नहीं सुलझ रही जस्टिस वर्मा केस की गुत्थी, जांच कमेटी के सामने अब भी ये 2 बड़े अनसुलझे सवाल

Justice Yashwant Verma Row: जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से जले 500 रुपये के नोट मिलने के मामले में संसदीय जांच समिति की रिपोर्ट के बाद भी दो बड़े सवाल अनसुलझे हैं। आखिर स्टोररूम में कुल कितनी नकदी थी और उस कैश का असली मालिक कौन था?

Update:2026-08-12 18:01 IST

Justice Yashwant Verma Row: राजधानी दिल्ली के बेहद सुरक्षित इलाके में स्थित 30, तुगलक क्रेसेंट वाला सरकारी बंगला अचानक एक बड़े वित्तीय विवाद का केंद्र बन गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के इस आधिकारिक आवास परिसर में आग लगने के बाद भारी मात्रा में 500 रुपये के जले नोट बरामद हुए। इस हाई-प्रोफाइल मामले की पड़ताल के लिए गठित संसदीय जांच समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश कर दी है। समिति ने स्पष्ट कहा कि जज साहब के नियंत्रण वाले परिसर में मिले इस कैश के असली स्रोत, मालिकाना हक और मौजूदगी को लेकर कोई तर्कसंगत जवाब नहीं दिया जा सका। हालांकि, पैनल ने यह भी साफ किया कि यह कोई आपराधिक फैसला नहीं है जो व्यक्तिगत रूप से जज को ही कैश का मालिक घोषित करे।

साक्ष्यों से छेड़छाड़ और वरिष्ठ अफसरों की भारी लापरवाही

संसदीय पैनल द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट में कई स्तरों पर हुई गंभीर लापरवाहियों का पर्दाफाश हुआ है। जांच रिपोर्ट के अनुसार, जब आग बुझाने के लिए दिल्ली पुलिस और फायर ब्रिगेड के अधिकारी मौके पर पहुंचे, तो उन्होंने वहां मिली नकदी को तुरंत जब्त करने और सुरक्षित रखने में भारी कोताही बरती। इसे समिति ने बेहद गंभीर प्रशासनिक चूक माना। कानून के मुताबिक सीलिंग और आधिकारिक जांच से पहले ही स्टोररूम के हालात बदल दिए गए थे। इतना ही नहीं, बाद में वहां से कुछ नोटों के गायब हो जाने को लेकर भी कोई उचित स्पष्टीकरण सामने नहीं आया। हालांकि, इस लापरवाही का सीधा अर्थ यह नहीं निकाला गया कि जज ने स्वयं उन नोटों को वहां से हटवाया था।

टालमटोल वाला रवैया और रात 2 बजे का रहस्य

जांच समिति के सामने सुनवाई के दौरान पूर्व जज का रुख लगातार अस्पष्ट और गैरजिम्मेदाराना रहा। समिति ने 22 मार्च 2025 को दिए गए उनके जवाब को पूरी तरह असंतोषजनक और टालमटोल भरा पाया। रिपोर्ट में इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि हादसे वाली रात करीब 2 बजे जज और उनके कर्मचारियों के बीच बातचीत हुई थी। उस देर रात की मुलाकात में क्या बातचीत हुई और कर्मचारियों को क्या निर्देश जारी किए गए, इसका कोई विवरण जांच टीम को नहीं सौंपा गया। बचाव पक्ष ने इस बातचीत को साबित करने के लिए किसी कर्मचारी को गवाह के रूप में प्रस्तुत करने से परहेज किया, जिसके कारण समिति ने इस चुप्पी पर प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला।

कितना था कैश? अब भी बना हुआ है अनसुलझा सवाल

इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा अनसुलझा सवाल यह बना हुआ है कि आखिर उस स्टोररूम में कुल कितनी रकम मौजूद थी। संसदीय जांच समिति तमाम गवाहों और सबूतों के बावजूद नकदी की सटीक कीमत का आकलन करने में नाकाम रही। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि घटना के समय मौके पर मौजूद सुरक्षा बल और अधिकारियों ने नोटों की न तो कोई सूची बनाई और न ही उनकी गिनती करके उन्हें पुलिस कस्टडी में लिया। हालांकि, स्वतंत्र गवाहों और दमकलकर्मियों के बयानों से यह बात पूरी तरह साबित हो गई कि वहां 500 रुपये के नोटों की शक्ल में बहुत बड़ी धनराशि मौजूद थी, लेकिन कुल रकम का आंकड़ा आज भी एक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है।

जज का बचाव, इस्तीफा और आगे की राह

दूसरी तरफ, न्यायमूर्ति वर्मा ने अपने बचाव में साजिश की आशंका जताई थी। उन्होंने दावा किया कि किसी ने दुर्भावनापूर्ण तरीके से यह नकदी वहां रखी होगी, या फिर नोट पूरी तरह फर्जी थे। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि मौके पर पहुंचे लोगों ने ही कैश वहां से गायब कर दिया। हालांकि, इन दावों के समर्थन में न तो कोई ठोस सबूत दिया गया और न ही कोई हलफनामा दायर किया गया। बाद में उन्होंने जांच प्रक्रिया में भाग लेना बंद कर दिया था। सितंबर 2025 में गठित हुई यह समिति अपनी जांच पूरी कर चुकी है। इस बीच, जज ने 9 अप्रैल 2026 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पद से अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को भेज दिया। पद से इस्तीफा देने के कारण उन्हें हटाने की संसदीय महाभियोग प्रक्रिया अब निष्प्रभावी हो गई है, लेकिन इस मामले से जुड़े कानूनी दस्तावेज सक्षम प्राधिकारी को सौंप दिए गए हैं।

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