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ऐसा देशभक्त: जिसे समझा दोस्त, उसी ने मारा पीठ पर छुरा

आज ही के दिन 27 फरवरी को साल 1931 में आजाद शहीद हुए थे। आज चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि के मौके पर हम आपको उनकी जिन्दगी से जुड़ी कुछ अनकही बातें बताने जा रहे हैं। 

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ShreyaBy Shreya

Published on 27 Feb 2020 9:53 AM GMT

ऐसा देशभक्त: जिसे समझा दोस्त, उसी ने मारा पीठ पर छुरा
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ऐसा देशभक्त: जिसे समझा दोस्त, उसी ने मारा पीठ पर छुरा
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लखनऊ: महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के बारे में कौन नहीं जानता। आजाद ने न केवल देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए, बल्कि आखिरी समय में खुद को गोली मार वो सबको स्वतंत्र रुप से रहना भी सिखा गए। चंद्रशेखर आजाद 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा में जन्मे थे और मात्र 16 साल की उम्र में वो शहीद हो गए। आज ही के दिन 27 फरवरी को साल 1931 में आजाद शहीद हुए थे। आज उनकी पुण्यतिथि है और आज के दिन सारा भारत उनके बलिदानों को याद कर रहा है।

आज चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि के मौके पर हम आपको उनकी जिन्दगी से जुड़ी कुछ अनकही बातें बताने जा रहे हैं।

काकोरी कांड, जिससे तिलमिला गए थे अंग्रेज

काकोरी कांड के बारे में तो आपको पता ही होगा, जब 10 क्रांतिकारियों ने काकोरी में ट्रेन लूट ली। इस ट्रेन में अंग्रेजों का पैसा जा रहा था। क्रांतिकारियों ने अंग्रेज सिपाहियों पर पिस्तौल तान दी और पैसों से भरे बक्से को निकाल लिया। जिसके बाद अंग्रेजी हुकूमत तिलमिला गया और उन लोगों को ढूंढ कर मारना शुरु कर दिया, जो लोग ट्रेन लूट में शामिल थे। अंग्रेजी सिपाहियों ने 5 लोगों को पकड़कर मौत के घाट उतार दिया। लेकिन भेस बदलने में माहिर आजाद को अंग्रेजी हुकूमत नहीं पहचान पाई और आजाद वहां से भाग निकले। जिसके बाद वो कानपुर आ पहुंचे।

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लेकिन काकोरी कांड के बाद अंग्रेज सिपाही अब भी उनकी तलाश कर रही थी। वहीं दूसरी ओर चंद्रशेखर सांडर्स की हत्या, काकोरी कांड और असेंबली बम धमाके के बाद फरार चल रहे थे और छिपने के लिए वो झांसी पहुंच गए थे। उन्होंने फरार रहते हुए जिन्दगी के 10 साल झांसी और उसके आसपास के जिलों में ही बिताएं।

मास्टर रुद्रनारायण सक्सेना से हुई मुलाकात

इस बीच उनकी मुलाकात हुए मास्टर रुद्रनारायण सक्सेना से। मास्टर भी स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। और यह वजह काफी थी दोनों के बीच गहरी दोस्ती करवाने के लिए। चंद्रशेखर आजाद कई सालों तक मास्टर रुद्रनारायण सक्सेना के घर पर ही छिपे रहे। आजाद अंग्रेजों से छिपने के लिए अक्सर एक कमरे के नीचे बनी गोपनीय जगह में छिप जाते थे। वो इसी गुप्त जगह में अपने साथियों के साथ मिलकर प्लान बनाते थे।

मास्टर ने बनाई थी आजाद की पेंटिंग

मास्टर सक्सेना एक क्रांतिकारी के साथ एक अच्छे पेंटर भी थे। एक दिन उन्होंने चंद्रशेखर आजाद को काफी वक्त तक एक पोज में खड़ा रखा ताकि उनकी तस्वीर बना सके। ये चंद्रशेखर आजाद की वहीं तस्वीर थी, जिसमें वो एक हाथ में बंदूक लिए और दूसरे हाथों से अपनी मूंछे तानते हुए नजर आ रहे हैं। इसके अलावा एक और तस्वीर उन्होंने बनाई थी, जिसमें रुद्रनारायण की पत्नी और बच्चे चंद्रशेखर के साथ बैठे हैं।

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दोस्त के लिए सरेंडर करने की ठानी

जानकारी के मुताबिक, अंग्रेजों ने कभी आजाद को देखा ही नहीं था, इसलिए वो उन्हें पहचानते नहीं थे। जब उन्हें आजाद की इस तस्वीर के बारे में पता चला तो उन्होंने इस तस्वीर को देने के बदले मुंहमांगी रकम देने की बात रखी। जब अंग्रेजों ने ये शर्त रखी थी तो रुद्रनारायण के घर की स्थिति काफी खराब थी। इस वजह से आजाद ने एक प्लान बनाया और उन पर रखे गए इनाम का पैसा उनके मित्र रुद्रनारायण को मिल जाए इसलिए वो सरेंडर करने के लिए तैयार हो गए। ताकि उनके मित्र का घर अच्छे से चल सके।

27 फरवरी, 1931 दोस्त ने की थी गद्दारी

आप सबने आजाद के बारे में सुना होगा कि आजाद ने अपने आपको गोली इसलिए मार ली थी ताकि अंग्रेज उनको जिंदा न पकड़ पाएं और न ही अंग्रेजों की गोलियां उनके शरीर में लगे। अंग्रेजी हुकूमत हाथ घो कर उनके पीछे पड़ी हुई थी। सब आजाद को पकड़ने के लिए तरह-तरह के प्रयास कर रहे थे, लेकिन उनकी कोशिशें कभी कामयाब नहीं हुई। 27 फरवरी, 1931 के दिन आजा अल्फ्रेड पार्क में छिपे थे और अपने दोस्तों का किसी मीटिंग के लिए वेट कर रहे थे। इसी बीच आजाद की अपने किसी दोस्त से बहस हो गई। गुस्साए दोस्त ने चंद्रशेखर से बदला लेने की ठानी और उनसे गद्दारी की। उनके दोस्त ने उनके अल्फ्रेड पार्क में छिपे होने की बात जाकर अंग्रेजों को बता दिया।

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जब खूद की ले ली जान, बोला ये शेर

फिर क्या था अंग्रेजों ने इतने दिन से जिसको पकड़ने के लिए रात-दिन एक किया था, उसका पता चलते हुी वो उस पार्क जा पुहंचे, जहां चंद्रशेखर आजाद पहुंचे थे। अंग्रेजों ने वहां पहुंचते ही ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरु कर दी। दूसरी तरफ आजाद अंग्रेजों द्वारा अचानक किए गए इस हमले और अपने दोस्त की गद्दारी से अंजान थे। उनके पास उस वक्त एक ही पिस्तौल मौजूद थी और गिनी हुई कुछ गोलियां, जिनसे उन्होंने अंग्रेजों का सामना किया। वो लड़ते रहे और अंग्रेजों को निशाना बना रहे थे ताकि उनके दोस्त को चोट न लग जाए। आखिरी में उनके पास केवल एक गोली बची, जिससे उन्होंने अपनी जान लेना लाजिमी समझा और उन्होंने वो गोली अपने आप को मार ली। इससे उन्होंने अपने दोनों कसमों को पूरा कर लिया अंग्रेज न उन्हें जिंदा पकड़ पाएं और न ही उनकी गोलियां उनके जिस्म पर लगी।

जाते-जाते उन्होंने एक शेर बोला था और वो था-

दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे,

आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।

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