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बजट में रोजगार के अवसर बढ़ाने पर विशेष फोकस की उम्मीद

केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के पीएम के रूप में दोबारा सत्ता में आने के बाद आर्थिक मंदी सरकार की सबसे बड़ी मुसीबत बनी हुई है। जुलाई-सितंबर, 2019 की तिमाही के दौरान भारत की आर्थिक विकास दर घटकर महज 4.5 फीसदी रह गई, जो लगभग साढ़े छह साल का निचला स्तर है।

Dharmendra kumar

Dharmendra kumarBy Dharmendra kumar

Published on 30 Jan 2020 3:54 PM GMT

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अंशुमान तिवारी

अंशुमान तिवारी

नई दिल्ली: केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के पीएम के रूप में दोबारा सत्ता में आने के बाद आर्थिक मंदी सरकार की सबसे बड़ी मुसीबत बनी हुई है। जुलाई-सितंबर, 2019 की तिमाही के दौरान भारत की आर्थिक विकास दर घटकर महज 4.5 फीसदी रह गई, जो लगभग साढ़े छह साल का निचला स्तर है। यह लगातार छठी तिमाही है जब जीडीपी में सुस्ती दर्ज की गई है। रोजगार वृद्धि की दर तीन प्रतिशत से भी कम है। देश में दिन-प्रतिदिन बेरोजगारों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में माना जा रहा है कि इस बार के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रोजगार की दशा और दिशा सुधारने के काम को सर्वोच्च प्राथमिकता दे सकती हैं।

जीडीपी के खराब आंकड़े

जीडीपी के खराब आंकड़ों की मुख्य वजह विनिर्माण और कृषि क्षेत्र से जुड़ी गतिविधियों में सुस्ती रही। इस दौरान विनिर्माण क्षेत्र में एक फीसदी की गिरावट रही, जबकि एक साल पहले समान अवधि में 6.9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई थी। वहीं कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 4.9 फीसदी से घटकर 2.1 फीसदी रह गई। खनन क्षेत्र की वृद्धि दर 2.2 फीसदी से घटकर 0.1 फीसदी रह गई। वहीं बिजली, गैस, जल आपूर्ति और अन्य सेवाओं के क्षेत्र की वृद्धि दर 3.6 फीसदी रह गई, जबकि एक साल पहले समान अवधि में यह 8.7 फीसदी रही थी। इसी प्रकार व्यापार, परिवहन, संचार और प्रसारण संबंधी सेवाओं की वृद्धि दर 6.9 फीसदी से घटकर 4.8 फीसदी रह गई। वित्तीय, रियल एस्टेट और व्यावसायिक सेवाओं में भी सुस्ती दर्ज की गई।

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भारत के पास कुशल कामगारों की फौज

मानव संसाधन परामर्श संगठन कॉर्न फेरी की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2030 तक दुनिया भर में जहां कुशल कामगारों का संकट होगा,वहीं भारत के पास 24.5 करोड़ अतिरिक्त कुशल कामगार होंगे। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2030 तक दुनिया के 19 विकसित और विकासशील देशों में 8.52 करोड़ कुशल श्रमशक्ति की कमी होगी। जबकि भारत विश्व का इकलौता ऐसा देश होगा, जिसके पास वर्ष 2030 तक जरुरत से ज्यादा कुशल कामगार होंगे।

बुनियादी ढांचा सुधारेगी सरकार

देश में बेरोजगारों की बढ़ती संख्या को लेकर विपक्ष लगातार मोदी सरकार पर निशाना साध रहा है। विपक्ष का कहना है कि मोदी सरकार अपने वादे पर खरी नहीं उतरी और युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। यही कारण है कि इस बार के बजट को लेकर माना जा रहा है कि सरकार रोजगार वृद्धि के लिए बुनियादी ढांचा क्षेत्र पर फोकस करते हुए दिखाई दे सकती हैं। सरकार ने बुनियादी ढांचा क्षेत्र की परियोजनाओं पर आगामी पांच साल के लिए 102 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का फैसला किया है। सरकार के इस फैसले से ऊर्जा, सडक़, रेल, परिवहन, सिंचाई, हवाई अड्डों तथा डिजिटल क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर बढ़ऩे की संभावना होगी। रोजगार के नए अवसर पैदा करने की कोशिश में जुटी मोदी सरकार स्वरोजगार के नए अवसर पैदा करने के लिए बजट में प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई) को तेजी से आगे बढ़ा सकती है।

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स्टार्ट अप पर हो सकता है जोर

सत्ता में आने के बाद से पीएम मोदी स्टार्ट अप पर जोर देते रहे हैं और इसके लिए युवाओं को प्रेरित करते रहे हैं। स्टार्ट अप के क्षेत्र में भारत का प्रदर्शन अच्छा रहा है और इस मामले में भारत तीसरे नंबर पर है। ऐसे में माना जा रहा है कि ऐसे में बजट में स्टार्ट अप पर जोर हो सकता है तथा मुद्रा योजना को और विस्तार दिया जा सकता है। इधर बीच सरकार सरकारी विभागों में खाली पड़े पदों को भरने के लिए सक्रिय हुई है। सरकारी विभागों में करीब 6 लाख 84 हजार पद खाली हुए हैं। इन पदों को भरने की दिशा में भी पद उठाए जाने की उम्मीद है।

कृषिगत उद्यमों को मिलेगा बढ़ावा

सरकार नई शिक्षा नीति पर गंभीरता से काम कर रही है। इसके तहत 2030 तक शिक्षा में कुल सरकारी खर्च 10 फीसदी से बढ़ाकर 20 फीसदी करने का लक्ष्य तय किया गया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए भी सरकार की ओर से कदम उठाए जा सकते हैं। बजट में मनरेगा के लिए अतिरिक्त धन आवंटित करने के साथ ही सरकार ऐसे नए कृषिगत उद्यमों को प्रोत्साहन दे सकती है। इसका मकसद ग्रामीण क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक बुनियादी ढांचे को बढ़ाना होगा। इससे कृषि एव संबद्ध क्षेत्रों के विकास के माध्यम से बेरोजगारी और गरीबी दूर करने वाले कामों को प्रोत्साहन देने में मदद मिलेगी।

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एमएसएमई क्षेत्र की मांगें हो सकती हैं पूरी

इस समय मांग में सुस्ती और कर्ज न मिल पाने से एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग) क्षेत्र नकदी के संकट से जूझ रहा है। बजट के जरिये सरकार इस क्षेत्र में नई जान डालने की कोशिश कर सकती है। वित्त मंत्री उद्यमियों के साथ बजट पूर्व बैठक कर चुकी हैं। इस बैठक में उद्यमियो ने इस क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने के लिए कई मांगें रखी हैं। उद्यमियों की एक प्रमुख मांग यह है कि उनकी पेशेवर सेवाओं पर जीएसटी की दर 18 फीसदी से घटाकर पांच फीसदी की जाए।

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इसके साथ ही उन्होंने यह मांग भी रखी है कि बैंकों ने उसके 70,000 करोड़ रुपये को जो एनपीए घोषित किया है, उसे वर्ष 2022 तक नियमित कर्ज माना जाए। साथ ही उनकी यह भी मांग है कि बैंकों का सर्विस चार्ज माफ किया जाए। एक एमएसएमई द्वारा दूसरे एमएसएमई से कारोबार करने पर सर्विस चार्ज 12 फीसदी से घटाकर पांच फीसदी किए जाने की मांग भी की गई है। इस बार के बजट में यह उम्मीद भी की जा रही है कि सरकार रोजगार के क्षेत्र को फोकस कर सकती है और इस दिशा में उद्यमियों की इन मांगों को पूरा करने की दिशा में कदम उठाया जा सकता है।

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