First General Election India: भारत का पहला आम चुनाव 1951-52, जब भारत ने लोकतंत्र पर भरोसा किया
1951-52 में भारत ने अपना पहला आम चुनाव कराया। जानिए सुकुमार सेन, 17.3 करोड़ मतदाताओं, चुनाव चिह्नों और जवाहरलाल नेहरू की जीत की पूरी कहानी।
First General Election India 1951-52
First General Election India: आज भारत में आम चुनाव होना एक नियमित लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। करोड़ों मतदाता मतदान केंद्रों तक जाते हैं, सरकारें बनती और बदलती हैं। चुनाव परिणाम के आधार पर सत्ता का हस्तांतरण होता है। लेकिन आज से करीब सात दशक पहले यही प्रक्रिया दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक प्रयोगों में से एक थी। 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब उसके सामने केवल अंग्रेजी शासन से मिली सत्ता को संभालने की चुनौती नहीं थी। विभाजन की त्रासदी ताजा थी। लाखों लोग विस्थापित हुए थे। सांप्रदायिक हिंसा ने देश को झकझोर दिया था। अर्थव्यवस्था कमजोर थी। शिक्षा का प्रसार बहुत कम था और अधिकांश आबादी गांवों में रहती थी तथा खेती पर निर्भर थी। ऐसे भारत ने कुछ ही वर्षों के भीतर यह फैसला किया कि देश का शासन किसी राजा, सैन्य शक्ति, संपन्न वर्ग या शिक्षित अभिजात वर्ग की इच्छा से नहीं।बल्कि आम नागरिक के वोट से चलेगा।
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण बात शायद यही थी कि संविधान निर्माताओं ने लोकतंत्र को धीरे-धीरे नीचे तक पहुंचाने का रास्ता नहीं चुना। भारत ने शुरुआत ही सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से की। उस समय दुनिया के अनेक लोकतंत्रों के इतिहास में मतदान का अधिकार चरणबद्ध तरीके से विकसित हुआ था। कहीं संपत्ति की शर्त थी। कहीं महिलाओं को पुरुषों के काफी बाद मतदान का अधिकार मिला। कहीं नस्ल के आधार पर नागरिक अधिकार सीमित रहे। इसके विपरीत नया भारतीय गणराज्य इस सिद्धांत पर खड़ा हुआ कि सरकार चुनने का अधिकार नागरिक की संपत्ति, जाति, धर्म, शिक्षा अथवा सामाजिक हैसियत पर निर्भर नहीं होगा। संविधान लागू होने के साथ ही वयस्क भारतीय नागरिक को राजनीतिक समानता का अधिकार मिला।
यह निर्णय जितना आदर्शवादी दिखाई देता था, उसे जमीन पर उतारना उतना ही कठिन था। 1951-52 में हुए पहले आम चुनाव के लिए लगभग 17.3 करोड़ मतदाता पंजीकृत किए गए। इनमें बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी, जो पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे। देश का बड़ा हिस्सा गांवों में रहता था। पहाड़, जंगल, रेगिस्तान, द्वीप और ऐसे दुर्गम क्षेत्र थे, जहां पहुंचना तक मुश्किल था। आज जैसी सड़कें, संचार व्यवस्था, डिजिटल तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनें उपलब्ध नहीं थीं। मतदाता सूची तैयार करने से लेकर मतदान केंद्र बनाने और चुनाव सामग्री पहुंचाने तक लगभग हर काम पहली बार और विशाल पैमाने पर किया जाना था।
भारत के प्रथम मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन और चुनाव आयोग के सामने इसलिए केवल चुनाव कराने की जिम्मेदारी नहीं थी। उन्हें ऐसी चुनाव प्रणाली खड़ी करनी थी, जिसे सामान्य से सामान्य नागरिक समझ सके। जिस पर राजनीतिक दलों तथा मतदाताओं को भरोसा हो। निरक्षरता की समस्या को देखते हुए चुनाव चिह्नों को विशेष महत्व दिया गया। मतदान केंद्र देश के दूर-दराज क्षेत्रों तक बनाए गए। लाखों कर्मचारियों को चुनाव प्रक्रिया से जोड़ा गया। मतपेटियों और मतपत्रों की व्यवस्था हुई। यह सब ऐसे समय में किया गया, जब भारत के प्रशासनिक और आर्थिक संसाधन आज की तुलना में बेहद सीमित थे।
पहले आम चुनाव अक्टूबर 1951 से फरवरी 1952 के बीच कई चरणों में संपन्न हुए। लोकसभा की 489 सीटों के लिए चुनाव हुआ और लगभग 45.7 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान किया। आज के मतदान प्रतिशत की तुलना में यह संख्या कम लग सकती है। लेकिन उस समय की सामाजिक परिस्थितियों, निरक्षरता, यातायात की कठिनाइयों और लोकतांत्रिक चुनाव के बिल्कुल नए अनुभव को देखते हुए करोड़ों भारतीयों का मतदान केंद्रों तक पहुंचना अपने आप में ऐतिहासिक घटना थी।
इस चुनाव की एक और महत्वपूर्ण विशेषता राजनीतिक प्रतिस्पर्धा थी। स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व करने के कारण कांग्रेस देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति थी। जवाहरलाल नेहरू अत्यंत लोकप्रिय नेता थे। इसके बावजूद चुनाव को केवल कांग्रेस की औपचारिक जीत की प्रक्रिया नहीं बनाया गया। कम्युनिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी, किसान मजदूर प्रजा पार्टी, भारतीय जनसंघ और विभिन्न क्षेत्रीय दलों के साथ बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे। सत्ता की आलोचना करने, वैकल्पिक कार्यक्रम रखने और सरकार के विरुद्ध वोट मांगने का अधिकार विपक्ष को प्राप्त था।
परिणाम में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला। उसने लोकसभा की 489 में से 364 सीटें जीतीं और जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री बने। लेकिन भारतीय लोकतंत्र की सफलता केवल कांग्रेस की जीत में नहीं थी। उसकी वास्तविक सफलता यह थी कि चुनाव परिणाम को राजनीतिक व्यवस्था ने स्वीकार किया। विपक्ष संसद में पहुंचा। सत्ता तथा विपक्ष दोनों ने चुनाव को राजनीतिक वैधता का आधार माना। स्वतंत्रता आंदोलन से निकले नेतृत्व ने अपनी लोकप्रियता को स्थायी शासन का अधिकार मानने के बजाय जनता से नया जनादेश लिया।
भारत का यह प्रयोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि उस दौर में एशिया और अफ्रीका के अनेक देश औपनिवेशिक शासन से मुक्त हो रहे थे। नए राष्ट्रों के सामने यह प्रश्न था कि स्वतंत्रता के बाद शासन व्यवस्था कैसी होगी। आने वाले दशकों में कई नवस्वतंत्र देशों में लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर पड़ीं, सैन्य शासन आया या एकदलीय सत्ता स्थापित हुई। भारत ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद चुनाव आधारित संसदीय लोकतंत्र को बनाए रखने का रास्ता चुना।
पहले चुनाव ने भारत के गरीब और निरक्षर मतदाता के बारे में बनी कई धारणाओं को भी चुनौती दी। यह मान लेना आसान था कि शिक्षा से वंचित व्यक्ति राजनीतिक निर्णय लेने में सक्षम नहीं होगा। लेकिन भारतीय मतदाता ने धीरे-धीरे साबित किया कि औपचारिक शिक्षा और राजनीतिक समझ एक ही चीज नहीं हैं। ग्रामीण मतदाता अपने स्थानीय हित, उम्मीदवार, सरकार और राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर निर्णय ले सकता है। आने वाले चुनावों में यही मतदाता सरकारों को जिताता भी रहा और पराजित भी करता रहा।
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी भी इस प्रयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। भारत ने स्वतंत्रता के तुरंत बाद महिलाओं को पुरुषों के समान मतदान का अधिकार दिया। इसके लिए महिलाओं को किसी अलग राजनीतिक आंदोलन के माध्यम से वर्षों तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। हालांकि शुरुआती मतदाता सूची तैयार करते समय एक गंभीर सामाजिक समस्या सामने आई। अनेक महिलाएं अपना व्यक्तिगत नाम बताने के बजाय स्वयं को किसी की पत्नी या किसी की मां के रूप में दर्ज कराना चाहती थीं। चुनाव आयोग ने व्यक्तिगत पहचान के सिद्धांत पर जोर दिया। यह केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं थी। लोकतंत्र भारतीय महिला को स्वतंत्र राजनीतिक नागरिक के रूप में पहचान दे रहा था।
पहले चुनाव की सबसे बड़ी विरासत यही थी कि उसने संविधान को कागज से निकालकर करोड़ों लोगों के जीवन से जोड़ दिया। 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू होने से भारत कानूनी रूप से लोकतांत्रिक गणराज्य बना था। लेकिन 1951-52 के चुनाव ने उस लोकतंत्र को सामाजिक और राजनीतिक जीवन में वास्तविक रूप दिया। गांव का किसान, मजदूर, महिला, गरीब, दलित, आदिवासी और वह नागरिक जो अपना नाम तक नहीं लिख सकता था—सभी को सत्ता निर्माण की प्रक्रिया में बराबर का वोट मिला। मतपत्र पर प्रत्येक नागरिक की राजनीतिक हैसियत समान थी।
इसके बाद भारत में चुनावों की नियमितता ने इस नींव को और मजबूत किया। चुनाव आयोग एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था के रूप में विकसित हुआ। राजनीतिक दलों का विस्तार हुआ। विपक्ष मजबूत हुआ। केंद्र और राज्यों में सत्ता परिवर्तन होने लगे। 1977 में मतदाताओं ने आपातकाल के बाद पहली बार केंद्र में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। आगे चलकर गठबंधन सरकारों का दौर आया। फिर पूर्ण बहुमत वाली सरकारें भी बनीं। लेकिन इस पूरी राजनीतिक यात्रा का आधार वही सिद्धांत रहा जिसकी पहली विशाल परीक्षा 1951-52 में हुई थी—देश पर शासन करने का अधिकार अंततः मतदाता देता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि भारतीय लोकतंत्र की यात्रा हमेशा निर्विवाद या समस्याओं से मुक्त रही। चुनावी हिंसा, धनबल, बाहुबल, जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, राजनीति का अपराधीकरण, दल-बदल, संस्थाओं की निष्पक्षता और चुनावी वित्तपोषण जैसे प्रश्न अलग-अलग दौर में उठते रहे हैं। आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे गंभीर संकटों में से एक रहा। फिर भी भारतीय लोकतंत्र की शक्ति इस बात में रही कि उसके भीतर सुधार, विरोध, राजनीतिक परिवर्तन और सत्ता परिवर्तन की गुंजाइश बनी रही।
इसीलिए भारत के पहले आम चुनाव को केवल चुनावी आंकड़ों के आधार पर नहीं समझा जाना चाहिए। यह नवस्वतंत्र भारत के राजनीतिक नेतृत्व और संविधान निर्माताओं द्वारा अपने नागरिकों पर जताए गए विश्वास की परीक्षा थी। नेतृत्व ने यह नहीं कहा कि पहले जनता को पूरी तरह शिक्षित और समृद्ध किया जाएगा। उसके बाद लोकतंत्र दिया जाएगा। भारत ने उलटा रास्ता चुना—उसने पहले नागरिक को राजनीतिक समानता दी। लोकतंत्र को सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का माध्यम बनाने की कोशिश की।
यही उस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश था। दुनिया के सामने भारत ने साबित किया कि लोकतंत्र केवल समृद्धि के बाद मिलने वाली विलासिता नहीं है। गरीबी, निरक्षरता, भाषाई विविधता, धार्मिक बहुलता और गहरी सामाजिक विषमताओं के बीच भी लोकतांत्रिक व्यवस्था खड़ी की जा सकती है। बशर्ते राज्य अपने नागरिक की राजनीतिक समझ और उसके अधिकार पर विश्वास करे।
1951-52 में जब करोड़ों भारतीय पहली बार मतपेटियों के सामने पहुंचे, तब वे केवल सांसद नहीं चुन रहे थे। वे यह तय कर रहे थे कि सदियों की राजशाही और लगभग दो शताब्दियों के औपनिवेशिक शासन के बाद इस देश में अंतिम राजनीतिक शक्ति किसके पास होगी। उस चुनाव का उत्तर स्पष्ट था—भारत की अंतिम राजनीतिक शक्ति भारत की जनता होगी। स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव की सबसे बड़ी उपलब्धि और भारतीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव यही थी।