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नेपाल के सियासी संकट में चीन का सीधा हस्तक्षेप, फिर भी ड्रैगन नाकाम

चीन ने नेपाल में भरी निवेश कर रखा है। इसके अलावा वो नेपाल में ‘बॉर्डर रोड इनिशिएटिव’ (बीआरआई) को लेकर पीछे नहीं दिखना चाहता। चीन के मुकाबले अमेरिका भी पाँच सौ अरब डॉलर के ‘मिलेनियम चैलेंज कोऑपरेशन’ को लेकर तैयार है, जिसे नेपाल की संसद को अनुमोदित करना है।

SK Gautam

SK GautamBy SK Gautam

Published on 2 Jan 2021 6:58 AM GMT

नेपाल के सियासी संकट में चीन का सीधा हस्तक्षेप, फिर भी ड्रैगन नाकाम
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नीलमणि लाल

लखनऊ। नेपाल के राजनीतिक संकट में अब चीन सीधे हस्तक्षेप कर रहा है। नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर पैदा हुए मतभेद के बाद चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेता के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल नेपाल आया और प्रधानमंत्री ओली तथा प्रचंड से बातचीत की। चीनी दल से ओली-प्रचंड में सुलह कराने की कोशिशें कीं। चीन चाहता है कि प्रचंड-ओली फिर से एक साथ आ जाएं।

भारत और अमेरिका को नेपाल से दूर रखना चाहता है चीन

चीनी प्रतिनिधि मंडल ने नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के माधव नेपाल के अलावा कुछ अन्य नेताओं से भी बात की, जिनमें नेपाली कांग्रेस के शेर बहादुर देउबा और जनता समाजवादी पार्टी के नेता बाबूराम भट्टराई भी शामिल हैं। चीन का इंटरेस्ट इसमें है कि वह भारत और अमेरिका को नेपाल से दूर रखे और खुद नेपाल को पूरी तरह कंट्रोल करे। चीन की विस्तारवादी नीतियों में नेपाल की प्रमुख हैसियत है।

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चीन ही लाया था ओली और प्रचंड को करीब

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को ही ओली और प्रचंड को 2018 में साथ लाने का श्रेय दिया जाता है। 2017 के आम चुनावों में केपी शर्मा ओली वाली नेपाल की कयुनिस्ट पार्टी (एकजुट मार्क्सवादी-लेनिनवादी) और प्रचंड की नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने एक साथ चुनावी मैदान में थीं। इस गठबंधन को नेपाल की संसद में दो तिहाई बहुमत भी मिला। अगले साल दोनों ही दलों का विलय चीन की पहल पर हो गया था। लेकिन अब सब कुछ चीन के प्लान के मुताबिक नहीं हो रहा है।

निवेश की चिंता

चीन ने नेपाल में भरी निवेश कर रखा है। इसके अलावा वो नेपाल में ‘बॉर्डर रोड इनिशिएटिव’ (बीआरआई) को लेकर पीछे नहीं दिखना चाहता। चीन के मुकाबले अमेरिका भी पाँच सौ अरब डॉलर के ‘मिलेनियम चैलेंज कोऑपरेशन’ को लेकर तैयार है, जिसे नेपाल की संसद को अनुमोदित करना है। चीन इसे पास नहीं होने देना चाहता है। चीन सभी राजनीतिक दलों से अपने रिश्ते और ट्रांस हिमालयन मल्टी डायमेंसनल कनेक्टिविटी नेटवर्क के लिए आर्थिक सहयोग जारी रखना चाहता है। इस नेटवर्क में बंदरगाहों, सड़कों, रेलवे, उड्डयन और संचार निर्माण शामिल है।

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इसके लिए अक्टूबर 2019 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेपाल दौरे पर सहमति बनी थी। अरबों डॉलर का यह निवेश नेपाल की बीमार अर्थव्यवस्था में जान फूंक सकता है। चीन, नेपाल की अंदरूनी राजनीति को नियंत्रित करना चाहता है क्योंकि भविष्य में वह वहां निवेश बढ़ाना चाहता है। चीन की नजर नेपाल की प्राकृतिक संपदा पर भी है। इस सम्पदा में बहुत बड़ा हिस्सा उस बालू का है जो नेपाल के बेशुमार नदियों में मौजूद है।ये फ्रेश वाटर बालू चिप बनाने के काम में आती है।

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फिलहाल चीन खाली हाथ

चीन के बड़े नेताओं का नेपाल दौरा फिलहाल तो नाकाम ही रहा है। चीन की नाकामी का सबसे बड़ा उदाहरण है कि जिस नेपाली कांग्रेस को वो इतने सालों तक वो चीन विरोधी मानता रहा अब उसी पार्टी के नेताओं को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने चीन आने का न्योता दिया है।यह न्योता चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के शताब्दी उत्सव में शामिल होने के लिए दिया है। मतलब साफ़ है कि चीन कोई भी सिरा पकड़ने को तैयार है।उसे हर हालत में नेपाल को कंट्रोल करना है।

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