First Female Judge Of SC: सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश से राज्यपाल तक, जानिए एम. फातिमा बीवी का अद्भुत सफ़र

Supreme Court Ki Pahli Mahila Nyayadhish: न्यायमूर्ति एम. फातिमा बीबी 1989 में भारत की सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की पहली महिला न्यायाधीश बनीं और किसी भी उच्च न्यायपालिका में नियुक्त होने वाली पहली मुस्लिम महिला थीं।;

Update:2025-04-05 13:03 IST

First Female Judge Of Supreme Court: एम. फातिमा बीबी(M. Fatima Beevi) भारत की पहली महिला न्यायाधीश थीं, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में पद ग्रहण कर इतिहास रच दिया। उनका जन्म 30 अप्रैल 1927 को हुआ था और वे न्यायिक क्षेत्र में महिलाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत बनीं। वे न केवल सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला न्यायाधीश थीं, बल्कि सेवानिवृत्ति के बाद केरल की राज्यपाल भी रहीं। उनकी न्यायप्रियता, निष्पक्षता और विधि क्षेत्र में योगदान ने भारतीय न्याय प्रणाली में महिलाओं की भागीदारी को नया आयाम दिया। उनका करियर न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्ग प्रशस्त किया। यह लेख उनकी इस प्रेरणादायी यात्रा का विस्तार से वर्णन करता है।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा(Early Life and Education of M. Fatima Beevi)

एम. फातिमा बीबी का जन्म 30 अप्रैल 1927 को तत्कालीन त्रावणकोर साम्राज्य (वर्तमान केरल) के पठानमथिट्टा जिले में हुआ था। उनका पूरा नाम मीरा साहिब फातिमा बीबी था। वह अन्नवीटिल मीर साहिब और खदीजा बीबी की पुत्री थीं। उनका प्रारंभिक जीवन शिक्षा और कानून के प्रति गहरी रुचि के साथ बीता।

फातिमा बीबी की प्रारंभिक शिक्षा टाउन स्कूल और कैथोलिकेट हाई स्कूल, पठानमथिट्टा में हुई। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने तिरुवनंतपुरम के महिला कॉलेज में दाखिला लिया, जहाँ से उन्होंने रसायन विज्ञान (केमिस्ट्री) में स्नातक (बीएससी) की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद, उन्होंने कानून के क्षेत्र में अपना करियर बनाने का निर्णय लिया और सरकारी लॉ कॉलेज, तिरुवनंतपुरम से एलएलबी (बैचलर ऑफ लॉ) की डिग्री हासिल की।

शिक्षा के प्रति उनके समर्पण और कानूनी ज्ञान ने उन्हें आगे चलकर भारतीय न्यायपालिका में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया।

एम. फातिमा बीबी का न्यायिक सफर(M.Fatima Beevi's judicial journey)

एम. फातिमा बीबी को 14 नवंबर 1950 को अधिवक्ता के रूप में नामांकित किया गया। उन्होंने उसी वर्ष बार काउंसिल की परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया, जिससे उनकी उत्कृष्ट कानूनी योग्यता का प्रमाण मिला। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने केरल की निचली न्यायपालिका से की और मई 1958 में उन्हें केरल अधीनस्थ न्यायिक सेवा में मुंसिफ (न्यायिक मजिस्ट्रेट) के रूप में नियुक्त किया गया।

समय के साथ उनकी काबिलियत और अनुभव को देखते हुए, उन्हें 1968 में अधीनस्थ न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया। इसके बाद, 1972 में उन्हें मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और 1974 में जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में पदोन्नति मिली। उनकी न्यायिक सेवाओं को लगातार सराहा गया और उन्होंने विभिन्न महत्वपूर्ण न्यायिक पदों पर कार्य किया।

जनवरी 1980 में एम. फातिमा बीबी को आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण में न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया। इसके बाद, 4 अगस्त 1983 को उन्हें केरल उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया। अपने कार्यकुशलता और न्यायिक निर्णयों में गहरी समझ के चलते, 14 मई 1984 को वह केरल उच्च न्यायालय की स्थायी न्यायाधीश बनीं। उच्च न्यायालय में कई वर्षों की सेवा के बाद, 29 अप्रैल 1989 को वह न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्त हुईं।

भारत की पहली महिला न्यायाधीश(India's first female judge)

उनके अनुभव और प्रतिष्ठा को देखते हुए, 6 अक्टूबर 1989 को उन्हें भारत के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया। इस प्रकार, वह सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनने का गौरव प्राप्त करने वाली भारत की पहली महिला बनीं। न्यायिक क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा और अंततः 29 अप्रैल 1992 को उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से सेवानिवृत्ति ली।

तमिलनाडु के राज्यपाल के रूप में फातिमा बीबी(Fatima Beevi As the Governor of Tamilnadu)

अदालत से सेवानिवृत्ति के बाद, एम. फातिमा बीबी ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य के रूप में सेवाएं दीं और बाद में 1997 से 2001 तक तमिलनाडु की राज्यपाल के रूप में कार्य किया।

25 जनवरी 1997 को एम. फातिमा बीबी को तमिलनाडु की राज्यपाल नियुक्त किया गया। उस समय, भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने उनकी नियुक्ति की सराहना करते हुए कहा कि संविधान और कानूनों की उनकी गहरी समझ देश के लिए एक बहुमूल्य संपत्ति होगी।

राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने राजीव गांधी हत्याकांड के चार दोषियों द्वारा दायर दया याचिकाओं को खारिज कर दिया। इन दोषियों ने संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत क्षमादान की अपील की थी, लेकिन बीबी ने कानून और न्यायिक प्रक्रिया को प्राथमिकता देते हुए इसे अस्वीकार कर दिया।

विवादों से घिरी पूर्व न्यायाधीश और राज्यपाल(Controversies & M. Fatima Beevi)

एम. फातिमा बीबी का कार्यकाल तमिलनाडु की राज्यपाल के रूप में कई विवादों से घिरा रहा। उन्होंने राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर केंद्र सरकार से अलग रुख अपनाया, जिससे तत्कालीन कानून मंत्री अरुण जेटली ने उनका इस्तीफा मांगा। सबसे बड़ा विवाद तब हुआ जब उन्होंने 2001 में विधानसभा चुनावों के बाद जयललिता को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई, जबकि जयललिता कानूनी रूप से चुनाव लड़ने के अयोग्य थीं। इस फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गईं, और अंततः न्यायालय ने उनकी नियुक्ति को असंवैधानिक करार दिया। केंद्र सरकार ने फातिमा बीबी पर अपने संवैधानिक कर्तव्यों का सही ढंग से पालन न करने का आरोप लगाया, जिससे उन्हें राज्यपाल पद से इस्तीफा देना पड़ा। उनके जाने के बाद, आंध्र प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल सी. रंगराजन ने तमिलनाडु के कार्यवाहक राज्यपाल का कार्यभार संभाला।

एक प्रतिष्ठित न्यायविद और प्रशासक(A distinguished jurist and administrator)

एम. फातिमा बीबी ने न केवल न्यायपालिका बल्कि प्रशासनिक क्षेत्र में भी अपनी अहम भूमिका निभाई। तमिलनाडु की राज्यपाल रहते हुए, उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय की कुलाधिपति के रूप में भी कार्य किया। इस दौरान, विश्वविद्यालय में समकालीन तमिल साहित्य के नए विभाग की स्थापना को मंजूरी न दिए जाने के कारण कुलपति पी.टी. मनोहरन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिससे यह मामला चर्चा में आ गया।

इसके अलावा, उन्होंने 1993 में केरल पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के सदस्य के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें 1990 में मानद डी.लिट. (डॉक्टर ऑफ लेटर्स) की उपाधि और महिला शिरोमणि पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें भारत ज्योति पुरस्कार से भी नवाजा गया।

उनके कद और प्रतिष्ठा को देखते हुए, वाम दलों ने उन्हें भारत के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में नामित करने की संभावना पर चर्चा की। हालांकि, एनडीए सरकार ने डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का नाम प्रस्तावित किया, जो अंततः राष्ट्रपति बने।

निधन (Death Of M. Fatima Beevi)

एम. फातिमा बीबी का निधन 23 नवंबर 2023 को, 96 वर्ष की आयु में हुआ। अपने लंबे और प्रतिष्ठित जीवन के दौरान, उन्होंने भारतीय न्यायपालिका और प्रशासन में कई ऐतिहासिक उपलब्धियाँ हासिल कीं। देश की पहली महिला न्यायाधीश के रूप में सर्वोच्च न्यायालय में अपनी सेवाएँ देने से लेकर तमिलनाडु की राज्यपाल बनने तक, उनका योगदान अनुकरणीय रहा। उनके निधन से भारत ने एक प्रख्यात न्यायविद और सशक्त महिला नेतृत्व को खो दिया, जिनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

विरासत और सम्मान(Legacy and Honors)

एम. फातिमा बीबी भारतीय न्यायपालिका में कई ऐतिहासिक उपलब्धियों की प्रतीक थीं। वह भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनीं और किसी भी उच्च न्यायपालिका में नियुक्त होने वाली पहली मुस्लिम महिला थीं। इसके अलावा, वह एशिया में किसी सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश बनने वाली पहली महिला भी थीं। 1993 में, उन्होंने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सदस्य के रूप में अपनी सेवाएँ दीं, जहाँ उन्होंने मानवाधिकार संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी असाधारण सेवाओं और न्यायिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान को मान्यता देते हुए, 2024 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

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