Top

हवा में भी मार कर सकता है कोरोना वायरस, नई स्टडी ने उड़ाए सबके होश

कोरोना वायरस के फैलने के संबंध में किए गए एक नएअध्ययन ने सबके होश उड़ा दिए हैं। यह अध्ययन अमेरिका के एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ने किया है और इस अध्ययन के बाद निकाले गए नतीजे काफी चौंकाने वाले हैं।

Dharmendra kumar

Dharmendra kumarBy Dharmendra kumar

Published on 6 April 2020 4:55 AM GMT

हवा में भी मार कर सकता है कोरोना वायरस, नई स्टडी ने उड़ाए सबके होश
X
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • Print
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • Print
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • Print

नई दिल्ली: कोरोना वायरस के फैलने के संबंध में किए गए एक नएअध्ययन ने सबके होश उड़ा दिए हैं। यह अध्ययन अमेरिका के एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ने किया है और इस अध्ययन के बाद निकाले गए नतीजे काफी चौंकाने वाले हैं। इस अध्ययन के नतीजों से पता चलता है कि कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकना वाकई कितना कठिन काम है।

अभी तक दूसरी थी धारणा

इस वायरस के फैलने के बाद से ही यह कहा जा रहा है कि यह वायरस हवा के जरिए नहीं फैलता। कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति के खांसने और छींकने के दौरान निकले ड्रॉपलेट्स से यह फैल सकता है। लेकिन अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में किया गया अध्ययन इसके बिल्कुल विपरीत है। इस अध्ययन में बताया गया है कि कोरोना वायरस हवा में भी हो सकता है। इस अध्ययन में यह भी बताया गया है कि जिस स्थान पर कोरोना से संक्रमित व्यक्ति रहा हो वहां उसके जाने के बाद भी हवा में कोरोना के वायरस मौजूद हो सकते हैं जो दूसरों को आसानी से संक्रमित कर सकते हैं।

यह भी पढ़ें...भारत में जले दीये: ये तस्वीरें देख आएगी हिम्मत, कोरोना से जंग हो जाएगी आसान

अमेरिकी यूनिवर्सिटी में चौंकाने वाली स्टडी

अमेरिका की नेब्रास्का यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का यह अध्ययन वाकई काफी चौकाने वाला है। डेली मेल में इस बाबत छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक इस बात की पुष्टि हुई है कि कोरोना संक्रमित व्यक्ति के किसी एक स्थान से दूसरे स्थान पर चले जाने के बाद भी हवा में वायरस की मौजूदगी संभव है। इस अध्ययन में यह भी बताया गया है कि मरीज के जाने के कई घंटे बाद भी कमरे की हवा में काफी मात्रा में वायरस हो सकता है और दूसरे लोग इसके शिकार हो सकते हैं।

इलाज करने वाले बरतें सतर्कता

रिपोर्ट के मुताबिक शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अस्पताल के जिस वार्ड में कोरोना संक्रमित मरीज रह रहा हो उसके आसपास या कॉरिडोर आदि की हवा में भी इस वायरस की मौजूदगी हो सकती है। इस स्टडी में कोरोना से संक्रमित मरीजों का इलाज कर रहे लोगों को काफी सतर्कता बरतने की हिदायत दी गई है। शोधकर्ताओं का कहना है कि कोरोना से संक्रमिक मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों को वायरस के संक्रमण से बचाने के लिए हमेशा प्रोटेक्टिव सूट, मास्क, दस्ताने आदि का सहारा जरूर लेना चाहिए। ऐसा न करने पर वे भी इस वायरस के संक्रमण का शिकार हो सकते हैं।

यह भी पढ़ें...कांग्रेस ने ताली-थाली बजाने और दीया जलाने पर मोदी सरकार से पूछे ये 7 सवाल

कमरों के सैंपल से निकाला नतीजा

इस अध्ययन को करने के लिए शोधकर्ताओं ने कोरोना से संक्रमित 11 मरीजों के कमरों को सैंपल के तौर पर लिया था। शोधकर्ताओं ने इन कमरों की हवा का गहराई से अध्ययन किया। शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे कि इन कमरों के भीतर और बाहर की हवा में कोरोना वायरस की मौजूदगी है। नेब्रास्का यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की टीम के अगुवा जेम्स लॉलर का कहना है कि हमें इस बाबत पहले ही संदेह था और अध्ययन से जो नतीजे निकलते हैं वह हमारे संदेह की पुष्टि करने वाले हैं।

नेगेटिव एयर फ्लो होना जरूरी

लॉलर का यह भी कहना है कि कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों के कमरे में नेगेटिव एयर फ्लो होना बहुत जरूरी है। उनका यह भी कहना है कि भले ही ज्यादा मरीजों की मौजूदगी हो, लेकिन इसका पालन जरूर किया जाना चाहिए। हालांकि एक सच्चाई यह भी है कि चिकित्सा विशेषज्ञ अभी तक ऐसा कोई आंकड़ा नहीं दे पाए हैं जिससे यह पता चल सके कि कितने मरीज हवा, ड्रॉपलेट्स या फिर संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने के कारण इस वायरस का शिकार हुए।

यह भी पढ़ें...कोरोना के खिलाफ जंग में खत्म हुई राजनीति तल्खी, मदद करने में आगे हैं ये नेता

स्वास्थ्य कर्मियों के पास पीपीई होना जरूरी

दुनिया भर के तमाम देशों से ऐसी खबरें आ रही हैं कि कोरोना से संक्रमित मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्य कर्मी पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) की कमी का सामना कर रहे हैं। इस तरह के भी तमाम मामले सामने आए हैं जिनमें कोरोना से संक्रमित मरीजों का इलाज करने वाले डॉक्टर भी कोरोना वायरस का शिकार हो गए। इस स्टडी के नतीजों से समझा जा सकता है कि कोरोना संक्रमित मरीजों का इलाज करने वालों के लिए पीपीई कितना जरूरी है।

ऐसे भी हो सकता है वायरस का संक्रमण

कोरोना वायरस के संक्रमण के बारे में पहले भी अध्ययन किए जा चुके हैं। कुछ और स्टडीज में भी यह बात सामने आई थी कि इस वायरस का संक्रमण सिर्फ मरीजों के जरिए ही नहीं होता बल्कि यह वायरस कई जगहों की सतह पर भी मौजूद हो सकता है। कुछ और विशेषज्ञों की राय है कि कोरोना का वायरस मेटल या प्लास्टिक के सतह पर दो से तीन दिनों तक रह सकता है। ऐसे में इन तत्वों को छूने वाले लोगों पर इस वायरस के संक्रमण का खतरा निश्चित तौर पर होता है।

यह भी पढ़ें...घर-घर जले 101 दीप: कोरोना को भगाने के लिए गाये गीत, ऐसे दिखा लोगों में उत्साह

सतर्कता के लिए और कदम भी जरूरी

अमेरिकी विश्वविद्यालय के इस अध्ययन से वाकई कोरोना मरीजों के इलाज में बड़ा फायदा मिल सकता है। दुनिया भर के चिकित्सा विशेषज्ञों की तमाम कोशिशों के बावजूद इस वायरस के संक्रमण को रोकने में अभी तक कामयाबी नहीं मिल सकी है।इस अध्ययन से इस बात का भी पता चलता है कि संक्रमित व्यक्ति से किसी दूसरे व्यक्ति की दूरी ही काफी नहीं है बल्कि सतर्कता के लिए और कदम भी उठाए जाने जरूरी हैं।

Dharmendra kumar

Dharmendra kumar

Next Story