नया कश्मीरः राजनीतिक कैनवास के सलीब पर कौन

इसके अलावा हाल के पंचायत व निकाय चुनावों में जीत कर आए ज्यादातर क्षत्रप युवा हैं इनके पास विकासपरक सोच है। यही वह ट्रंप कार्ड हैं जो नए कश्मीर के विकास की इबारत लिखकर कश्मीर की राजनीति में रिक्त स्थान की भरपाई करेंगे।

नया कश्मीरः राजनीतिक कैनवास के सलीब पर कौन

नया कश्मीरः राजनीतिक कैनवास के सलीब पर कौन

रामकृष्ण वाजपेयी
रामकृष्ण वाजपेयी

कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले और शेष भारत से अलग थलग करने वाले विशेष अस्थाई प्रावधानों अनुच्छेद 370 और 35ए के हटने और जम्मू-कश्मीर के दो अलग केंद्र शासित प्रदेशों में बंटने के बाद अब जबकि यह साफ हो चला है कि हिंसा और अलगाववाद का दौर बीते कल की बात हो गया है।

अब नए कश्मीर की इमारत तराशने, भविष्य की उपलब्धियां और चुनौतियों के मुकाबले के लिए राजनीतिक दलों की भूमिका, राजनीतिक दलों के विजन, उनकी रणनीति पर विचार के साथ ही कश्मीर में बीते 70 सालों से चल आ रहे राजनीतिक परिदृश्य में जो बदलाव आ गया है उसे स्वीकारने समझने के इस राज्य के नेताओं के सामने सबसे बड़ा सवाल अपने वजूद को बरकरार रखने का है। और इस के लिए इन नेताओं को भी पुराना पैटर्न छोड़कर नए तौर तरीकों को स्वीकार कर राज्य की जनता के हितों और समृद्धि पर अपनी राजनीति को धार देनी होगी।

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मोटे तौर पर नए कश्मीर ने कश्मीरी नेताओं को अलगाववाद की राजनीति को छोड़ने पर मजबूर कर दिया है। उनके पास विकास की राजनीति के अलावा कोई विकल्प नहीं है। क्योंकि नए कश्मीर का युवा वर्ग रोजगार चाहता है। राज्य का विकास चाहता है। हिंसा की राजनीति में दो तीन पीढियां कुर्बान करने के बाद वह उससे उकता चुका है।

नेशनल कांफ्रेंस के लोग कहते हैं कि पार्टी प्रमुख फारुक अब्दुल्ला जम्मू और कश्मीर स्टेटहुड की बहाली के लिए लड़ने को तैयार हैं लेकिन उनके पुत्र उमर अब और लड़ने के इच्छुक नहीं हैं। कहा यह भी जा रहा है कि पाकिस्तान समर्थक प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व में पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती भी हिरासत के दौरान अपने विकल्पों पर विचार कर रही हैं।

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कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म होने के बाद कश्मीर के राजनीतिक पैटर्न में भी अप्रत्याशित बदलाव दिखाई देने लगा है। इसके चलते कुछ अलगाववादी मुख्यधारा में आने की तैयारी कर रहे हैं वहीं कुछ मुख्यधारा वाले दल विरोधी पार्टियों को हराने की तैयारी कर रहे हैं अलगाववादी धड़ों और मुख्यधारा के दलों के भीतर बदले हालात में भविष्य की राजनीति पर अलग अलग समूहों में विचार शुरू हो गया है।

पिछले तीस सालों से इस हिंसाग्रस्त और आतंकवाद प्रभावित राज्य में अलगाववादी जहां भारतीय संविधान को मानने से इनकार करते रहे हैं और कश्मीर की पुरानी और सबसे बड़ी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस कश्मीर के लिए 1953 के पूर्व की स्थितियों की बहाली की मांग करती रही है। महबूबा मुफ्ती की पीडीपी अलगाववाद पर लचीला रुख अपना कर अलग धार्मिक चिह्न के साथ राजनीति करती रही है। कश्मीर की छोटी पार्टियां भी इस लाइन पर चलते हुए राष्ट्रीय दलों से सरकार बनाने के लिए गठजोड़ करती रही हैं।

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लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। कश्मीर धीरे धीरे अमन की ओर बढ़ रहा है। जनता हिंसा से निजात चाहती है। उसे अब और खून खराबा नहीं चाहिए। उसे खुशहाली अमन समृद्धि चाहिए। विशेष दर्जे के चलते कश्मीर भारत-पाकिस्तान के बीच में अनिश्चित भविष्य लेकर झूल रहा था। अब जबकि मामला हल हो चुका है जनता अब बेहतर गवर्नेंस चाहती है।

मामला हल होने के बाद राजनीतिक दलों के लिए अलगाववाद, लचीला अलगाववाद, स्वायत्तता जैसे मुद्दे खत्म हो चुके हैं। कश्मीर अब इन सब की छाया से मुक्त हो कर आगे बढ़ने को तैयार हो रहा है। राजनीतिक दलों के लिए अब मुद्दा गुड गवर्नेंस ही बचा है जिस पर अब तक किसी ने फोकस नहीं किया है।

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इस्लामी ग्रुपों और अलगाववादियों को लेकर चल रही हुर्रियत के भीतर भी उथल पुथल है। कश्मीर की यंग जेनरेशन मुख्यधारा से जुड़ने को आतुर है। इससे इस बात की पुष्टि हो रही है कि पाकिस्तान के पैसे से पलने वाले अलगाववाद से कश्मीरी समाज का कोई भला नहीं हुआ।

खून और कत्लेआम से कश्मीरी अवाम पिसी जबकि अलगाववादी नेता और उनके बच्चे अमीरी में पलते बढ़ते पनपते रहे। अलगाववाद की दूसरी और तीसरी पीढ़ी अब कश्मीर को लोकतांत्रिक व्यवस्था का अंग बनना चाहती है। क्योंकि कश्मीर के विशेष दर्जे से सिर्फ वहां का विकास अवरुद्ध हुआ। गरीबी बढ़ती गई।

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ये सच है कि कश्मीर में शेख अब्दुल्ला से शुरू हुई विरासत को सम्हाल रहे फारुक अब्दुल्ला के लिए इस सच को स्वीकार करना कठिन है। लेकिन उनके पास कोई विकल्प भी नहीं है। अगर नए सिरे से परिसीमन होगा तो कश्मीर में सीटों की संख्या में भी फर्क आएगा जिससे फारुक अब्दुल्ला की पार्टी की बसी बसाई जमीन उजड़ जाएगी। ऐसे में वह कैसे सीमित अधिकारों वाले मुख्यमंत्री पद को स्वीकार करें।

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यही हाल पीडीपी का भी है अलगाववाद के नाम पर राजनीति करने की उसकी जमीन खिसक हो चुकी है। बाकी दलों में कोई भी भारत विरोधी राजनीति करने का इच्छुक नहीं है। कश्मीर के नए राजनीतिक दलों का बदले हालात में अपनी संभावना दिखायी दे रही है। सज्जाद लोन की पार्टी पीपुल्स कांफ्रेंस एकमात्र वह पार्टी है जो मोदी सरकार का खुला समर्थन कर रही है।

इसके अलावा हाल के पंचायत व निकाय चुनावों में जीत कर आए ज्यादातर क्षत्रप युवा हैं इनके पास विकासपरक सोच है। यही वह ट्रंप कार्ड हैं जो नए कश्मीर के विकास की इबारत लिखकर कश्मीर की राजनीति में रिक्त स्थान की भरपाई करेंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)