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मौत का तांडव: जब चलती ट्रेन को लगा दी गई आग, दंगे ने ले ली थी हजारों की जान

जरात के गोधरा में हुए 18 साल पहले आज ही के दिन 59 लोगों की जलकर मौत हो गई थी, जिसे हम सब 'गोधरा कांड' के नाम से जानते हैं। 2002 में हुए गोधरा कांड के बीते हुए 18 साल हो गए हैं।

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ShreyaBy Shreya

Published on 27 Feb 2020 6:41 AM GMT

मौत का तांडव: जब चलती ट्रेन को लगा दी गई आग, दंगे ने ले ली थी हजारों की जान
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लखनऊ: गुजरात के गोधरा में हुए 18 साल पहले आज ही के दिन 59 लोगों की जलकर मौत हो गई थी, जिसे हम सब 'गोधरा कांड' के नाम से जानते हैं। 2002 में हुए गोधरा कांड के बीते हुए भले 18 साल हो गए हो लेकिन आज भी उस आग का धुंआ शांत नहीं हो पाया है। भारत में हुए तमाम सम्प्रदायिक दंगों में से गोधरा कांड आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। लेकिन आज भी बहुत से लोग उस दंगे से वाकिफ नहीं है, तो चलिए आपको बताते हैं उस दिन की पूरी कहानी।

क्या हुआ्र था 27 फरवरी 2002 के दिन?

27 फरवरी 2002 की सुबह जैसे ही साबरमती एक्सप्रेस गोधरा रेलवे स्टेशन के पास पहुंची, उसके एक कोच में आग लगा दी गई थी। आग लगाने वाले लोगों में ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के लोग शामिल थे। ट्रेन के S-6 कोच के अंदर भीषण आग लगी थी, जिसके बाद आग की लपटें उठने लगीं और हर तरफ धुएं ने अपना माना कब्जा सा कर लिया। आग इतनी भीषण थी कि कोच में मौजूद यात्री उसकी चपेट में आ गए। इन यात्रियों में ज्यादातर लोग अयोध्या से लौट रहे कारसेवक थे।

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गुजरात में भड़क उठे थे दंगे

इस आग की चपेट में आने से 59 कारसेवकों की मौत हो गई। जिसके बाद से पूरे गुजरात में हड़कंप मच गया। इस गोधरा कांड को एक साजिश माना गया। गोधरा कांड के अगले ही दिन मामला काफी अशांत हो गया और 28 फरवरी को गोधरा से कारसेवकों के शव खुले ट्रक में अहमदाबाद लाए गए। जिसने खूब चर्चा बटोरी। लेकिन इन शवों को मृतक के परिजनों को सौंपने के बदले विश्व हिंदू परिषद (विहिप) को सौंपा दिया गया। इस घटना के बाद गुजरात में दंगो भड़क उठे। जिसमें करीब 1000 से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी। ट्रेन में लगी इस आग ने गुजरात पर एक कालिख सी लगा दी थी।

गोधरा कांड के अगले दिन हुए दंगे में 69 लोगों की गई थी जान

गोधराकांड के अगले दिन 28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी में दंगाइयों ने कांग्रेस सांसद जाफरी समेत 69 लोगों की हत्या कर दी थी। घटना के बाद सोसायटी से 39 लोगों के शव मिले थे। बाकी 30 लोगों के शव नहीं मिलने पर सात साल बाद उन्हें मृत मान लिया गया था। गुलबर्ग सोसायटी में 28 बंगले और 10 अपार्टमेंट हैं। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एसआईटी ने गुलबर्ग सोसायटी केस की दोबारा जांच की थी। एसआइटी ने इस मामले में 66 लोगों को गिरफ्तार किया था।

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यहां जानें गोधरा कांड पर लिए गए एक्शन के बारे में

27 फरवरी 2002:

गोधरा रेलवे स्टेशन के पास साबरमती ट्रेन के एस-6 कोच में मुस्लिमों द्वारा आग लगाए जाने के बाद 59 कारसेवकों हिन्दुओं की मौत हो गई। इस मामले में 1500 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई।

28 फरवरी2002:

गुजरात के कई इलाकों में दंगा भड़का जिसमें 1200 से अधिक लोग मारे गए।

03 मार्च 2002:

गोधरा ट्रेन जलाने के मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों के खिलाफ आतंकवाद निरोधक अध्यादेश (पोटा) लगाया गया।

06 मार्च 2002:

गुजरात सरकार ने कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट के तहत गोधरा कांड और उसके बाद हुई घटनाओं की जाँच के लिए एक आयोग की नियुक्ति की।

09 मार्च 2002:

पुलिस ने सभी आरोपियों के खिलाफ भादसं की धारा 120-बी (आपराधिक षड्यंजत्र) लगाया।

25 मार्च 2002:

केंद्र सरकार के दबाव की वजह से सभी आरोपियों पर से पोटा हटाया गया।

18 फरवरी 2003:

गुजरात में भाजपा सरकार के दोबारा चुने जाने पर आरोपियों के खिलाफ फिर से आतंकवाद निरोधक कानून लगा दिया गया।

21 नवंबर 2003:

उच्चतम न्यायालय ने गोधरा ट्रेन जलाए जाने के मामले समेत दंगे से जुड़े सभी मामलों की न्यायिक सुनवाई पर रोक लगाई।

04 सितंबर 2004:

राजद नेता लालू प्रसाद यादव के रेलमंत्री रहने के दौरान केद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले के आधार पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश यूसी बनर्जी की अध्यक्षता वाली एक समिति का गठन किया गया। इस समिति को घटना के कुछ पहलुओं की जाँच का काम सौंपा गया।

21 सितंबर 2004:

नवगठित संप्रग सरकार ने पोटा कानून को खत्म कर दिया और अरोपियों के खिलाफ पोटा आरोपों की समीक्षा का फैसला किया।

17 जनवरी 2005:

यूसी बनर्जी समिति ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में बताया कि एस-6 में लगी आग एक ‘दुर्घटना’ थी और इस बात की आशंका को खारिज किया कि आग बाहरी तत्वों द्वारा लगाई गई थी।

16 मई 2005 :

पोटा समीक्षा समिति ने अपनी राय दी कि आरोपियों पर पोटा के तहत आरोप नहीं लगाए जाएँ।

13 अक्टूबर 2006:

गुजरात उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी कि यूसी बनर्जी समिति का गठन ‘अवैध’ और ‘असंवैधानिक’ है क्योंकि नानावटी-शाह आयोग पहले ही दंगे से जुड़े सभी मामले की जाँच कर रहा है। उसने यह भी कहा कि बनर्जी की जाँच के परिणाम ‘अमान्य’ हैं।

26 मार्च 2008: उच्चतम न्यायालय ने गोधरा ट्रेन में लगी आग और गोधरा के बाद हुए दंगों से जुड़े आठ मामलों की जाँच के लिए विशेष जाँच आयोग बनाया।

18 सितंबर 2008:

नानावटी आयोग ने गोधरा कांड की जाँच सौंपी और कहा कि यह पूर्व नियोजित षड्यंेत्र था और एस6 कोच को भीड़ ने पेट्रोल डालकर जलाया।

12 फरवरी 2009 :

उच्च न्यायालय ने पोटा समीक्षा समिति के इस फैसले की पुष्टि की कि कानून को इस मामले में नहीं लागू किया जा सकता है।

20 फरवरी 2009 : गोधरा कांड के पीड़ितों के रिश्तेदार ने आरोपियों पर से पोटा कानून हटाए जाने के उच्च न्यायालय के फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। इस मामले पर सुनवाई अभी भी लंबित है

01 मई 2009 :

उच्चतम न्यायालय ने गोधरा मामले की सुनवाई पर से प्रतिबंध हटाया और सीबीआई के पूर्व निदेशक आरके राघवन की अध्यक्षता वाले विशेष जाँच दल ने गोधरा कांड और दंगे से जुड़े आठ अन्य मामलों की जाँच में तेजी आई।

01 जून 2009 :

गोधरा ट्रेन कांड की सुनवाई अहमदाबाद के साबरमती केंद्रीय जेल के अंदर शुरू हुई।

06 मई 2010 :

उच्चतम न्यायालय सुनवाई अदालत को गोधरा ट्रेन कांड समेत गुजरात के दंगों से जुड़े नौ संवेदनशील मामलों में फैसला सुनाने से रोका।

28 सितंबर 2010 :

सुनवाई पूरी हुई लेकिन शीर्ष अदालत द्वारा रोक लगाए जाने के कारण फैसला नहीं सुनाया गया।

18 जनवरी 2011 :

उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाने पर से प्रतिबंध हटाया।

22 फरवरी 2011 :

विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 31 लोगों को दोषी पाया, जबकि 63 अन्य को बरी किया।

1 मार्च 2011 :

विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 11 को फांसी, 20 को उम्रकैद की सजा सुनाई।

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