarBy Dharmendra kumar

Published on 1 Aug 2019 2:23 PM GMT

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नई दिल्ली: डाक्टरों की कमी और मेडिकल शिक्षा की गड़बडियों को दूर करने के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन बिल राज्य सभा में पास हो गया है। लोकसभा ने इसे 29 जुलाई को पास कर दिया था। वैसे ये बिल फिर लोकसभा जाएगा, क्योंकि सरकार ने इसमें कुछ संशोधन कर दिए हैं। इस बिल का इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और देश भर के रेजीडेंट डाक्टरों ने कड़ा विरोध किया था।

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नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया का स्थान लेगा। एनएमसी देश में मेडिकल शिक्षा, मेडिकल पेशे और संस्थानों के सभी पहलुओं के विकास और नियमन का काम करेगा। मोदी सरकार नेशनल मेडिकल कमीशन बिल को सबसे बड़े सुधारों में से एक मान रही है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया एक्ट 1956 अब समाप्त हो जाएगा।

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'नेशनल मेडिकल कमीशन' के तहत कम्यूनिटी हेल्थ प्रोवाइडर्स यानी सीएचपी के लिए लाइसेंसी व्यवस्था होगी जिनको प्राथमिक स्वास्थ्य की दिशा में आधुनिक इलाज यानी एलोपैथी की प्रैक्टिस करने का हक मिलेगा।

अभी तक ये अधिकार सिर्फ एमबीबीएस डिग्रीधारकों के पास ही है। आजादी से पहले भारत में भी ये सिस्टम था। लाइसेंसी डॉक्टरों के लिए साढ़े तीन साल की पढ़ाई लाजिमी होती थी, जबकि एमबीबीएस के लिए साढ़े पांच साल का कोर्स था।

1946 में देश में 47 हजार 524 पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनर थे जिनमें करीब 30 हजार लाइसेंसी थे। एनएमसी बिल के जरिए सीएचपी व्यवस्था लागू हो सकेगी।

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15 मिनट की वॉकिंग दूरी पर हमेशा उपलब्ध हैं डॉक्टर

2001 में बने राज्य छत्तीसगढ़ के हिस्से में उस समय सिर्फ एक मेडिकल कॉलेज आया था। डॉक्टर भी बहुत कम थे। ऐसे में छत्तीसगढ़ ने प्राथमिक स्वास्थ्य की दिशा में सुधार के लिए तीन साल का डिप्लोमा कोर्स शुरू किया था और डिप्लोमाधारकों को ग्रामीण मेडिकल असिस्टेंट के तौर पर भर्ती किया था।

असम में 2005 में साढ़े तीन साल के कोर्स को पास करने वालों को कम्युनिटी हेल्थ वर्कर के तौर पर भर्ती किए जाने का सिलसिला शुरू हुआ। इन कोशिशों का नतीजा ये हुआ कि दोनों राज्यों में ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर सामान्य से ज़्यादा काबू पाया गया।

इसके अलावा महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जैसे अति पिछड़े ग्रामीण इलाके में भी इस तरह की शुरुआत की गई। हिमाचल प्रदेश के गांवों में भी इस तरह की कोशिशें हुईं, जिसके नतीजे बेहतर दिखाई दिए। चीन में 1960 के दशक में इस तरह का स्वास्थ्य सुधार ढांचा बनाया गया था।

आज वहां हर गांव में कम से कम एक डॉक्टर 15 मिनट की वॉकिंग दूरी पर हमेशा उपलब्ध है। क्यूबा, फिलीपींस और थाईलैंड में ग्रामीण स्तर पर ट्रेंड स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और स्थानीय सामुदायिक डॉक्टरों की सेवाएं चलन में हैं।

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खास बातें

-आयुष डाक्टरों को 6 महीने के ब्रिज कोर्स के बाद एलोपैथी इलाज करने का अधिकार मिलेगा।

-करीब साढ़े तीन लाख कम्यूनिटी हेल्थ प्रोवाइडर्स को इलाज करने व दवा लिखने का लाइसेंस मिल सकेगा।

-भारत में अब तक मेडिकल शिक्षा, मेडिकल संस्थानों और डॉक्टरों के रजिस्ट्रेशन से जुड़े काम मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) की जिम्मेदारी थी, अब मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की जगह नेशनल मेडिकल कमीशन ले लेगा।

-पूरे देश में एमबीबीएस के फाइनल वर्ष के छात्रों को नेशनल एक्जिट टेस्ट (नेक्स्ट) देना होगा। ये परीक्षा पास करने के बाद ही वे पीजी में एडमिशन या प्रैक्टिस करने का लाइसेंस पा सकेंगे।

-अभी अमेरिका, यूके, कनाडा, आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड में मेडिकल की पढ़ाई करके छात्रों को भारत में प्रैक्टिस करने का आटोमेटिक लाइसेंस मिल जाता है लेकिन अब उन्हें ‘नेक्स्ट’ पास करना होगा।

-मेडिकल शिक्षण संस्थानों में अब सालाना निरीक्षण नहीं किया जाएगा।

-एनएमसी निजी मेडिकल कालेजों की ५० फीसदी सीटों पर फीस तय करेगा।

-एनएमसी के किसी भी सुझाव को खारिज करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होगा।

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