आत्मनिर्भर भारत बनाने का संकल्प लेने का पर्व, अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व -दीपावली

दीपावली पर्व का धार्मिक ,सामाजिक एवं राजनैतिक तथा आर्थिक कारणों से बड़ा महत्व है। दीपावली को लेकर समाज में कई प्रकार की मान्यतायें प्रचलित हैं।

Published by मृत्युंजय दीक्षित Published: November 12, 2020 | 3:37 pm
Modified: November 12, 2020 | 3:41 pm
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दिवाली पर मृत्युंजय दीक्षित का लेख (Photo by social media)

मृत्युंजय दीक्षित

नई दिल्ली: भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता में पर्वों का बहुत महत्व है। जिसमें कार्तिक माह में दीपावली पर्व का विशेष महत्व है तथा यह पांच दिनों तक मनाया जाता है इसी कारण इसे पांच दिवसीय दीपावली भी कहते हैं। दीपावली का प्रत्येक दिन स्वच्छता का संदेश देता है और लोग व्यापक पैमाने पर अपनी दुकानों और घरों तथा कार्यालयों आदि में सफाई का अभियान चलाते हैं। दीपावली का तात्पर्य होता है दीपों की पंक्ति । यह पर्व कार्तिक माह की अमावस्या को मनाया जाता है इस दिन हिंदू समाज के लोग दीपों की रोशनी करते हैं। जिसके कारण अमावस्या की अंधेरी रात को प्रकाष की किरणें फैल जाती हैं। यही कारण है कि दीपावाली को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला पर्व भी कहा जाता है।

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दीपावली को लेकर समाज में कई प्रकार की मान्यतायें प्रचलित हैं

दीपावली पर्व का धार्मिक ,सामाजिक एवं राजनैतिक तथा आर्थिक कारणों से बड़ा महत्व है। दीपावली को लेकर समाज में कई प्रकार की मान्यतायें प्रचलित हैं।

पर्व पर सबसे बड़ी मान्यता यह है कि कार्तिक अमावस्या के दिन भगवान श्री रामचंद्र 14 वर्ष का वनवास पूरा करके तथा श्रीलंका के राक्षसराज रावण का वध करके अयोध्या वापस आये थे। तब अयोध्यावासियों ने राम के राज्यारोहण पर दीपमालाएं जलाकर महोत्सव मनाया था। इसीलिए दीपावली पर्व का अधिक महत्व है। यह भी मान्यता है दीपावली के ही दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी राक्षस नरकासुर का वध किया था। इस नृषंस राक्षस के वध से जनता को अपार हर्ष हुआ था और जनता ने दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं।

पौराणिक मान्यता है कि भगवान विष्णु ने इसी दिन नरसिंह का रूप धारण करके हिरण्यकष्यप का वध किया था तथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात श्रीलक्ष्मी व धन्वतंरि जी प्रकट हुए। यही कारण है कि दीपाावली के दिन धन की देवी श्रीलक्ष्मी की विशेष पूजा का विधान तो है ही वहीं आयुर्वेद चिकित्सा विधि में लगे सभी लोग भगवान धन्वंतरि की पूजा करते हैं।

पर्व पर कई अन्य घटनाओं का भी बड़ा महत्व है

दीपावली के पर्व पर कई अन्य घटनाओं का भी बड़ा महत्व है। जिसमें जैन मतावलंबियों के अनुसार चैबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी दीपावली को ही मनाया जाता है। अमृतसर में दीपावली के ही दिन 1577 में स्वर्ण मंदिर का शिलान्यास हुआ था। 1619 में दीपावली के ही दिन सिक्खों के छठे गुरू हरगोविंबंद सिंह जेल से रिहा हुए थे।

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diwali (Photo by social media)

दीपावली का पर्व भारत का सबसे प्रतिभाशाली व आध्यात्मिक रूप से मनाया जाने वाल पर्व है

दीपावली का पर्व भारत का सबसे प्रतिभाशाली व आध्यात्मिक रूप से मनाया जाने वाल पर्व है। दीपावली का यह तात्पर्य भी है कि तमसो मा ज्योतिर्गमय अर्थात अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाने वाला पर्व। दीपावलि स्वच्छता, समृद्धि का महापर्व है। विजयादषमी का पर्व समाप्त होते ही अमा जनमानस साफ-सफाई के महाअभियान में जुट जाता है। लोग अपने घरों , दुकानों आदि की सफाई का कार्य प्रारंभ कर देते हैं।

मान्यता है कि दीपावली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों दीप अर्थात दीया और श्रृंखला के मिश्रण से हुई है। दीपावली पर्व का पदम पुराण और स्कन्द पुराण में उल्लेख मिलता है। 7वीं शताब्दी के संस्कृत नाटक नागनंद में राजा हर्ष ने इस दीप प्रतिपादुत्सव कहा है जिसमें दिये जलाये जाते थे। 9वीं षताब्दी में राजशेखर ने काव्य मीमांसा में इसे दीपमालिका कहा है। जिसमें घरों की पुताई की जाती थी फारसी यात्री और इतिहासकार अल बेरूनी ने भारत पर अपने संस्मरण में दीपावलि को कार्तिक महीने में हिंदुओं द्वारा मनाया जाने वाला पर्व कहा है। एक प्रकार से दीपावली हर प्रकार से बुराई पर अच्छाई , अज्ञान पर ज्ञान और निराशा पर आशा की विजय का हर्षेल्लास वाला पर्व है।

दीपावली को पांच दिवसीय पर्व कहा जाता है

भारत के पूर्व क्षेत्र उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में हिंदू लक्ष्मी की जगह काली की पूजा करते हैं और इस पर्व को काली पूजा कहते हैं । दीपावली को पांच दिवसीय पर्व कहा जाता है। यह एक प्रकार से पर्वों का समूह है। दीपावली से दो दिन पूर्व धनतेरस का पर्व आता है। इस दिन बाजारों में चारों तरफ खरीदारी के लिए जनसमूह उमड़ पड़ता है। धनतेरस के दिन बरतन आदि खरीदना शुभ माना जाता है। इस दिन तुलसी या घर के द्वार पर एक दीपक जलाया जाता है। इससे अगले दिन नरक चर्तुदशी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन यम पूजा हेतु दीपक जलाये जाते हैं। अगले दिन दीपावली मनायी जाती है। इस दिन श्रीलक्ष्मी व गणेश जी की पूजा का विधान है।

लोग घर के लिए नये गणेश-लक्ष्मी खरीद कर लाते है तथा उनकी पूजा की जाती है

लोग घर के लिए नये गणेश-लक्ष्मी खरीद कर लाते है तथा उनकी पूजा की जाती है। दीपावली के दिन तंत्र -मंत्र – यंत्र का भी बड़ा विधान है। दीपावली के दिन रात्रि जागरण का भी महत्व है। दीपावली के दिन ज्योतिष के आधार पर लोग अपनी पूजा पाठ करते हैं तथा यंत्र आदि धारण करते हैं। दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा का विधान है मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर रख लिया था और बृजवासियों की भारी वर्षा से रक्षा की थी।

अगले दिन भाई दूज का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। इसे यम द्वितीया भी कहते हैं। इस दिन बहिन अपने भाई के तिलक लगाकर उसके लिए मंगल की कामना करती है। दीपावली के दूसरे दिन व्यापारी अपने बही खाते को बदल देेते हैं। वे अपनी दुकानों पर ही लक्ष्म पूजन करते हैं।

कृषक वर्ग के लिए भी इस पर्व का अपना विशेष महत्व है

कृषक वर्ग के लिए भी इस पर्व का अपना विशेष महत्व है। कृषक समाज दीपावली का पर्व अत्यंत उल्लास के साथ मनाता है। दीपावली पर खरीफ की फसल पककर तैयार हो जाती है। दीपावली पर घर-घर में रंगोली मनायी जाती है तथा दिये जलाये जाते हैं और आतिशबाजी की जाती है। दीपावली का पर्व समाज का हर वर्ग बेहद उत्साह और उमंग के साथ मनाता है क्योंकि यह पर्व समाज में उल्लास व प्रेम का संदेश भी फैलाता है । हिंदू समाज में इस पर्व के प्रति बेहद आस्था है तथा विशेष उत्साह व उमंग रहता हैं।

दीपावली पर्व का ऐतिहासिक महत्व भी है

दीपावली पर्व का ऐतिहासिक महत्व भी है। स्वामी रामतीर्थ का जन्म और महाप्रयाण दीपावली के दिन ही हुआ था। महर्षि दयानंद का दीपावली के ही दिन अवसान हुआ था, स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की थी। दीपावली का आर्थिक महत्व भी है। यह पर्व नये कपड़े, घर के समान उपहार सोने और अन्य खरीदारी का समय है। इस पर्व पर खर्च और खरीदारी का बड़ा महत्व है। दीपावली के समय खरीदारी एक उत्सव की तरह मनायी जाती है।

दीपावली का पर्व विदेशों में भी धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व नेपाल, मलेशिया, सिंगापुर, श्रीलंका, आस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका , ब्रिटेन, न्यूजीलैंड , फिजी और मॉरीशस में भी धूमधाम से मनाया जाता है।

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कोरोना महामारी के काल में इस पर्व का महत्व अैर भी बढ़ गया है

कोरोना महामारी के काल में इस पर्व का महत्व अैर भी बढ़ गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूरा भारत इस बार आत्मनिर्भर भारत ओर लोकल फार वोकल वाली दिवाली बना रहा है। देश के अधिकांश हिस्सों में गाय के गोबर से बने दीये और गणेश -लक्ष्मी की इस बार धूम मची हुयी है।

प्रदेश व देश का व्यापारी वर्ग भी इस स्वदेशी अभियान में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहा है। जनमानव ही नहीं अपितु व्याारी समुदाय ने भी इस बार चीनी उत्पादों का बहिष्कार करने का फैसला लिया है जिसका असर बाजारों में दिखलायी भी पड़ रहा है। इस बार चीनी झालर व अन्य सामग्री बाजारों से गायब है। हम सभी को इस दीपावली आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का संकल्प भी लेना चाहिए। अगर हम आत्मनिर्भर हो गये तो विश्व की कोई ताकत हम पर दबाव नहीं डाल सकती और झुका नहीं सकती।

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