जर्मन रिसर्च पेड़, पौधों व मनुष्यों के लिए फायदेमंद है ये भारतीय पूजा

जर्मन रिसर्च को केंद्र में रखकर बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के शिक्षकों व शोधार्थियों ने जर्मन एसोसिएशन ऑफ होमा थेरेपी के प्रेसिडेंट डॉक्टर उलरिक बर्क से “साइंटिफिक आस्पेक्ट्स ऑफ़ अग्निहोत्रा होमा थेरेपी” विषय पर चर्चा की।

लखनऊ: वायु प्रदूषण आज पूरे विश्व के सामने एक बड़ी चुनौती है जिसके समाधान के लिए वैज्ञानिक हर स्तर पर प्रयास कर रहे हैं । ऐसे में प्रदूषण से निपटने के प्राचीन भारतीय संस्कृति पर हुई जर्मन रिसर्च यह दावा करती है कि हवन न सिर्फ वायु प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों को नष्ट करता है बल्कि पेड़ पौधौं और मनुष्यों के लिए लाभकारी भी है।

जर्मन रिसर्च को केंद्र में रखकर बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के शिक्षकों व शोधार्थियों ने जर्मन एसोसिएशन ऑफ होमा थेरेपी के प्रेसिडेंट डॉक्टर उलरिक बर्क से “साइंटिफिक आस्पेक्ट्स ऑफ़ अग्निहोत्रा होमा थेरेपी” विषय पर चर्चा की।

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डॉ. उलरिक बर्क पिछले कई वर्षों से अग्निहोत्रा के पर्यावरण पर पड़ने वाले वैज्ञानिक प्रभावों पर अध्ययन कर रहे हैं। डॉ. बर्क ने अग्निहोत्रा (हवन) के बाद पाए गए परिणामों को साझा करते हुए बताया कि अग्निहोत्रा से पहले हवा में पाए जाने वाले पीएम (पार्टिकुलेट मैटर) और अग्निहोत्रा के बाद हवा में पाए जाने वाले पीएम की मात्रा में काफी गिरावट देखी गई।

राख से पानी को शुद्ध करने की बात

डॉ. उलरिक बर्क ने अग्निहोत्रा के बाद बची राख से पानी को शुद्ध करने की बात भी कही। ऑस्ट्रेलिया में सलाइन और एल्काइन वाटर की समस्या का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि अग्निहोत्रा की राख को सलाइन वॉटर में डाला गया और उसके 6 महीने बाद जो परिणाम सामने आए वह चौकाने वाले थे।

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डॉ. उलरिक बर्क बताते हैं कि पहले पानी में 1150 पीपीएम था जो कि राख डालने के 6 महीने बाद 720 पीपीएम मापा गया। इसके साथ ही उन्होंने मिट्टी की गुणवत्ता को भी अग्निहोत्रा की राख से बढ़ाने की बात कही। उन्होंने बताया कि एग्रोकेमिकल के प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता में कमी आई है लेकिन होमा थेरेपी मिट्टी की गुणवत्ता को वापस लाने में मदद करता है।

राख पेड़ पौधों की वृद्धि में भी मददगार होता है

डॉ. उलरिक बर्क ने बताया कि मिट्टी में पीएच की मात्रा 9.86 मापी गई, वर्मीकंपोस्ट डालने के बाद पीएच की मात्रा 9.06 रही जबकि वर्मीकंपोस्ट को जब अग्निहोत्रा की राख के साथ मिलाकर डाला गया तो उसमें पीएच की मात्रा 7.67 देखी गई। उन्होंने बताया कि अग्निहोत्रा की राख पेड़ पौधों की वृद्धि में भी मददगार होता है साथ ही वह व्यक्ति जो अग्निहोत्रा करते हैं उनके स्ट्रेस और ब्लड प्रेशर में भी सुधार देखने को मिला।

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इस चर्चा में डीन एकेडमिक प्रोफेसर आर. पी. सिंह, डॉ. आर. एस. द्विवेदी (रिटायर्ड डायरेक्टर, एनआरसीजी, जूनागढ़, गुजरात) प्रोफेसर दीपा द्विवेदी, प्रो. आर. बी. राम, डॉक्टर वेंकटेश दत्ता, प्रो. बी. सी. यादव समेत अन्य शिक्षक व शोधार्थी शामिल रहे। प्रो0 आर. पी. सिंह ने अग्निहोत्रा करने की विधि के बारे में भी डॉक्टर बर्क से जानकारी प्राप्त की और साथ ही उन्होंने सभी शिक्षकों व शोधार्थियों से कहा कि वह अग्निहोत्रा से जुड़े शोध कार्यों को करें व उससे प्राप्त परिणामों को साझा करें।

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि अग्निहोत्रा के फायदों को आम जन के साथ भी साझा किया जाए ताकि लोगों में जागरूकता आए और हर व्यक्ति मिलकर प्रदूषण से निपटने में अपना योगदान दे सके।