August 15 Independence Day: 15 अगस्त की तारीख ही क्यों चुनी गई? जानिए आजादी से जुड़े अनसुने किस्से

August 15 Independence Day: 15 अगस्त 1947 को ही भारत को आजादी क्यों मिली? जानिए माउंटबेटन, गांधी, तिरंगे, विभाजन और गोवा से जुड़े इतिहास के अनसुने किस्से।

Update:2026-08-10 14:08 IST

August 15 Independence Day: Why August 15 Was Chosen for India’s Independence | History

August 15 Independence Day: 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस हर भारतीय के लिए गर्व और भावनाओं से जुड़ा दिन है। इसी दिन 1947 में भारत ने करीब दो सौ साल के ब्रिटिश शासन से आजादी हासिल की थी। हर साल इस मौके पर लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया जाता है और प्रधानमंत्री देश को संबोधित करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आजादी मिलने के दिन महात्मा गांधी दिल्ली में मौजूद नहीं थे? क्या आपको पता है कि 15 अगस्त की तारीख लॉर्ड माउंटबेटन के लिए क्यों खास थी और आज के तिरंगे तक पहुंचने में कितना लंबा सफर तय हुआ? स्वतंत्रता दिवस से जुड़े ऐसे ही कई रोचक किस्से हैं, जो आजादी की कहानी को और खास बनाते हैं।

ब्रिटेन ने भारत को आजादी देने का फैसला क्यों किया?

भारत को आजादी किसी एक घटना की वजह से नहीं मिली थी। इसके पीछे लंबे समय तक चला स्वतंत्रता आंदोलन, भारतीयों का संघर्ष और ब्रिटिश शासन के खिलाफ बढ़ता जनदबाव था। 1940 के दशक में भारत छोड़ो आंदोलन समेत कई आंदोलनों ने ब्रिटिश सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी थीं। दूसरी ओर दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन खुद आर्थिक और राजनीतिक रूप से काफी कमजोर हो चुका था। ऐसे हालात में भारत पर लंबे समय तक शासन बनाए रखना ब्रिटेन के लिए मुश्किल होता जा रहा था। यही वजह थी कि सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ी।

1945 में ब्रिटेन की सरकार बदलने के बाद खुला आजादी का रास्ता

भारत की आजादी की दिशा में एक बड़ा मोड़ 1945 में आया, जब ब्रिटेन में लेबर पार्टी सत्ता में आई और क्लेमेंट एटली प्रधानमंत्री बने। उनकी सरकार भारत को सत्ता सौंपने के पक्ष में थी। फरवरी 1947 में एटली ने घोषणा की कि ब्रिटेन जून 1948 तक भारत में सत्ता हस्तांतरित कर देगा। इसके बाद लॉर्ड लुई माउंटबेटन को भारत का आखिरी वायसराय बनाकर भेजा गया। उनका मुख्य काम भारत में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को पूरा कराना था।

आजादी की तारीख पहले जून 1948 थी, फिर अगस्त 1947 क्यों हुआ?

माउंटबेटन जब भारत पहुंचे, उस समय देश में राजनीतिक और सांप्रदायिक तनाव तेजी से बढ़ रहा था। कई जगहों पर हिंसा की घटनाएं हो रही थीं और हिंदू-मुस्लिम संबंध बेहद तनावपूर्ण हो चुके थे। ऐसे माहौल में माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण को जून 1948 तक टालने के बजाय जल्द पूरा करने का फैसला किया। 3 जून 1947 को माउंटबेटन योजना सामने आई, जिसमें भारत के विभाजन और सत्ता हस्तांतरण की रूपरेखा रखी गई। इसके बाद 15 अगस्त 1947 को सत्ता सौंपने की तारीख तय हुई।

माउंटबेटन के लिए 15 अगस्त क्यों थी खास?

15 अगस्त की तारीख चुनने के पीछे लॉर्ड माउंटबेटन की व्यक्तिगत पसंद की भी चर्चा होती है। दरअसल, 15 अगस्त 1945 को जापान ने मित्र राष्ट्रों के सामने आत्मसमर्पण किया था। उस समय दक्षिण-पूर्व एशिया में मित्र राष्ट्रों की कमान माउंटबेटन के पास थी। इसलिए 15 अगस्त उनके लिए एक ऐतिहासिक और शुभ तारीख मानी जाती थी। भारत के सत्ता हस्तांतरण के लिए इसी तारीख को चुना जाना इसे इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तारीखों में शामिल कर गया।

जब देश आजादी का जश्न मना रहा था, गांधी दिल्ली में नहीं थे

15 अगस्त 1947 का दिन पूरे देश के लिए खुशी का था, लेकिन महात्मा गांधी उस समय दिल्ली में मौजूद नहीं थे। भारत के विभाजन से गांधी बेहद दुखी थे और देश के कई हिस्सों में हो रही सांप्रदायिक हिंसा को लेकर चिंतित थे। वह कलकत्ता में थे और लोगों के बीच शांति कायम करने की कोशिश कर रहे थे। जिस समय दिल्ली में आजादी का समारोह हो रहा था, गांधी हिंसा रोकने और हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच भरोसा कायम करने के प्रयास में जुटे थे। यही वजह है कि स्वतंत्रता दिवस की सबसे बड़ी ऐतिहासिक तस्वीरों में गांधी की गैरमौजूदगी आज भी बेहद भावुक करने वाली बात मानी जाती है।

आजाद भारत की पहली सरकार ने 15 अगस्त को ली शपथ

स्वतंत्र भारत की पहली सरकार के गठन की प्रक्रिया 15 अगस्त 1947 को पूरी हुई। जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। इससे पहले 14 और 15 अगस्त की मध्यरात्रि में संविधान सभा की विशेष बैठक हुई थी, जहां नेहरू ने अपना ऐतिहासिक भाषण दिया। उनके भाषण को ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ यानी ‘नियति से साक्षात्कार’ के नाम से जाना जाता है। यह भाषण भारत की आजादी के इतिहास का सबसे यादगार भाषण माना जाता है।

आजाद भारत की पहली कैबिनेट को लेकर क्या हुआ था?

14 अगस्त 1947 की रात संविधान सभा की ऐतिहासिक बैठक के बाद जवाहरलाल नेहरू ने लॉर्ड माउंटबेटन से मुलाकात की। सत्ता हस्तांतरण के बाद माउंटबेटन को स्वतंत्र भारत का पहला गवर्नर-जनरल बनाए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इसी दौर में भारत की पहली कैबिनेट के गठन को अंतिम रूप दिया गया। नेहरू के नेतृत्व में बनी पहली कैबिनेट में देश के अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों से आने वाले प्रमुख नेताओं को जगह मिली। इसमें सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. बी. आर. आंबेडकर, मौलाना अबुल कलाम आजाद और राजकुमारी अमृत कौर जैसे प्रमुख नाम शामिल थे।

15 अगस्त 1947 को भारत गणराज्य नहीं बना था

आजादी मिलने के बाद भारत तुरंत गणराज्य नहीं बना था। 15 अगस्त 1947 को भारत एक स्वतंत्र डोमिनियन बना और ब्रिटेन के राजा जॉर्ज षष्ठम भारत के संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष थे। भारत में गवर्नर-जनरल ब्रिटिश सम्राट के प्रतिनिधि के तौर पर काम करता था। यह व्यवस्था 26 जनवरी 1950 तक चली। इसी दिन भारत का संविधान लागू हुआ और देश ने खुद को गणराज्य घोषित किया। इसके साथ ही राष्ट्रपति देश के संवैधानिक प्रमुख बने और भारत पूरी तरह अपने संविधान के अनुसार चलने वाला गणराज्य बन गया।

आज के तिरंगे से बहुत अलग था भारत का पहला राष्ट्रीय ध्वज

आज जिस तिरंगे को देखकर हर भारतीय के मन में गर्व की भावना पैदा होती है, उसका इतिहास आजादी से कई दशक पुराना है। 7 अगस्त 1906 को कलकत्ता के पारसी बागान स्क्वायर में एक राष्ट्रीय ध्वज फहराए जाने का उल्लेख मिलता है। उस समय झंडे का स्वरूप आज के तिरंगे से बिल्कुल अलग था। इसमें अलग-अलग रंगों के साथ कमल, सूर्य, चंद्रमा और तारों जैसे प्रतीक बनाए गए थे। इसके बाद कई चरणों में राष्ट्रीय ध्वज का स्वरूप बदलता गया।

पिंगली वेंकैया ने तिरंगे को दिया नया स्वरूप

भारतीय तिरंगे के विकास में पिंगली वेंकैया का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। 1921 में उन्होंने विजयवाड़ा में गांधी के सामने झंडे का एक डिजाइन प्रस्तुत किया था। शुरुआत में इसमें लाल और हरे रंग का इस्तेमाल किया गया था। बाद में झंडे में सफेद रंग जोड़ा गया और चरखे को भी स्थान दिया गया। चरखा उस दौर में स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और भारतीय आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक बन चुका था। समय के साथ इसी डिजाइन में कई बदलाव हुए और आज का तिरंगा अस्तित्व में आया।

22 जुलाई 1947 को तय हुआ आज का तिरंगा

आजादी मिलने से कुछ सप्ताह पहले 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने भारत के राष्ट्रीय ध्वज को स्वीकार किया। इसमें ऊपर केसरिया, बीच में सफेद और नीचे हरे रंग की पट्टी रखी गई। सफेद पट्टी के बीच में चरखे की जगह अशोक चक्र को शामिल किया गया। राष्ट्रीय ध्वज में मौजूद रंगों को किसी विशेष धर्म या समुदाय से नहीं जोड़ा गया। अशोक चक्र धर्म, न्याय और निरंतर गति का प्रतीक माना जाता है। यही तिरंगा आज भारत की पहचान बन चुका है।

आजादी के दिन भारत का अपना राष्ट्रगान नहीं था

15 अगस्त 1947 को ‘जन गण मन’ भारत का आधिकारिक राष्ट्रगान नहीं था। स्वतंत्रता समारोहों में ‘वंदे मातरम्’ का विशेष महत्व था और इसे आजादी के आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय चेतना जगाने वाले गीत के रूप में व्यापक पहचान मिली थी। बाद में 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने ‘जन गण मन’ को भारत का राष्ट्रगान स्वीकार किया। इस तरह आजादी के बाद भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों को आधिकारिक रूप देने की प्रक्रिया भी पूरी हुई।

आजादी के बाद भी गोवा भारत का हिस्सा नहीं बना था

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन देश का हर हिस्सा उसी दिन भारतीय संघ का हिस्सा नहीं बना। गोवा पर उस समय पुर्तगाल का शासन था। पुर्तगाल ने गोवा पर अपना नियंत्रण बनाए रखा और वहां भारतीय स्वतंत्रता के बाद भी विदेशी शासन जारी रहा। लंबे राजनीतिक प्रयासों के बाद दिसंबर 1961 में भारत ने सैन्य कार्रवाई की और पुर्तगाली शासन का अंत हुआ। 19 दिसंबर 1961 को गोवा भारत का हिस्सा बना और इस दिन को आज गोवा मुक्ति दिवस के रूप में याद किया जाता है।

‘इंडिया’ नाम का संबंध सिंधु नदी से माना जाता है

भारत के दो प्रमुख नाम ‘भारत’ और ‘इंडिया’ हैं। ‘इंडिया’ नाम की उत्पत्ति को आमतौर पर सिंधु नदी से जोड़ा जाता है। प्राचीन फारसी और यूनानी संदर्भों में सिंधु नदी के नाम में बदलाव के साथ आगे चलकर ‘इंडिया’ शब्द प्रचलन में आया। वहीं ‘भारत’ नाम की जड़ें भारतीय प्राचीन परंपरा और इतिहास में मिलती हैं। भारतीय संविधान में देश का नाम ‘इंडिया, दैट इज भारत’ लिखा गया है।

विभाजन से पहले ही अखबारों में बनने लगी थी बंटवारे की तस्वीर

1947 में भारत के विभाजन की घोषणा के बाद देश में भविष्य की सीमाओं को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थीं। उस दौर के अखबारों में संभावित विभाजन और अलग-अलग क्षेत्रों की स्थिति को लेकर नक्शे और खबरें प्रकाशित होती थीं। पंजाब और बंगाल के विभाजन का सवाल सबसे जटिल था। आखिरकार भारत और पाकिस्तान की सीमा तय करने की जिम्मेदारी सर सिरिल रेडक्लिफ को दी गई। उनकी अध्यक्षता वाले सीमा आयोग ने पंजाब और बंगाल के विभाजन की सीमाएं तय कीं और इसका आधिकारिक ऐलान स्वतंत्रता के बाद हुआ।

हर साल 15 अगस्त को जब लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा लहराता है, तो उसके साथ भारत की स्वतंत्रता के पीछे लोगों के संघर्ष और त्याग की भी पूरी कड़ी जुड़ जाती है। यह दिन सिर्फ अंग्रेजी शासन से मुक्ति का उत्सव नहीं है, बल्कि उन लाखों लोगों के संघर्ष और बलिदान को याद करने का अवसर भी है, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया।

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