प्राइवेट ट्रेन चलाने के लिए जुटीं टॉप कंपनियां, देखिए नाम

भारत में ट्रेनें चलाने के लिए प्राइवेट कंपनियों को दिए गए न्यौते का खूब स्वागत किया गया है। कम से कम दो दर्जन कंपनियों ने भारत सरकार की पेशकश में रुचि दिखाई है। इन कंपनियों में आल्सटॉम ट्रांसपोर्ट, बॉम्बार्डियर, सीमेन्स एजी और मैक्वेरी जैसी दिग्गज कंपनियां शामिल हैं।

नीलमणि लाल

नई दिल्ली: भारत में ट्रेनें चलाने के लिए प्राइवेट कंपनियों को दिए गए न्यौते का खूब स्वागत किया गया है। कम से कम दो दर्जन कंपनियों ने भारत सरकार की पेशकश में रुचि दिखाई है। इन कंपनियों में आल्सटॉम ट्रांसपोर्ट, बॉम्बार्डियर, सीमेन्स एजी और मैक्वेरी जैसी दिग्गज कंपनियां शामिल हैं। इनके अलावा टाटा, अडानी पोर्ट्स, आईआरसीटीसी, नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट फंड (एनआईआईएफ) और केईसी इंटेनेशनल लि. जैसी देशी कंपनियों ने भी रुचि दिखाई है। प्राइवेट कंपनियों के बीच टेंडर या नीलामी की प्रक्रिया चंद हफ्तों में शुरू होने की उम्मीद है। कंपनियां रूटों के नेटवर्क के लिह बोलियां लगाएंगीं और रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल पर उनका चयन किया

सरकार का इरादा 100 रूटों पर प्राइवेट कंपनियों की ट्रेनें चलाने का है। इस कदम से सरकार का ट्रेन संचालन पर एकाधिकार समाप्त हो जाएगा और साथ ही भारतीय रेलवे में जिस भारी निवेश की जरूरत है उसकी पूर्ति भी हो जाएगी। शुरुआत में 100 रूटों पर प्राइवेट ऑपरेटर 150 आधुनिक ट्रेनें चलाएंगे और यात्रियों को वल्र्ड क्लास तकनीक और सेवाएं मिलेंगी।

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भारतीय रेलवे अभी 13 हजार यात्री ट्रेनें संचालित कर रही है। रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष विनोद यादव के अनुसार बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए 20 हजार ट्रेनों की जरूरत है। बोर्ड अध्यक्ष ने कहा है कि पहली प्राइवेट ट्रेन चलने में कम से कम दो साल का वक्त लगेगा।

-योजना के अनुसार, इन्फ्रास्ट्रक्चर, मेंटेनेंस, ऑपरेशंस और सुरक्षा का काम भारतीय रेलवे के हाथ में रहेगा। प्राइवेट ऑपरेटर लीज पर रेक ले कर यात्रियों को ऑन बोर्ड सुविधाएं प्रदान कर सकेंगे। प्राइवेट ऑपरेटर को 35 साल तक ट्रेनें चलाने की इजाजत मिलेगी।

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-नीति आयोग और रेल मंत्रालय के अनुमान के अनुसार 100 रूटों पर 150 प्राइवेट ट्रेनें चलाने के लिए 22500 करोड़ का निवेश करना होगा। अभी लखनऊ-दिल्ली और मुम्बई-अहमदाबाद रूट पर निजी ट्रेनों का संचालन हो रहा है। इस कड़ी में तीसरी ट्रेन होगी वाराणसी-इन्दौर रूट की।

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मजबूरी है निजी क्षेत्र को न्यौता

पिछले एक दशक से भारतीय रेलवे की समस्याएं तेजी से बढ़ी हैं। अब नौबत ये आ गई है कि भारतीय रेलवे का ऑपरेटिंग रेशियो 2018-19 में 98.4 फीसदी तक पहुंच गया। इसका मतलब ये है कि रेलवे जो एक रुपया कमाती है उसमें से 98.4 पैसे उसे खर्च कर देने पड़ते हैं। इसके बाद किसी प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए पैसा बचता ही नहीं है। रेलवे के 68400 किमी लंबे नेटवर्क में अब जबर्दस्त ट्रैफिक जाम की स्थिति है। रेलवे का 80 फीसदी ट्रैफिक 40 फीसदी ट्रैक पर है। आधुनिकीकरण की रफ्तार बेहद सुस्त है। हर साल रेलवे को 30 हजार करोड़ का घाटा होता जा रहा है। ये यात्री सेवाओं पर ही है। ऐसे में निजी क्षेत्र की मदद ही एकमात्र रास्ता बच रहा है।