Maharana Sanga Kaun The: मेवाड़ के शेर महाराणा सांगा, भारतीय इतिहास के वो वीर योद्धा, जिन्होंने एक आंख, हाथ और पैर गवाने के बाद भी नहीं छोड़ी युद्ध लड़ने की इच्छा

Mewar Ke Raja Maharana Sanga: महाराणा सांगा (संग्राम सिंह प्रथम) भारतीय इतिहास के उन वीर योद्धाओं में से एक थे, जिनके बलिदान और पराक्रम की गाथाएं सदियों तक प्रेरणा देती रहेंगी। आइए जानें उनके बारे में।;

Written By :  Jyotsna Singh
Update:2025-03-29 12:01 IST

Mewar Ke Raja Maharana Sanga Kaun The (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

Maharana Sanga Ki Kahani: महाराणा सांगा (Maharana Sanga) भारतीय इतिहास में एक ऐसा नाम है जो साहस, बलिदान और संघर्ष का प्रतीक है। खतोली की लड़ाई में उनकी जीत ने दिल्ली सल्तनत की शक्ति को कमजोर किया और राजपूतों को एक नया आत्मविश्वास दिया। उन्होंने अपने पूरे जीवन में हिंदू राज्य की रक्षा के लिए संघर्ष किया और कभी भी हार नहीं मानी। उनके बलिदान और पराक्रम की गाथाएं सदियों तक प्रेरणा देती रहेंगी।

महाराणा सांगा (संग्राम सिंह प्रथम) भारतीय इतिहास के उन वीर योद्धाओं में से एक थे जिन्होंने अपने पराक्रम और रणनीति से विदेशी आक्रमणकारियों और दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों को चुनौती दी। वे न केवल अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध थे, बल्कि अपने सैन्य कौशल, देशभक्ति और राजपूत एकता को संगठित करने के प्रयासों के लिए भी जाने जाते हैं।

इनमें बचपन से ही दिखने लगा था एक कुशल योद्धा

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

महाराणा सांगा का जन्म 12 अप्रैल 1482 को मेवाड़ के सिसोदिया वंश में हुआ था। वे राणा रायमल के पुत्र थे और बचपन से ही शौर्य और युद्ध कौशल के प्रति विशेष रुचि रखते थे। उन्होंने अपनी कम उम्र में ही अपने युद्ध कौशल से लोगों को अचंभित करना शुरू दिया था और युवावस्था आते-आते उन्होंने कई लड़ाइयों में भाग लिया और अपने शौर्य का परिचय दिया।

महाराणा सांगा ने अपना पहला युद्ध लगभग 19 वर्ष की आयु (लगभग 1501 में) लड़ा था। यह युद्ध इडर (गुजरात) के संघर्ष से जुड़ा था, जब गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा के विरुद्ध उन्होंने अपने भाइयों और अन्य राजपूत सरदारों के साथ युद्ध किया था। इस युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता और रणनीतिक कौशल का परिचय दिया, जिससे उन्हें एक महान योद्धा के रूप में पहचान मिली। उनकी वीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में 100 से अधिक युद्ध लड़े और इनमें से अधिकांश में विजय प्राप्त की। वे युद्ध में कई बार घायल हुए और एक आंख, एक हाथ और एक पैर खो बैठे, फिर भी उनका आत्मबल कभी कमजोर नहीं हुआ।

महाराणा सांगा और खतोली का युद्ध (1517)

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

खतोली का ये ऐतिहासिक युद्ध 1517 ईस्वी (Battle of Khatoli 1517) में मेवाड़ के महाराणा सांगा और दिल्ली सल्तनत के शासक इब्राहिम लोदी (Ibrahim Lodi) के बीच हुआ था। इस युद्ध का मुख्य कारण इब्राहिम लोदी की बढ़ती शक्ति और राजस्थान के राज्यों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की महत्वाकांक्षा थी। इस युद्ध में महाराणा सांगा की सेना ने अपनी रणनीति और पराक्रम का परिचय देते हुए इब्राहिम लोदी की विशाल सेना को भारी क्षति पहुंचाई।

युद्ध के दौरान लोदी की सेना ने जबरदस्त आक्रमण किया, लेकिन महाराणा सांगा ने अपनी कुशल रणनीति से दुश्मन को घेर लिया। अंततः इब्राहिम लोदी पराजित हुआ और किसी तरह युद्धभूमि से भागने में सफल रहा।

ये था खतोली युद्ध का परिणाम

इस युद्ध के बाद दिल्ली सल्तनत की शक्ति कमजोर हो गई और महाराणा सांगा की प्रतिष्ठा पूरे उत्तर भारत में बढ़ गई। इस जीत ने राजस्थान और मालवा क्षेत्र में मेवाड़ की स्थिति को और मजबूत कर दिया। यह युद्ध इस बात का प्रतीक बना कि राजपूतों की एकता और संगठन दिल्ली सल्तनत के लिए खतरा बन सकती है। खतोली के युद्ध में उन्होंने इब्राहिम लोदी की सेना को हराया, लेकिन गंभीर रूप से घायल हुए। उन्होंने अपने शरीर पर कई गंभीर घाव झेले – एक हाथ कट गया, एक पैर बेकार हो गया और एक आंख की रोशनी चली गई। फिर भी वे कभी भी युद्धभूमि से पीछे नहीं हटे।

महाराणा सांगा का सैन्य कौशल और विजय अभियान

खतोली की जीत के बाद महाराणा सांगा ने 1519 में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी द्वितीय (Mahmud Khalji II) के खिलाफ युद्ध छेड़ा। इस युद्ध में भी सांगा की विजय हुई और महमूद खिलजी को बंदी बना लिया गया। बाद में, राजपूतों की उदार नीति के चलते उन्होंने महमूद खिलजी को छोड़ दिया, लेकिन मालवा पर राजपूतों का प्रभाव बना रहा।

खतोली और मालवा की जीत के बाद महाराणा सांगा (Rana Sanga) की शक्ति चरम पर थी। वे भारत से विदेशी ताकतों को खत्म करने का सपना देख रहे थे। इसी उद्देश्य से 1526 में पानीपत के प्रथम युद्ध के बाद, जब बाबर ने भारत में अपनी पकड़ मजबूत की, तब महाराणा सांगा ने उसे चुनौती दी। उन्होंने राजपूतों और अफगानों का एक विशाल गठबंधन बनाकर बाबर के खिलाफ खानवा का युद्ध लड़ा।

हालांकि, इस युद्ध में बाबर ने अपनी तोपखाने की ताकत और रणनीतिक कुशलता से महाराणा सांगा को पराजित कर दिया। इस युद्ध में राजपूतों की हार भारतीय इतिहास की एक निर्णायक घटना थी क्योंकि इसके बाद भारत में मुगल साम्राज्य की नींव पड़ गई।

महाराणा सांगा का व्यक्तित्व और उनकी विरासत

महाराणा सांगा न केवल एक वीर योद्धा थे, बल्कि एक कुशल शासक और संगठक भी थे।

उन्होंने राजपूतों को एकजुट करने का प्रयास किया और कई छोटी रियासतों को एक साथ लाकर एक मजबूत सेना बनाई।

वे अपनी वीरता, त्याग और राजधर्म के प्रति निष्ठा के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी वीरगाथाएं आज भी राजस्थान और पूरे भारत में पारंपरिक लोकगीतों में गाई जाती हैं।

अधूरी रह गई एक और युद्ध की अंतिम इच्छा

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

खानवा की लड़ाई में हार के बाद भी महाराणा सांगा ने हार नहीं मानी और वे बाबर के खिलाफ एक और युद्ध की तैयारी कर रहे थे। लेकिन इसी बीच 1528 में वे रहस्यमयी परिस्थितियों में बीमार पड़ गए और उनकी मृत्यु (Rana Sanga Death) हो गई। ऐसा माना जाता है कि उन्हें जहर देकर मार दिया गया था क्योंकि उनके कुछ सामंत नहीं चाहते थे कि वे फिर से युद्ध करें।

महाराणा सांगा भारतीय इतिहास के सबसे बहादुर और पराक्रमी योद्धाओं में से एक थे। उनकी वीरता और साहस ने न केवल राजपूतों को प्रेरित किया बल्कि भारतीय इतिहास (Indian History) में एक अमर गाथा लिखी। उनकी जीवनगाथा विपरीत परिस्थितियों में भी साहस और निष्ठा के साथ लड़ने की प्रेरणा प्रदान करती है।

उनकी वीरता, सैन्य कौशल और देशभक्ति के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। राजस्थान और पूरे भारत में वे एक महान योद्धा और राष्ट्रभक्त के रूप में पूजे जाते हैं।

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