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जन्मदिन विशेष: कल्याण सिंह की जनतंत्र को निहारती कविताएं

स्वदेशी के हिमायती कल्याण सिंह एक संवेदनशील कवि भी हैं। लोक जीवन की चेतना का उददेश्य लोकाभ्यास को स्फूर्ति प्रदान करना है। इसके लिए कृत्रिमता को त्यागकर लोक जीवन को अपनाया जाना ही एकमात्र विकल्प है- यह मानना है साहित्यकार कल्याण सिंह का।

Shivani Awasthi

Shivani AwasthiBy Shivani Awasthi

Published on 5 Jan 2021 4:46 AM GMT

जन्मदिन विशेष: कल्याण सिंह की जनतंत्र को निहारती कविताएं
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Yogesh-Mishra

योगेश मिश्र

कर्जे में तू पैदा होता। कर्जे में ही पलता है। जीवन भर कर्जे का बोझा। कर्जे में ही मरता है। तेरी इज्जत, तेरी मेहनत। कौड़ी मोल बिकाती क्यों? नंगे पैरों मालिक चलता। नौकर चलता कारों से। देश की खुशहाली का रास्ता। गांव, गली, गलियारों से- ये सवाल अपनी कतिवाओं में उठाते हैं- कल्याण सिंह।

स्वदेशी के हिमायती कल्याण सिंह एक संवेदनशील कवि भी

आज उन्हें राजनीति के चाहें जितने भी पैतरे आ गये हों, परन्तु उनकी कविताओं में समाज के लिए एकात्म-मानववाद की अनुगूंज मिलती है। स्वदेशी के हिमायती कल्याण सिंह एक संवेदनशील कवि भी हैं। लोक जीवन की चेतना का उददेश्य लोकाभ्यास को स्फूर्ति प्रदान करना है। इसके लिए कृत्रिमता को त्यागकर लोक जीवन को अपनाया जाना ही एकमात्र विकल्प है- यह मानना है साहित्यकार कल्याण सिंह का।

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साहित्यकार कल्याण सिंह की काव्य रचनाओं का कैनवस बेहद विराट

लोक जीवन जब-जब सामयिक से प्रभावित होता है, लोक चेतना को दृष्टि मिलती है। इसके द्वारा नयी मान्यताओं को स्थापित किया जाता है। इनके गीतों में ऐसी स्थापनाएं देखी जा सकती हैं। वह एक वस्तुष्ठि दृष्टि सम्पन्न कवि हैं। उनकी काव्य रचनाओं का कैनवस इतना विराट है कि जीवन में विभिन्न पक्षों, स्थितियों और यहां तक कि अपने समय को उनके गीतों में देखा जा सकता है। तभी तो अपनी रचनाओं में वे कहते हैं।

फूटे घर-घरौंदे तेरे

टूटी छान छपरिया रे

सूराखों से पानी टपके

भीगे तेरी खटिया रे

अंधियारे में कटे जिंदगी

बिना दिया, बिन डिबिया रे

तेरी घरवाली के तन पर

फटी-फटाई अंगिया रे

इस सड़ांध में आग लगा दे

क्रांति भरे अंगारों से....।

अभिव्यक्ति के लिए चुना काव्य माध्यम

भारतीय लोक जीवन की चेतना सदैव संस्कृतिमूलक रही है। जिसमें जीवन का सक्रिय रूप उभरता रहा है। हमारी लोक चेतना के आदि प्रमाण वेद हैं। वेदों के संहिताकाल से बुद्धकाल या फिर हमारे समय की लोक चेतना सांस्कृतिक समाजवाद से परिवर्तित होकर धीरे-धीरे एकात्म मानववाद में समाहित हो गयी जिसे अपनी अभिव्यक्ति के लिए इन्होंने काव्य माध्यम के रूप में चुना। लिख उठे-

सरकारी अजगर बैठे हैं। तुझ पर कसा शिकंजा है।

दबा रहा तेरी गर्दन को

उनका खूनी पंजा है

रहबर तेरे बने लुटेरे

रक्षक तेरे भक्षक हैं

कदम-कदम पर डसे जा रहे

यह जहरीले तक्षक हैं

लातों के ये भूत न मानें

बातों से, मनुहारों से....।

कल्याण सिंह ने लिखा ‘किसानों का अधिकार पत्र'

किसानों के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए लिखी गयी ‘किसानों का अधिकार पत्र’ उनकी एक सार्थक रचना है जो उनके जनहितैषी सृजन शक्ति का अंतरंग परिचय देती है। कल्याण सिंह ने वाराणसी जेल में रहते हुए डेढ़-दो दर्जन कविताएं लिखी हैं जो वैचारिक प्रतिबद्धता और सरोकारों का जीवन्त दस्तावेज है। उनके गीतों में मानव समाज के स्वाभाविक संघर्ष, हलचल, रूपांतर और राजनीतिक परिवर्तनों को लेकर जो एक क्रमश: इतिहास रचा गया है-वह उनके पाठकों को एक खास तरह से ऊर्जस्वित करता है। यद्यपि इनका कोई कविता संग्रह अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है और न ही उनकी कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में उस तरह से प्रकाशित हुई है जिसमें उनकी छवि एक कवि के रूप में उभर सके, फिर भी उनके पाठक और प्रशंसक हैं।

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मिरोस्लाव होलुब तो एक कवि की सार्थकता के लिए केवल तीन पाठकों की बात करते हैं। ये भारतीय राजनीति के उन अध्यव्यवसायियों में हैं जिनकी कविताओं पर तत्कालिक राजनीतिक और उनके दलीय सरोकार इतने हावी नहीं रहे कि वे देश तथा समाज के लिए दीर्घकालीन और स्थायी सवालों तथा सरोकारों को भुला दें।

Kalyan Singh

एक तटस्थ दृष्टा को उन्होंने अपने भीतर हमेशा बचाये रखा और सामने घट रही घटनाओं के नेपथ्य में चल रही अत्यंत महीन अंतरक्रियाओं पर बराबर नजर रखी। जीवनानुभव के दायरे में अनेक ऐसी बातें आती हैं जो प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति को आन्दोलित करती हैं। सामान्य व्यक्ति जहां किंचित सोच के पश्चात इन बातों को भुला देता है, रचनाकार उन्हें शब्द देकर किसी विधा का अंग बना देता है। तभी तो इनकी रचनाओं में साफ झलकता है-

दुनियाभर का तन ढकता है

फिर भी तू ही नंगा क्यों

भरता है तू पेट सभी का

फिर तू ही भिखमंगा क्यों

तेरे ही बच्चों की फीकी

होली और दीवाली क्यों

रोता हुआ दशहरा तेरा

ये बिहड़ बेहाली क्यों

कंगाली के दाग मिटा दे

तीज और त्याहारों से....।

खुरदुरे चेहरे पर ठोस मौन। पारदर्शी आंखों से झांकती चंचलता भी ऐसी जो हर वक्त अजीब सी बेचैनी बुनती रहती है। मनुष्य से मनुष्य तक की एक अविराम यात्रा से सीधे तौर पर राजनीति से जुड़ा यह कवि आज भी गांव की मिट्टी के गर्द, लहलहाती फसलों के बीच की पगडंडियां, खेत-खलिहानों से जुड़े लोगों का दर्द, धूल-धूसरित जीवन की मस्ती और रसमयता में सराबोर चित्र को अपने काव्य का विषय बनाता है। जब जिन्दगी के किसी पड़ाव पर हारने की नौबत आती है तो अपनी कविताओं को आगे कर देता है। आदमी बनने और लोगों को बने रहने देने के लिए ही स्वयं को अपने समय के किसी सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलन में झोंक देने का संकल्प सजाये हुए वे अपने साहित्य यात्रा से इतर खड़े हो गये पर साहित्य को भी बनाये रखा।

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क्षण-क्षण विकेन्द्रीत/ केन्द्रीत होती राजनीति। अस्थिर/ स्थिर और नितांत उत्तर आधुनिक परदर्शी जनतंत्र को निहारती हुई उनकी कविताओं में इतिहास और संस्कृति, मनुष्य और समाज, मिथक और यथार्थ निरंतर एक-दूसरे के आर-पार होते हैं और वे अपनी कविता में ऐसा प्रिज्म तैयार करते हैं जिसमें होकर ये चीजें अपने अलग-अलग रंगों के साथ हमारी पहचान का हिस्सा होती चलती हैं।

इतिहास, राजनीति, दर्शन ,पीढ़ियों को कल्याण सिंह ने अपने काव्य में बहुत गंभीरता से पकड़ा

संस्कृति, इतिहास, राजनीति, दर्शन पीढ़ियों के पहचान का संकल्प, रूमानियत मूल्य, सभ्यता की दरारें इन सबको कल्याण सिंह अपने काव्य में बहुत गंभीरता से पकड़ते हैं मगर इन सबके साथ-साथ जीवन की अपनी जो निरंतरता है, उसमें इत्तेफाकों और अनिश्चितताओं के लिए जो एक नियतिवादी गुंजाइश है, उसमें जो अपरिभाषित रह जाने वाला तत्व है उसकी मौजूदगी उन्हें समय से आगे ले जाती है। इनका ‘आब्जर्वेशन’ अनुभवों के साथ मिलकर एक ऐसा रचना संसार बनाता है जो बेहद पठनीय और असली होता है। यथा -

तेरा बहुमत, तेरी ताकत

लेकिन राज अमीरों का

इस साजिश का तू शिकार है

कैदी तू जंजीरों का

भीख नहीं, अधिकार चाहिए।

यही लड़ाई लड़नी है हर पीड़ित की पीर मिटानी

फटी बिवाई भरनी है

तू अपनी तकदीर बदल दे

इन्कलाब के नारों से....।

इनकी कविताओं में जीवन का भेद बहुत कम है। जिसकी जिन्दगी को समाज का सबसे उत्पीड़ित, गरीब तबका निरन्तर जी रहा है, जिस जिन्दगी के मानी मे ज्यादा हिस्सा अपने को जीवित रखने के जदृदोजहद से जुड़ा है, वह सब चित्रित है। इनकी कविताओं में बसी और बिखरती जिन्दगियां ऐसी हैं जिनका परिचय आमतौर पर हम सबसे है। पुराने संसार की सुपरिचित और स्थापित का लगभग ध्वंस और नये संसार के नयन-नक्श का अस्पष्ट भ्रूणावस्था में होना ही यदि संक्रांति है तो हम सब मानवीय इतिहास की सबसे बड़ी संक्रांति से गुजर रहे हैं।

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बहु संरचनात्मक भारतीय यथार्थ का इतिहास भंवर की लपेट

बहु संरचनात्मक भारतीय यथार्थ इस इतिहास भंवर की लपेट में है। यह अकारण नहीं है आज के बौद्धिक विमर्शों में या तो ‘अंतों’ की घोषणाओं का बाहुल्य है या ‘संकेतों’ की उद्घोषणाओं की अधिवक्ता या फिर रूढ़ियों और आक्रामक धर्मांधताओं से बनी किन्हीं अन्य गुहाओं में लौटाने के लिए आह्वान।

वस्तुतः यह सब संक्रांति की लाक्षणिक अभिव्यक्तियां हैं क्योंकि मानवीय यथार्थ में आया मूलगामी परिवर्तन पुरानी अवधारणाओं को उजागर करते हुए उन पर बुनियादी पुनर्चिन्तन की मांग करता है। यथार्थ से कट चुकी अवधाराणाओं की स्वायत्त संरचनाओं के लिए इन तथ्यों और नवजात प्रश्नों को स्वीकारना भले ही कठिन या आत्मघाती हो लेकिन खुले दिलों-दिमाग से सोचने और समझने वाले इस भयावह उथल-पुथल में जनहितों के पक्षधर बौद्धिकों के लिए यह संक्रांति और तत्जनित अवधारणात्मक संकट एक सर्वव्यापी सच्चाई है।

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जीवन के लम्बे रास्ते की सारी कथाएं मन में रखकर बरसों तक सुनते-सुनाते पढ़ने और फिर -फिर पढ़ने के लिए होती हैं, इस दौरान हर अच्छे साहित्य में नये-नये पहलू पंखुड़ियों की तरह स्वयमेंव खुलते चले जाते हैं। कई ऐसे भी पहलू होते हैं जो लेखक खुद भी नहीं जानता।

लेखक का भाषा से, अपने पात्रों से अचानक साक्षात्कार, बेवजह टकराव, नये परिवेश से समझौता, उसकी चश्मदीद गवाहियां और उसके जीवन का इस पूरे परिदृश्य से रिश्ता यह सब ऐसी बातें हैं जिन्हें किसी भी पंड़िताउ टीकावाद या दर्शन की भारी-भरकम व्याख्या के नव बन्धनों में जकड़ना ठीक नहीं है। यही कारण है कि कल्याण सिंह की कविताओं को इन मानदण्डों पर तौला, परखा और विश्लेषित नहीं किया जा सकता, क्योंकि इनकी कविताओं में भाषा का अपने पात्रों से अचानक हो रहा साक्षात्कार उनके मन में अन्दर कहीं बेहद बारीक तरीके से चल रहे सोच का प्रस्फुटन है। तभी तो कह उठते है-

श्रम का शोषण नहीं रहेगा।

ऐसा देश बनाएंगे

व्यक्ति बदले देंगे

बदलेंगे सड़ी व्यवस्था भारत की

मिले किसान, मजदूरों का हक

नयी व्यवस्था भारत की

उठ धरती के लाल

लड़ाई लड़नी है बटमारों से....।

अपने जीवन के सपने को राजनीति के माध्यम से सच करने में जुटे कल्याण सिंह अपना संकल्प, अपनी कविता में बहुत पहले ही स्वीकार कर चुके हैं। इनकी कविता वही बोलती है जो वे करना चाहते हैं। इनके काव्य में इनका संकल्प तो है ही, संकल्प की ठोस अभिव्यक्ति भी है। इसका प्रमाण इनकी कविताओं की इन लाइनों से मिल सकता है-

हर जवान को काम मिले

हर नारी को सम्मान मिले

हर बच्चे को मिले पढ़ाई

हरिजन को उत्थान मिले

खेत-खेत को मिले सिंचाई

हर रोगी को प्राण मिले

झोपड़ियों में जगे जिन्दगी....।

अंग्रेजी उपन्यासकार वर्जिीनया वुल्फ की बात को स्वीकार करें तो इनकी कविताएं जीवन को दूर से देखी गयी सुखान्तिका और पास से देखी गयी त्रासदी पर समाप्त होती हैं।

(कल्याण सिंह की कविताओं पर आधारित राष्ट्रीय सहारा में पूर्व प्रकाशित योगेश मिश्र का आलेख जस का तस प्रस्तुत है।)

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