मनोनयन से बचेगी उद्धव की कुर्सी, कैबिनेट ने राज्यपाल के पास भेजा प्रस्ताव

आखिरकार महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की कुर्सी बचाने का रास्ता ढूंढ लिया गया है। कोरोना संकट के कारण राज्य में एमएलसी का चुनाव बेमियादी टलने के बाद उद्धव ठाकरे को राज्यपाल कोटे से एमएलसी बनाने का फैसला किया गया है।

मनोनयन से बचेगी उद्धव की कुर्सी, कैबिनेट ने राज्यपाल के पास भेजा प्रस्ताव

अंशुमान तिवारी

नई दिल्ली। आखिरकार महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की कुर्सी बचाने का रास्ता ढूंढ लिया गया है। कोरोना संकट के कारण राज्य में एमएलसी का चुनाव बेमियादी टलने के बाद उद्धव ठाकरे को राज्यपाल कोटे से एमएलसी बनाने का फैसला किया गया है। महाराष्ट्र कैबिनेट ने इस बाबत प्रस्ताव भी पारित कर दिया है और इसे राज्यपाल के पास भेज दिया गया है। इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद उद्धव ठाकरे की कुर्सी पर छाए संकट के बादल अब साफ होते नजर आ रहे हैं।

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कैबिनेट बैठक में फैसला

इस बाबत महाराष्ट्र के वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री नवाब मलिक ने बताया कि आज की कैबिनेट मीटिंग में फैसला किया गया है कि राज्यपाल द्वारा मनोनीत की जाने वाली दो सीटों में से एक सीट पर सीएम उद्धव ठाकरे के नाम की सिफारिश की जाए। अब देखने वाली बात यह होगी कि कैबिनेट के इस प्रस्ताव पर राज्यपाल क्या कदम उठाते हैं।

चुनाव टलने से पैदा हुआ संकट

कोरोना वायरस का सबसे भीषण प्रकोप महाराष्ट्र में फैला हुआ है और राज्य के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे इन दिनों कोरोना वायरस के भारी संकट से जूझ रहे हैं। इस बीच एक दूसरा बड़ा संकट उनकी कुर्सी के लिए खड़ा हो गया था।

महाराष्ट्र में सीएम का पद संभालने के बाद अभी तक उद्धव विधानसभा या विधानपरिषद के सदस्य नहीं बन सके हैं। कोरोना संकट की वजह से महाराष्ट्र में एमएलसी का चुनाव भी टाल दिया गया है। इस कारण उद्धव की सीएम की कुर्सी पर भी संकट के बादल मंडराने लगे थे।

28 मई है डेडलाइन

उद्धव को महाराष्ट्र की कमान संभाले करीब साढ़े चार महीने हो चुके हैं। उन्होंने पिछले साल 28 नवंबर को सूबे की कमान संभाली थी। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार उन्हें छह महीने के भीतर राज्य के किसी सदन का सदस्य होना जरूरी है।

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उनके लिए यह छह महीने की अवधि 28 मई तक है और उसके पहले ही उन्हें विधानमंडल का सदस्य बनना होगा, लेकिन कोरोना ने उनके रास्ते में बाधाएं खड़ी कर दीं।

संभव नहीं था चुनाव कराना

यदि उद्धव ठाकरे विधानसभा का सदस्य बनना चाहते तो इसके लिए उन्हें अपनी पार्टी के किसी विधायक का इस्तीफा दिलवाना होता। महाराष्ट्र की सियासत की स्थितियों को देखते हुए उद्धव ठाकरे इसके लिए तैयार नहीं थे।

यदि उद्धव ठाकरे इसके लिए तैयार भी हो जाते तो मुश्किलें खत्म होती नहीं दिख रही थी। सूबे में मौजूदा स्थितियों को देखते हुए चुनाव कराना संभव नहीं था।

टल चुका है एमएलसी का चुनाव

दूसरा रास्ता विधानपरिषद का सदस्य बनना है और इसके लिए आयोग को सिर्फ 15 दिन पहले ही अधिसूचना जारी करनी होती है। महाराष्ट्र विधानपरिषद के 9 सदस्यों का कार्यकाल 24 अप्रैल को खत्म होने वाला है। इन नौ सीटों पर चुनाव होने वाले थे मगर कोरोना संकट की वजह से चुनाव आयोग ने इसे टाल दिया है और वह भी बेमियादी।

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मुश्किल में फंस गई थी शिवसेना

अभी तक शिवसेना के नेता विधानपरिषद की सीट को लेकर काफी निश्चिंत थे क्योंकि उनका मानना था के परिषद का सदस्य बनकर उद्धव की सारी मुश्किलें दूर हो जाएंगी। लेकिन चुनाव आयोग के बेमियादी चुनाव टालने से शिवसेना के सामने एक बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई थी।

मनोनयन वाली दो सीटें रिक्त

इसके बाद शिवसेना के नेता उद्धव की कुर्सी को बचाने के लिए दूसरे विकल्पों पर विचार करने लगे। अब उद्धव के सामने सिर्फ दो ही विकल्प बचे थे। इसमें पहले विकल्प का फैसला राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के हाथों में है। विधानपरिषद में राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाने वाले सदस्यों की दो सीटें अभी रिक्त पड़ी हैं।

इनमें एक सीट के लिए राज्य सरकार ने उद्धव का नाम राज्यपाल के पास भेजने का फैसला किया है। यदि राज्यपाल इस सिफारिश पर अपनी सहमति जता देते हैं तो उद्धव की कुर्सी बच सकती है। अब हर किसी को राज्यपाल के कदम का इंतजार है।

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दूसरे विकल्प में थीं मुश्किलें

उद्धव के सामने जो दूसरा विकल्प बचा था वह काफी मुश्किलों भरा था। दूसरा विकल्प यह था कि शपथ ग्रहण से 6 माह की अवधि पूरा होने से पहले ही उद्धव ठाकरे अपने पद से इस्तीफा दे देते और उसके बाद दोबारा सीएम पद की शपथ लेते।

ऐसा करने पर उन्हें विधानमंडल का सदस्य बनने के लिए छह महीने का और समय मिल जाएगा। कोरोना वायरस के इस दौर में केवल कुर्सी बचाने के लिए यह सब करना संभव नहीं दिख रहा था। इसीलिए उद्धव को राज्यपाल कोटे से विधानपरिषद का सदस्य मनोनीत कराने का फैसला किया गया।

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