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कांप उठी दुनिया: सबसे खतरनाक बीमारी की शुरुआत, नहीं रोका तो मचेगा तांडव

महामारी कोरोना वायरस से दुनिया को छुटकारा मिल नहीं पा रहा और अब एक नई परेशानी बुरी खबर बनकर आई है। चीन से एक नई खतरनाक बीमारी के फैलने का खतरा तेजी से मंडरा रहा है।

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Updated on: 6 July 2020 7:36 AM GMT
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नई दिल्ली। महामारी कोरोना वायरस से दुनिया को छुटकारा मिल नहीं पा रहा और अब एक नई परेशानी बुरी खबर बनकर आई है। चीन से एक नई खतरनाक बीमारी के फैलने का खतरा तेजी से मंडरा रहा है। इस घातक जानलेवा बीमारी ने पहले भी पूरी दुनिया में लाखों की जान लीं है। इस खतरनाक जानलेवा बीमारी का दुनिया में आज से पहले तीन बार हमला हो चुका है। से ब्लैक डेथ या काली मौत भी कहते हैं.

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अलर्ट जारी

चीन की खतरनाक बीमारी का नाम ब्यूबोनिक प्लेग है। ऐसे में उत्तरी चीन के एक अस्पताल में ब्यूबोनिक प्लेग का मामला सामने आने के बाद से वहां अलर्ट जारी कर दिया गया है। चीन के आंतरिक मंगोलियाई स्वायत्त क्षेत्र, बयन्नुर में प्लेग को रोकने और नियंत्रण के लिए तीसरे स्तर की चेतावनी जारी की गई है।

जानलेवा बीमारी ब्यूबोनिक प्लेग का यह केस बयन्नुर के एक अस्पताल में शनिवार को सामने आया था। स्थानीय स्वास्थ्य विभाग ने यह चेतावनी 2020 के अंत तक के लिए जारी की है। साथ ही लोगों को सतर्क रहने के लिए कहा है। क्योंकि यह बीमारी जंगली चूहों में पाए जाने वाली बैक्टीरिया से फैलती है।

उंगलियां काली पड़कर सड़ने लगती

चूहों से फैलने वाले इस बैक्टीरिया का नाम यर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरियम है। यह बैक्टीरिया शरीर के लिंफ नोड्स, खून और फेफड़ों पर हमला करता है। इससे उंगलियां काली पड़कर सड़ने लगती है। नाक के साथ भी ऐसा ही कुछ होता है।

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चीनी सरकार ने बयन्नुर शहर में मानव प्लेग फैलने के खतरे की आशंका व्यक्त की है। ब्यूबोनिक प्लेग को गिल्टीवाला प्लेग भी कहते हैं। इसमें शरीर में असहनीय दर्द, तेज बुखार होता है।

साथ ही नाड़ी तेज चलने लगती है। दो-तीन दिन में गिल्टियां निकलने लगती हैं। 14 दिन में ये गिल्टियां पक जाती हैं। इसके बाद शरीर में जो दर्द होता है वो बेतहासा असहनीय होता है।

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584 लोगों की मौत

जानकारी के मुताबिक, दुनिया भर में ब्यूबोनिक प्लेग के 2010 से 2015 के बीच करीब 3248 मामले सामने आ चुके हैं। जिनमें से 584 लोगों की मौत हो चुकी है। इन सालों में ज्यादातर मामले डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कॉन्गो, मैडागास्कर, पेरू में आए थे।

वहीं इससे पहले 1970 से लेकर 1980 तक इस बीमारी को चीन, भारत, रूस, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण अमेरिकी देशों में पाया गया है।

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