Superboys of Malegaon Review: दिलचस्प कहानी के साथ बड़े सपने देखने की हिम्मत देती है फिल्म
Superboys of Malegaon Review In Hindi: सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव फिल्म दर्शकों को कितनी पसंद आने वाली है जानिए;
Superboys of Malegaon Review: विनीत कुमार सिंह और आदर्श गौरव की फिल्म सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव आज सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। जिस दिन से इस फिल्म का ट्रेलर आया है। उस दिन से दर्शकों को इस फिल्म (Superboys of Malegaon Movie) का बेसब्री से इंतजार था। अब जाकर दर्शकों का ये इंतजार खत्म हो चुका है। चलिए जानते हैं कैसी है सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव फिल्म
सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव रिव्यू (Superboys of Malegaon Review In Hindi)-
फिल्म की कहानी नासिर के ईर्द-गिर्द घूमती है। जो मालेगांव के छोटे शहर में एक थिएटर मालिक है, जहाँ सिनेमा सबसे बड़ी विलासिता और मनोरंजन है। सिनेमाघरों की कमी के कारण थिएटर मालिक कुछ नवीनतम रिलीज को जनता के सामने दिखाने और जल्दी पैसे कामने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। तो वहीं नासिर को फिल्म निर्माण करने का शौक है और वह मालेगांव के लिए अपनी खुद की फिल्म बनाने का सपना देखता है। अपने दोस्तों के साथ जिसमें एक संघर्षशील लेखक, फरोग और अभिनय का शौक रखने वाले एक मिल मजदूर, शरीफ भी शामिल है। शोले की पैरोडी बनाने का फैसला करते हैं।
जब फिल्म (Superboys of Malegaon Movie) हिट हो जाती हैतो नासिर और भी पैरोडी बनाने की तैयारी करता है। लेकिन जल्दी प्रसिद्धी और पैसे की वजह से गिरोह के भीतर तनाव पैदा ह ो जाता है। ग्रुप बिखरने लगता है आगे क्या होता है इसको जानने के लिए आपको पूरी फिल्म अपने नजदीकी सिनेमाघरों में जाकर देखनी होगी। फिल्म की कहानी काफी दिलचस्प है, जो प्यार, दृढ़ संकल्प, दोस्ती और कुछ असाधारण हासिल करने के उद्देश्य से किया गया श्रम है।
सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव फिल्म की कहानी एकदम हटकर है जिसमें छोटे शहर के युवाओं की कहानी को दर्शाया गया है। जिसमें मालेगांव के लोगों की कहानी को दर्शाया गया है। जिनकी जिंदगी अक्सर अनसुनी रह जाती है। फिल्म का मुख्य संदेश इस जागृति में निहित है जिसमें लड़कों का एक समूह बड़े सपने देखने की हिम्मत करता है और अपने छोटे शहर की कहानी कहने के लिए सिनेमा के प्रति अपने प्यार को आगे बढ़ाता है। कई बाधाओं के बावजूद वे अपनी अंतिम मूल कृति सुपरमैन ऑफ मालेगांव बनाते हैं, जो उनके सपनों और महत्वाकांक्षाओं को एक नई उम्मीद देती है। सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव 2008 की डॉक्यूमेंट्री सुपरमैन ऑफ मालेगांव पर आधारित है। जिसे रीमा कागती ने बेहतरीन तरीके से असल जिंदगी के लोगों की कहानी की तरह पेश किया है।