FCRA पर NDA के नरम पड़े तेवर? परिसीमन और महिला आरक्षण के लिए DMK-NCP को साधने की कोशिश, समझें पूरा गणित

FCRA बिल पर NDA सरकार के नरम रुख के संकेत क्यों मिल रहे हैं? परिसीमन और महिला आरक्षण के लिए DMK और NCP (SP) के समर्थन की जरूरत, जानिए लोकसभा-राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत का पूरा गणित।

Update:2026-08-10 10:02 IST

FCRA Bill 2026: संसद के मॉनसून सत्र के आखिरी दौर में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के सामने एक तरफ FCRA संशोधन विधेयक को लेकर विपक्ष का विरोध है, तो दूसरी तरफ परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे अहम प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी संख्याबल जुटाने की चुनौती है। सत्र खत्म होने में अब कुछ ही दिन बचे हैं और सरकार के सोमवार के शुरुआती एजेंडे में FCRA संशोधन विधेयक का नाम नहीं होना कई राजनीतिक संकेत दे रहा है।

माना जा रहा है कि सरकार फिलहाल FCRA बिल पर कदम धीमे कर सकती है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह संसद में परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों के लिए व्यापक राजनीतिक समर्थन जुटाने की कोशिश बताई जा रही है।

FCRA बिल पर सरकार क्यों कर सकती है ‘वेट एंड वॉच’?

संसद की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी (BAC) मॉनसून सत्र के बचे दिनों के एजेंडे को अंतिम रूप देने वाली है। शुरुआती कार्यसूची में कई नए विधेयकों का जिक्र है, लेकिन FCRA संशोधन विधेयक का नाम नहीं है।

ऐसे में संकेत मिल रहे हैं कि सरकार फिलहाल इस बिल को आगे बढ़ाने से बच सकती है। FCRA में प्रस्तावित बदलावों को लेकर विपक्षी दलों के साथ-साथ कुछ धार्मिक और सामाजिक संगठनों की ओर से भी आपत्तियां जताई गई हैं।

यही वजह है कि सरकार के सामने अब सवाल सिर्फ FCRA बिल पास कराने का नहीं, बल्कि संसद में बड़े संवैधानिक बदलावों के लिए जरूरी संख्या जुटाने का भी है।

DMK के रुख से बढ़ी सरकार की मुश्किल

FCRA को लेकर DMK पहले ही विरोध का रुख अपना चुकी है। पार्टी नेता उदयनिधि स्टालिन परिसीमन के प्रस्ताव को लेकर भी अपनी असहमति जाहिर कर चुके हैं। वहीं पार्टी प्रमुख एमके स्टालिन ने FCRA संशोधन को वापस लेने या इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने की मांग का समर्थन किया है।

यानी सरकार के सामने एक पेचीदा राजनीतिक समीकरण है। जिस DMK को परिसीमन और महिला आरक्षण के मुद्दे पर अपने साथ लाने की जरूरत पड़ सकती है, वही पार्टी FCRA के सख्त प्रावधानों के खिलाफ खड़ी है।

परिसीमन पर DMK को साधने की कोशिश?

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि अगर सरकार राज्यों की लोकसभा सीटों में संभावित बढ़ोतरी और दक्षिणी राज्यों के हितों को लेकर ठोस आश्वासन देती है, तो DMK का रुख कुछ नरम हो सकता है।

रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि अगर राज्यों की सीटों में करीब 50 फीसदी बढ़ोतरी की गारंटी मिलती है, तो DMK परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव पर सरकार का समर्थन करने पर विचार कर सकती है।

हालांकि DMK का पारंपरिक तर्क यही रहा है कि परिसीमन में जनसंख्या को आधार बनाने से उन राज्यों को नुकसान हो सकता है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन किया है।

लोकसभा में NDA का गणित क्या कहता है?

परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण विधेयक के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाना NDA के लिए आसान नहीं है। दिए गए मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक, अगर 540 सांसद मतदान करते हैं, तो दो-तिहाई बहुमत के लिए करीब 360 वोट की जरूरत होगी।

NDA के पास फिलहाल लगभग 319 सांसदों का समर्थन बताया जा रहा है। इसमें कुछ ऐसे सांसद भी शामिल हैं जिन्हें सरकार के पक्ष में मतदान करने की उम्मीद है। YSR कांग्रेस के सांसदों का समर्थन मिलने पर NDA की संख्या और बढ़ सकती है।

अगर DMK के 27 सांसद सरकार के पक्ष में आ जाते हैं, तो NDA का आंकड़ा करीब 346 तक पहुंच सकता है। यानी दो-तिहाई बहुमत के लिए उसे करीब 14 और सांसदों की जरूरत होगी।

दूसरी तरफ अगर DMK मतदान से बाहर रहती है और प्रभावी मतदान घटकर करीब 518 रह जाता है, तो दो-तिहाई का आंकड़ा लगभग 345 होगा। इस स्थिति में भी NDA को करीब 21 अतिरिक्त वोट जुटाने होंगे।

यानी DMK का सिर्फ समर्थन ही नहीं, बल्कि उसका वॉकआउट करना भी सरकार के लिए अहम राजनीतिक गणित पैदा कर सकता है।

राज्यसभा में NDA मजबूत, लेकिन फिर भी चाहिए सहयोग

राज्यसभा में NDA की स्थिति लोकसभा के मुकाबले बेहतर बताई जा रही है। मौजूदा गणित के अनुसार NDA के पास करीब 154 सांसद हैं।

इसके अलावा YSR कांग्रेस के चार सांसदों के समर्थन की उम्मीद है। इस स्थिति में सरकार दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंच सकती है और उसे करीब छह अतिरिक्त वोटों की जरूरत रह सकती है।

यही वजह है कि सरकार के लिए विपक्षी दलों के साथ बातचीत और रणनीतिक समर्थन हासिल करना बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।

NCP (SP) भी बन सकती है गेमचेंजर

परिसीमन और महिला आरक्षण के मुद्दे पर सरकार के सामने सिर्फ DMK ही चुनौती नहीं है। शरद पवार गुट की NCP (SP) भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

सूत्रों के हवाले से सामने आ रही राजनीतिक तस्वीर के मुताबिक, सरकार अगर इन दलों को परिसीमन के संभावित प्रभावों को लेकर भरोसा दिलाने में सफल होती है, तो संसद में दो-तिहाई बहुमत का रास्ता कुछ आसान हो सकता है।

लेकिन समस्या यह है कि FCRA संशोधन को लेकर यही विपक्षी दल सरकार के प्रस्तावों से असहमत हैं।

FCRA बनाम परिसीमन: सरकार के सामने बड़ा सौदा?

मौजूदा घटनाक्रम को अगर एक साथ जोड़कर देखा जाए तो केंद्र की रणनीति साफ नजर आती है—हर मोर्चे पर एक साथ टकराव लेने के बजाय प्राथमिकता तय करना।

परिसीमन और महिला आरक्षण को लेकर सरकार को बड़े राजनीतिक समर्थन की जरूरत है। ऐसे में FCRA जैसे विवादित विधेयक को कुछ समय के लिए रोकना या उसकी गति धीमी करना सरकार के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकता है।

हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार FCRA बिल को सिर्फ इस सत्र के लिए टाल रही है या वास्तव में विपक्ष के साथ सहमति बनाने के लिए इसमें बदलाव पर विचार कर रही है।

चार दिन में साफ होगी तस्वीर

संसद का मॉनसून सत्र अब अंतिम चरण में है। ऐसे में अगले कुछ दिन बेहद अहम रहने वाले हैं। सरकार के सामने एक साथ कई मोर्चे हैं—FCRA, परिसीमन, महिला आरक्षण और विपक्षी दलों का समर्थन।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या NDA विपक्ष के कुछ दलों को साधकर दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा पार कर पाएगा?

अगर DMK और NCP (SP) जैसे दलों के साथ कोई राजनीतिक समझ बनती है, तो संसद का गणित अचानक सरकार के पक्ष में झुक सकता है। लेकिन अगर विपक्ष एकजुट रहा, तो दो-तिहाई बहुमत वाला रास्ता NDA के लिए अब भी बेहद मुश्किल साबित हो सकता है।

फिलहाल FCRA बिल का एजेंडे से बाहर रहना इसी बड़े राजनीतिक गणित की ओर इशारा कर रहा है।

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