कौन हैं ये संत कोरोना, जिनकी समाधि आज भी पूजते हैं लोग

कोरोना महामारी के इस दौर में भले ही कई लोग संत कोरोना से बीमारी से बचाने की प्रार्थना करने ना जा रहे हों लेकिन क्या पता इसके कारण जाने वाली नौकरियों और आने वाली आर्थिक परेशानियों से रक्षा के लिए लोग फिर से संत कोरोना की प्रार्थना करने लगें।

नई दिल्ली। कोरोना वायरस से फैली महामारी के दौर में जर्मनी की संत कोरोना चर्चा में आ गई हैं। माना जाता है कि करीब 1,800 साल पहले रोमन शासकों ने कोरोना का इतना उत्पीड़न किया कि उनकी मौत हो गई। उनके नाम कोरोना का लैटिन भाषा में मतलब होता है “मुकुट।” सन 997 में राजा ऑटो तृतीय संत कोरोना के अवशेषों को आखेन लेकर आए थे। पहले सैकड़ों साल तक इन्हें कैथीड्रल में ही एक तख्ते के नीचे रखा गया था और 20वीं सदी की शुरुआत में मुख्य समाधिस्थल पर लाया गया।

मान्यता

जर्मनी के बवेरिया और ऑस्ट्रिया के कुछ इलाकों में संरक्षक देवता के रूप में इनकी मान्यता रही है और आज भी है। जुआ खेलने वाले, खजाने की तलाश करने वाले और कसाई खास तौर पर संत कोरोना से प्रार्थना करते थे। उस काल में अलग अलग पेशों से जुड़े लोगों की आर्थिक मुसीबत के समय में अलग अलग संरक्षक संत हुआ करते थे। चर्च के कुछ प्रतिनिधि बताते हैं कि स्थानीय तौर पर संत कोरोना को संक्रामक बीमारियों को दूर करने वाली संत भी माना जाता था।

चाहे अपने पालतू पशुओं को संक्रामक बीमारी से बचाना हो या कोई मुश्किल की घड़ी हो, जर्मनी के पड़ोसी देश ऑस्ट्रिया के सेंट कोरोना नाम के एक छोटे से शहर के लोग हर हाल में इसी संत से प्रार्थना करते थे। यह एक बहुत ही स्थानीय मान्यता थी लेकिन हाल के समय में इस ओर बाकी दुनिया का भी ध्यान गया है।

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कोरोना महामारी के इस दौर में भले ही कई लोग संत कोरोना से बीमारी से बचाने की प्रार्थना करने ना जा रहे हों लेकिन क्या पता इसके कारण जाने वाली नौकरियों और आने वाली आर्थिक परेशानियों से रक्षा के लिए लोग फिर से संत कोरोना की प्रार्थना करने लगें।

प्रदर्शनी

जर्मनी के आखेन शहर में स्थित प्राचीन कैथीड्रल ने अपने कीमती संग्रह में से हाल ही में एक भव्य कृति प्रदर्शित की है जिसमें संत कोरोना के कुछ अस्थि अवशेष रखे हुए हैं। जनता के लिए प्रदर्शित की गई चीजों में सोने की बनी कई दूसरी बहूमूल्य वस्तुओं के अलावा संत कोरोना की वो समाधि भी है जिस पर सोने, कांसे और हाथी दांत की खूबसूरत नक्काशी है।

9वीं सदी का यह कैथीड्रल पहले पवित्र रोमन सम्राट शार्लेमाग्ने के समाधि स्थल के रूप में मशहूर है, जिनका देहांत सन 814 में हुआ था। उसके बाद के काल में कई जर्मन राजाओं और रानियों का राज्याभिषेक यहां होने की परंपरा रही है। एक अहम प्राचीन तीर्थस्थल के रूप में इस कैथीड्रल की मान्यता है।

रिपोर्ट नीलमणि लाल