मरे 1 करोड़ लोग: बहुत भयानक थी ये महामारी, सालों पहले मचाया था हाहाकार

चीनी वायरस कोविड-19 कोरोना इस कोरोना के वजह से संसार के सभी देश परेशान हैं,यहां तक कि महाशक्ति अमेरिका जैसा देश इस महामारी से त्राहि कर रहा है।

रजनीश कुमार मिश्र

गाजीपुर। चीनी वायरस कोविड-19 कोरोना इस कोरोना के वजह से संसार के सभी देश परेशान हैं,यहां तक कि महाशक्ति अमेरिका जैसा देश इस महामारी से त्राहि कर रहा है। विज्ञान के जमाने में अब तक वैज्ञानिक भी इसका काट नहीं निकाल पाये हैं, जिसके वजह से लाखों की मौत हो चुकी हैं। ठीक ऐसा ही एक महामारी सन् 1920 के आस-पास भारत के हर एक गांव में फैला था,और उस समय भारत पर अंग्रेजों का हुकूमत था।

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गावों मे फैला था, फ्लेग( हैजा का प्रकोप)

गांव के सबसे बुजुर्ग 88 वर्षीय रामचीज सिंह अपना भारत न्यूजट्रैक को बताते हैं,की सन् 1924-25 के आस पास फ्लेग गांव के लोग जिसे (हैजा) कहते थे,चूहों के वजह से गांवों मे फैला था।

रामचीज सिंह ने बताया की फ्लेग के वजह से गांव के गांव मौत का तान्डव होने लगा हर घर मे चीख पुकार की अवाजे गुंजने लगी थी।हर गांवो मे शवों के ढेर लगने लगे ।

रामचीज सिंह बताते हैं,फ्लेग महामारी कोरोना महामारी से भी ज्यादा खतरनाक था।क्यो उस समय देश भी प्रगति पर नहीं था,और ना ही कोई दवा बना था।

रामचीज सिंह बताते है की चूहों के डर से ग्रामीण अपना घर छोड़ बागीचो मे अपने परिवार के आशियाना बनाने पर मजबूर हो गये थे।वहीं एक अन्य ग्रामीण 90वर्षीय रामवृक्ष राम बताते हैं,की जो लोग अपना घर छोड़ बागीचे में गये उनके लोग तो बच गये।लेकिन जो लोग नहीं गये उनके घर का एक भी सदस्य नहीं बच पाया।

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बागीचे मे होता था,बच्चों का जन्म

गाजीपुर जिले के बाराचवर निवासी 88 वर्षीय राम चीज सिंह बताते हैं, कि जब गांव में चूहों के वजह से फ्लैग महामारी फैला था। जिस के डर से लोग अपने परिवार के साथ बगीचे में रहने लगे और वहीं पर बच्चों का जन्म भी होता था, रामचीज सिंह ने बताया कि खुद मेरा जन्म भी बगीचे में ही हुआ था।

शवों के लग जाते थे ढेर

90 वर्षीय मौहम्मद रऊफ बताते हैं, कि गांव के लोग भागकर बगीचे में रहने लगे रऊफ बताते हैं। कि उस समय इस बीमारी का कोई भी दवा उपलब्ध नहीं था।

जब देश में फ्लेग महामारी आया था, तो गांव में लाशों के ढेर लग जाते थे ।एक को दफना कर आने के बाद किसी न किसी घर से दूसरे शव को ले जाना पड़ता था।

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हर तरफ रोने और चिल्लाने की आवाजें आती थी, वह दृश्य बहुत ही भयावह था। जिसे आज भी सोचने पर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, उन्होंने बताया कि कोरोना महामारी से अलग ही स्थिति थी क्योंकि उस समय देश में कोई सुविधा नहीं था।

भोजन के बगैर भी मरते थे लोग

मोहम्मद रऊफ बताते हैं, कि जब देश में फ्लैग फैला था, तो लोग अपना घर छोड़ गांव से दूर खेत खलिहान और बगीचे में रहने को मजबूर थे। लोग एक दिन खा कर दो 2 दिन तक जिंदा रहते थे, खाने के लिए ग्रामीणों के पास कुछ भी नहीं था।

और ब्रिटिश सरकार यहां के लोगों के लिए कुछ भी नहीं करती थी, जिसके वजह से लोग भूखे भी मरने लगे यहां तक कि कुएं का पानी भी दूषित हो चुका था, रऊफ कहते हैं।

भगवान ना करें वह स्थिति अब के लोगों को देखनी पड़े लॉक डाउन के सवाल पर मोहम्मद रऊफ ने बताया कि उस जमाने में अंग्रेज सरकार को किसी की फिक्र नहीं था। क्योंकि अंग्रेज ऐसे ही भारतीयों के उपर जुल्म करते थे।

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ग्रामीण पीते थे,गजपुर्णना का जड़

गांव के एक अन्य ग्रामीण 88 वर्षीय रामवृक्ष नाम बताते हैं कि 100 साल पहले फ्लेग महामारी फैली थी,जिसे लोग (हैजा) कहते थे।

इस बिमारी से बचाव के लिए उस वक्त ग्रामीण खेतो जंगलो मे मिलने वाले गजपुर्णना का जड़ पीकर अपना अपने परिवार का बचाव करते थे।रामबृक्ष राम बताते हैं,की इस रोग से बचने के लिए कोई दवा उपलब्ध नहीं था।गजपुर्णना का जड़ ही कुछ हद तक कारगर था।

शाम होते ही लग जाते थे, घरो में ताले

रामबृक्ष राम बताते हैं,की जब गांवो मे फ्लेग फैला था।तब शाम होते ही सभी लोगो के घरो में ताले लटकने लगते थे,
और ग्रामीण घरो से दुर बागीचे में चले जाते थे।

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गांव में फैला था फ्लैग महामारी

मोहम्मद रऊफ बताते हैं, कि फ्लैक महामारी कोरोना की तरह शहरों में नहीं फैला था। इसका प्रकोप देश के हर एक गांवो में ही था क्योंकि उस समय गांव की अपेक्षा शहरों में जनसंख्या कम थी।

गांव में फ्लैग फैलने का मुख्य कारण गंदगी और चूहे थे, उस समय किसी भी घर में एक चूहा मर जाता था उस घर में फ्लैग महामारी फैल जाती थी।फ्लैग महामारी भी कोरोना की तरह ही छुआछूत की थी।

गांव के लोग एक दूसरे से मिलते जुलते थे ,जिसके वजह से फ्लैग पूरे गांव को अपने चपेट में ले लेता था। इस बीमारी की वजहं से काफी संख्या में लोग मरे थे।

उल्टी दस्त था फ्लेग का पहचान

88 वर्षीय रामवृक्ष राम बताते हैं कि जैसे करो नाम का पहचान सर्दी जुखाम बुखार है वैसे ही फ्लैट का पहचान उल्टी और दस्त था रामवृक्ष नाम बताते हैं कि जिस व्यक्ति को उल्टी और दस्त हो जाता था लोग समझ जाते थे इनको
फ्लैग की बीमारी हो गई है।

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साफ सफाई से रोका गया फ्लैग को

90 वर्षीय रऊफ बताते हैं, कि जैसे आज के समय में आए करोना महामारी का कोई इलाज नहीं हैं। ठीक इसी प्रकार उस समय फ्लैग बीमारी का भी कोई इलाज नहीं था, जैसे इस बीमारी से लोग दूरी बना रहे हैं, और साफ-सफाई पर ध्यान दे रहे हैं।

ठीक इसी प्रकार सौ साल पहले हाय फ्लेग बीमारी से भी लोंग दुरी वनाते थे उस वक्त भी फ्लेग बिमारी का कोई दवा नहीं था। इसे भी साफ सफाई से ही रोका गया यह बात दीगर हैं, कि कुछ सालों बाद फ्लैग का टीका बनाने में वैज्ञानिक कामयाब हो गए लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। और फ्लैग महामारी पूरे देश में तबाही मचा चुका था।

सन् 1889 में भारत मे आया फ्लेग

कोरोना वायरस जैसे चीन से भारत में प्रवेश कर हाहाकार मचाया हैं, ठीक उसी तरह 1889 में आए फ्लैग भी चीनी चूहों की वजह से भारत में प्रवेश कर तहलका मचाया था।

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जिससे शिकार ज्यादातर समुद्री इलाके के गांव के लोग हुए ।क्योंकि जो भी समुद्री जहाज चीन से भारत आए उसमें मिले चूहों के वजहं से वह पूरा क्षेत्र फ्लैग वायरस की चपेट में आ जाता था।

1889 से 1959 तक रहा प्रकोप

स्न1889 में फैले चीनी फ्लेग का प्रकोप 1959 तक रहा जिसके वजहं से देश का हर एक गांव इसके प्रकोप से ग्रसित हो गया। फ्लैग वायरस कोरोना वायरस से भी ज्यादा खतरनाक था। क्योंकि फ्लैग वायरस जैसे ही इंसान के संपर्क में आता वह इंसान 24 घंटे के अंदर मौत के आगोश में सो जाता है।

भारत में हुई थी, एक करोड़ लोगों की मौत

एक आंकड़े के मुताबिक चीन और भारत में मिलाकर सन्18 89 से लेकर 1959 तक सवा करोड़ लोगों की मौत हो चुकी थी। यूके की डिफेंस इवैल्यूएशन एंड रिसर्च एजेंसी के मुताबिक भारत में अकेले एक करोड़ लोगों की मौत हुई थी। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक फ्लेग का प्रकोप सन् 1959 तक एक्टिव रहा।

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