77 मासूमों की मौत का गवाह बना अस्पताल, रिपोर्ट में सामने आई ये वजह…

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में स्थित बीआरडी अस्पताल में सैंकड़ों बच्चों की मौत का मामला जब सामने आया तो प्रदेश समेत पूरे देश के लिए बड़ा मुद्दा बन गया, वहीं अब राजस्थान के कोटा का एक अस्पताल कई नवजात बच्चों की मौत का गवाह बना है। कोटा में एक महीने के अंदर 77 नवजात बच्चों की मौत का मामला सामने आया है।

Published by Shivani Awasthi Published: December 31, 2019 | 12:53 pm
Modified: December 31, 2019 | 1:03 pm
children Death

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कोटा: उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में स्थित बीआरडी अस्पताल में सैंकड़ों बच्चों की मौत का मामला जब सामने आया तो प्रदेश समेत पूरे देश के लिए बड़ा मुद्दा बन गया, वहीं अब राजस्थान के कोटा (Kota) का एक अस्पताल कई नवजात बच्चों की मौत का गवाह बना है। कोटा में एक महीने के अंदर 77 नवजात बच्चों की मौत का मामला सामने आया है। इस बात की जानकारी होते ही जांच के लिए कमेटी गठित की गयी, जिन्होंने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है।

कोटा में स्थित जेके लोन अस्पताल में 77 बच्चों की मौत:

राजस्थान के कोटा में स्थित जेके लोन अस्पताल में एक माह के अंदर 77 बच्चों की मौत हो गयी। नवजातों की मौतों का मामला सामने आने बवाल शुरू हो गया। बढ़े बवाल को देखते हुए राज्य सरकार की ओर से राजधानी जयपुर के एसएमएस मेडिकल कॉलेज के दो विशेषज्ञ चिकित्सकों की एक जांच कमेटी बनाई गई।

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इस कमेटी में एसएमएस के एडिशनल प्रिंसिपल डॉ. अमरजीत मेहता और डॉ. रामबाबू शर्मा शामिल हैं।

जांच कमेटी ने सरकार को सौंपी रिपोर्ट:

जांच कमेटी ने सोमवार को अपनी रिपोर्ट पेश कर दी, जिसमें इलाज में खामी की वजह से बच्चों की मौत की बात को नकारा गया है। रिपोर्ट में कहा गया कि बच्चों को ठंड में जीप या अन्य वाहनों में अस्पताल लाया गया, जो मौत का एक बड़ा कारण बनी। वहीं रिपोर्ट के मुताबिक़, बच्चों की मौत ऑक्सीजन पाइपलाइन नहीं होने के कारण इंफेक्‍शन फैलने और ठंड के चलते हुई है।

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कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक, अस्पताल के नियोनेटल आईसीयू में ऑक्सीजन की पाइपलाइन नहीं है। यहां सिलेंडरों से ऑक्सीजन सप्लाई की गई। ऐसे में बच्चों में इन्फेक्शन बढ़ गया। जिससे उनकी मौत हो गयी।

कमेटी ने दिए रिपोर्ट में सुझाव:

वहीं कमेटी ने रिपोर्ट में हालात सुधारने को लेकर सुझाव दिए हैं। इसके तहत अस्पताल में उपलब्ध उपकरणों की बीएसबीवाई और आरएमआरएस कोष से त्वरित मरम्मत कराने का सुझाव दिया गया। वहीं एनआईसीयू में ऑक्सीजन सप्लाई के लिए पाइपलाइन डालने और पीडियेट्रिक वार्ड के विभागाध्यक्ष को स्थायी रूप से अस्पताल में बैठने को कहा गया।

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