पिटारे में कैद हुआ मासूम का बचपन, पेट भरने के लिए मौत का खेल खेलने को मजबूर

बालक से जब पूछा गया कि कोई ऐसा क्यों कर रहा है तो उसने जवाब दिया कि पढ़ाई तो दूर हमें तो दो वक्त की रोटी मिलना मुश्किल है। सबसे पहले तो हम जीवित रहें।

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पिटारे में कैद हुआ मासूम का बचपन

रसूलाबाद: कोरोना महामारी के चलते गरीबों के सामने रोजी रोटी की विकराल समस्याएं खड़ी हो गयी हैं। अब आलम यह देखा जा रहा कि छोटे-छोटे बच्चों को भी बाहर सड़कों पर निकल कर भीख मांगने को मजबूर होते देखा जा है।

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पेट की भूख और परिवार की आहें जो न कराएं कम है। बेरोजगारी और आर्थिक तंगी से हर कोई परेशान है। ऐसे ही एक मासूम सा बालक हाथ में सर्प की पिटारी लिए अपने पेट की भूख को शांत करने के लिए घर-घर घूम घूम कर सर्प दिखा कर लोगों से पैसे मांग रहा है। जिसमें भी कुछ लोग देते कुछ ताने मारकर उसकी गरीबी का मख़ौल उड़ाते हैं।

गलियों की धूल फांकने पर मजबूर

आज जिन हाथों में कलम किताबें और लैपटॉप होनी चाहिए उन हाथों में बेरोजगारी का कटोरा है। ऐसा नही है इन मासूम बच्चों को पढ़ने लिखने का हौसला नहीं होता है। होता है साहब लेकिन इनकी मजबूरी इन को आगे नहीं बढ़ने देती। बल्कि अपनी उसी पुरानी परंपरा में रंग जाते हैं और शरीर में धोती, कंधों में पोटली और हाथ में सर्प की पिटारी लेकर नंगे पैर सड़क सहित गांव गलियों की धूल फांक रहे हैं।

देश को आजाद हुए भले ही 72 साल हो गए हो लेकिन आज भी ऐसी तस्वीरें देखने को मिल जाती हैं जो हर इंसान को सोचने पर विवश कर देती हैं। जब पिपरी झींझक निवासी इस बालक को हाथ में सर्प का पिटारा लिए देखा तो मुझसे रहा नहीं गया और पहले वह कार्य किया जिसकी उसे जरूरत थी तदोपरान्त उसका चित्र लिया। ताकि लोग इस चित्र को देखकर ज्यादा नहीं कुछ तो विचार करें । आज दुर्भाग्य है इन बच्चों का जिनके पढ़ने की उम्र में यह गरीबी के कारण अपना पुश्तैनी काम करते चले आ रहे हैं।

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आखिर कहां हैं बड़ी-बड़ी बातें करने वाले?

बड़ी-बड़ी बातें करने वाले आखिर वह लोग ऐसे में कहां है बेरोजगारी और आर्थिक तंगी से जूझ रहा ये मासूम महज अपने पेट की भूख मिटाने के लिए खेल कूद और पढ़ाई की जगह दर बदर की ठोकरें खा रहे हैं। बालक सिस्टम की मार झेल रहा है और अपने परिवार की भूख मिटाने के लिए हर सितम सह रहा है।

पेट का सवाल है बाबू वरना हर कोई यह काम क्यों करता

बालक से जब पूछा गया कि कोई ऐसा क्यों कर रहा है तो उसने जवाब दिया कि पढ़ाई तो दूर हमें तो दो वक्त की रोटी मिलना मुश्किल है। सबसे पहले तो हम जीवित रहें। इसके बाद जब समय बचेगा और पैसा बचेगा तो पढ़ाई भी कर ली जाएगी। लेकिन शासन की ओर से उक्त बालक के परिवार व उसको कोई मदद नहीं मिल पा रही।

रिपोर्ट: मनोज सिंह

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