Top

विकास दुबे एनकाउंटरः शुरू हो गई ब्राह्मण वोटों को अपने पाले में लाने की कवायद

बदलती राजनीति के चलते ही मुस्लिमों और यादवों की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी ने भी अपने दल में ब्राम्हण नेताओं को आगे बढाने का काम किया।

Newstrack

NewstrackBy Newstrack

Published on 10 July 2020 11:23 AM GMT

विकास दुबे एनकाउंटरः शुरू हो गई ब्राह्मण वोटों को अपने पाले में लाने की कवायद
X
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • Print
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • Print
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • Print

श्रीधर अग्निहोत्री

लखनऊ: भले ही विधानसभा के अगले चुनाव में अभी डेढ़ साल से अधिक का वक्त बाकी हो लेकिन राजनीतिक दलों ने ‘विकास दुबे कांड’ को सियासी नजरों से देखना शुरू कर दिया है। इस कांड के सहारे राजनीतिक दलों ने अपने सियासी दांव आजमाने शुरू कर दिए इस सबके पीछे यूपी के 12 प्रतिशत ब्राम्हणों के बडे़ वोट बैंक को हथियाने की रणनीति छिपी हुई है।

ब्राम्हण वोट की राजनीति

ब्राम्हण बाहुल्य कानपुर जिले के बिकूरू गांव (चौबेपुर ) के आसपास इस वर्ग की बहुतायत संख्या है। हांलाकि इस वर्ग का वोट हर जिले में है। लेकिन पूर्वांचल में फैजाबाद, वाराणसी, गोरखपुर, गाजीपुर, गोण्डा, बस्ती, महाराजगंज, ,सिद्वार्थनगर, जौनपुर, गोंडा और मध्य यूपी में कानपुर रायबरेली, फर्रुखाबाद, कन्नौज, उन्नाव, लखनऊ, सीतापुर, बाराबंकी, हरदोई, इलाहाबाद, सुल्तानपुर, प्रतापगढ, अमेठी के अलावा बुंदेलखण्ड में हमीरपुर, हरदोई, जालौन, झांसी, चित्रकूट, ललितपुर, बांदा आदि ब्राम्हण मतदाताओं के केन्द्र कहे जाते हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ब्राह्मणों की लगभग 30 जिलों में महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि हम एक जिले की औसतन पांच विधानसभा मान ले तो इनकी संख्या 150 पहुंचती है।

ये भी पढ़ें- गोल्ड क्वीनः स्वप्ना के मामले में नया मोड़, कोर्ट ने स्थगित की ये सुनवाई

आजादी के बाद कांग्रेस की सरकारों में 1989 तक यूपी में छह ब्राम्हण मुख्यमंत्री बने लेकिन मंडल कमीशन लागू होने के बाद प्रदेश में दलितों और मुस्लिमों की राजनीति का दौर शुरू हुआ जो कई वर्षो तक चलता रहा। लेकिन दलितों की राजनीति करने वाली बहुजन समाज पार्टी ने अचानक 2005 में अपना राजनीतिक रास्ता बदल दिया और इस बडे़ ब्राम्हण वोट बैंक पर अपना दांव लगा दिया। जगह-गह ब्राह्मण सम्मेलन कराये और नारा दिया 'हाथी नहीं गणेश है ब्रह्मः विष्णु महेश हैं।' इसके बाद 2007 के विधानसभा चुनवा में बसपा ने 56 ब्राम्हणों को टिकट देकर सबको चौंका दिया। इसका उसे भरपूर लाभ मिला और 41 ब्राम्हण विधायक बसपा से जीते।

ब्राम्हणों के भरोसे पाई हर पार्टी ने सत्ता

2007 में प्रदेश में बसपा की सरकार बनने के बाद कांग्रेस ने भी आनन फानन में डा रीता बहुगुणा जोशी को प्रदेश की कमान सौंप दी। इससे ब्राम्हणों का परम्परागत वोट बैंक कांग्रेस की तरफ आकर्षित हुआ और 2009 के लोकसभा चुनाव में उसके 22 प्रत्याशी लोकसभा पहुंच गए। भाजपा ने डॉ रमापति राम त्रिपाठी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया। अयोध्या आंदोलन के बाद से भाजपा का साथ दे रहा ब्राह्मण वोट बैंक इससे संतुष्ट नहीं हुआ। बदलती राजनीति के चलते ही मुस्लिमों और यादवों की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी ने भी अपने दल में ब्राम्हण नेताओं को आगे बढाने का काम किया। जिसका उन्हें लाभ मिला और 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा का ब्राम्हण वोट बैंक छिटककर समाजवादी पार्टी की तरफ मुंड़ गया।

ये भी पढ़ें- विकास दुबे की आई कोरोना रिपोर्ट, एनकाउंटर स्थल पर लगे जिंदाबाद के नारे

परिणाम यह रहा कि प्रदेश में समाजवादी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बन गयी। इसी तरह जब प्रदेश भाजपा की कमान डॉ लक्ष्मीकांत वाजपेयी के हाथों में आई तो निकाय चुनाव और फिर 2014 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर इस पार्टी को भरपूर लाभ मिला और उसका परम्परागत वोट बैंक वापस लौट आया। पिछले दो लोकसभा चुनावों के अलावा 2017 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों ने भाजपा का खुलकर साथ दिया है। यही वजह है कि इस काण्ड के बहाने विपक्षी दल सपा बसपा और कांग्रेस बराबर इस वोट बैंक पर अपनी पैनी नजर रखे हुए हैं।

Newstrack

Newstrack

Next Story