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आखिर क्या होता है 'जिंदा कॉन्क्रीट', जो भर देता है खुद दीवारें

घर बनाने में सीमेंट, रेत और बजरी आदि चीजों का यूज़ किया जाता है। अगर कहीं दरार आ जाए तो उसे भरने के लिए कॉन्क्रीट का यूज़ किया जाता था।

Roshni Khan

Roshni KhanBy Roshni Khan

Published on 17 Jan 2020 9:55 AM GMT

आखिर क्या होता है जिंदा कॉन्क्रीट, जो भर देता है खुद दीवारें
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नई दिल्ली: घर बनाने में सीमेंट, रेत और बजरी आदि चीजों का यूज़ किया जाता है। अगर कहीं दरार आ जाए तो उसे भरने के लिए कॉन्क्रीट का यूज़ किया जाता था। कॉनक्रीट से घर भी बनते हैं। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने नए तरीके का कॉन्क्रीट बनाया है जो खुद ही दरारें भर देगा। टूटने के बाद वापस उसी आकार में आ जाएगा, जैसा पहले था। ये जिंदा कॉन्क्रीट है। ये कॉन्क्रीट रोशनी, धूप और पानी की खुराक से खुद को विकसित करेगा। तो आइए आपको बताते हैं इस जिंदा कॉन्क्रीट के बारे में...

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अमेरिका के बोल्डर में स्थित कोलोराडो यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डॉ. विल स्रूबर और उनकी टीम ने इस जिंदा कॉन्क्रीट को बनाया है। इस कॉन्क्रीट को बनाने में रेत, सीमेंट और पानी ही नहीं बल्कि इसमें एक खास तरीके का बैक्टीरिया मिलाया गया है। ये बैक्टीरिया ही रोशनी, धूप और पानी की खुराक से खुद को विकसित करेगा। इससे बने कॉन्क्रीट से दीवारों की दरारें खुद ही भर जाएंगी।

सायनोबैक्टीरिया मिला कर बनाया जाता है जिंदा कॉन्क्रीट

इस कॉन्क्रीट में मिलाया गया है - सायनोबैक्टीरिया। सायनोबैक्टीरिया फोटोसिंथेसिस के प्रोसेस से खुद को जीवित रखता है। डॉ। विल स्रूबर ने बताया कि शुरुआत में जब कॉन्क्रीट बनाया जाता है तो यह हरे रंग का दिखता है लेकिन धीरे-धीरे यह रंग हल्का हो जाता है। फिर यह भूरे रंग का दिखना शुरू हो जाता है।

डॉ. विल स्रूबर ने बताया कि हमने बैक्टीरिया में रेत, सीमेंट और पानी मिलाया। जबकि बाकी वैज्ञानिक रेत, सीमेंट और पानी में बैक्टीरिया मिलाते हैं। जो कॉन्क्रीट हमने बनाया है ये कम कार्बन उत्सर्जित करता है। साथ ही ये बेहद डिजाइनर है। इस कॉन्क्रीट को आप किसी भी ढांचे में ढाल सकते हैं।

डॉ. विल स्रूबर ने कहा कि हमने बैक्टीरिया से कॉन्क्रीट बनाने के लिए इसमें गर्म पानी, रेत, सीमेंट के साथ पोषक तत्व और जिलेटिन मिलाया है। जिलेटिन मिलाने से ये होता है कि बैक्टीरिया तेजी से मजबूत कॉन्क्रीट बनता है। अगर इसे किसी दीवार में लगाया जाए और उस दीवार में एक दरार आ जाए तो ये रोशनी और धूप की ओर आकर्षित होकर उस दरार को भर देता है।

जिंदा कॉन्क्रीट से वैज्ञानिकों ने 2 इंच के क्यूब्स बनवाए। जूते के डिब्बे के शेप की ईंटे बनवाईं। साथ ही अलग-अलग ढांचों में डालकर कॉन्क्रीट को आकार दिया गया। दो इंच के क्यूब्स पर वैज्ञानिकों की टीम चढ़कर कूदी लेकिन वह टूटा नहीं। लेकिन ये घर बनाने के लिए छोटा था। वैज्ञानिकों का दावा है कि इनके द्वारा जूते के डिब्बे के आकार में बनाया गया कॉन्क्रीट ईंट से घर बनाया जा सकता है।

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दीवारों में लगने के बाद शुरुआत में तो ये बैक्टीरिया सुस्त पड़ जाते हैं। लेकिन जैसे ही कुछ टाइम बीतता हैं और ये ज्यादा तापमान और पानी या नमी के संपर्क में आते हैं ये खुद को वापस से विकसित करने लगते हैं। हर ईंट से तीन नई ईटें खुद-ब-खुद बन सकती हैं। फिर नई तीन ईंटों से 9 ईटें बन सकती हैं। डॉ. स्रूबर ने बताया कि हमने इन्हें लिविंग बिल्डिंग मटेरियल (LBM) नाम दिया है। भविष्य में हम इसमें ग्लास या प्लास्टिक भी जोड़ सकते हैं।

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