Raebareli Kisan Andolan: रायबरेली किसान आंदोलन, मुंशीगंज गोलीकांड और नेहरू-बाबा रामचंद्र की कहानी

Raebareli Kisan Andolan Ki Kahani: रायबरेली के किसान आंदोलन, 7 जनवरी 1921 के मुंशीगंज गोलीकांड और जवाहरलाल नेहरू-बाबा रामचंद्र की भूमिका की पूरी ऐतिहासिक कहानी जानिए।

Update:2026-08-23 19:31 IST

Raebareli Kisan Andolan History

Kisan Andolan Ki Kahani: भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में रायबरेली की पहचान केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि स्वतंत्र भारत में यह क्षेत्र नेहरू-गांधी परिवार की चुनावी राजनीति से जुड़ा। इस जिले का संबंध जवाहरलाल नेहरू से उससे लगभग तीन दशक पहले स्थापित हो चुका था, जब वे न प्रधानमंत्री थे, न कांग्रेस के सर्वोच्च नेता और न ही भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा। 1920–21 के अवध किसान आंदोलन और विशेष रूप से 7 जनवरी 1921 के मुंशीगंज गोलीकांड ने जवाहरलाल नेहरू को रायबरेली से जोड़ा। यह संबंध इतना महत्वपूर्ण था कि नेहरू स्वयं घटना के प्रत्यक्ष साक्षी बने। किसानों के बीच खड़े हुए। उन्हें अहिंसक रहने के लिए समझाया। अगले दिन घटनास्थल और आसपास के गांवों में गए। घायल किसानों से मिले। अपने पिता मोतीलाल नेहरू को जानकारी दी। कुछ दिन बाद मदन मोहन मालवीय के साथ दोबारा घटनास्थल पहुंचे। घटना पर लेख लिखे और बाद में इससे जुड़े मानहानि मुकदमे में न्यायालय के सामने विस्तृत गवाही दी। उनके अपने बयान और लेख आज भी उपलब्ध हैं। लेकिन इस इतिहास को सही ढंग से समझने के लिए शुरुआत मुंशीगंज से नहीं। बल्कि अवध के उस किसान संकट से करनी होगी जिसने रायबरेली, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, फैजाबाद और आसपास के जिलों में लाखों किसानों को आंदोलित कर दिया था।

अवध में किसान क्यों विद्रोह कर रहे थे?

बीसवीं सदी के आरंभ में अवध का ग्रामीण समाज अत्यंत असमान भूमि-व्यवस्था के नीचे दबा हुआ था। बड़े ताल्लुकेदारों और जमींदारों के नीचे विशाल संख्या में छोटे काश्तकार और खेतिहर मजदूर थे। जमीन जोतने वाले किसानों के अधिकार बहुत कमजोर थे। कई प्रकार के लगान और अवैध अथवा अर्धवैध वसूली प्रचलित थीं। बेदखली, अर्थात किसान को जोत से हटा देना। नजराना, नया पट्टा अथवा अधिकार देते समय ली जाने वाली अतिरिक्त रकम। और बेगार, अर्थात बिना मजदूरी के काम कराना—किसानों की प्रमुख शिकायतों में थे। पुराने अवध किराया कानूनों के बावजूद विशाल संख्या में किसानों को जमीन पर स्थायी सुरक्षा नहीं मिली थी। एक आधुनिक ऐतिहासिक अध्ययन बताता है कि अवध में किसानों के बहुत बड़े हिस्से के पास सुरक्षित स्थायी काश्तकारी अधिकार नहीं थे। इसी कारण दलित, छोटे किसान और खेतिहर श्रमिक भी आंदोलन से गहराई से जुड़े।


प्रथम विश्वयुद्ध के बाद हालात और कठिन हुए। आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़े, ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा और ताल्लुकेदार-किसान संबंध तनावपूर्ण होते गए। आंदोलन केवल लगान कम कराने का संघर्ष नहीं रहा। प्रश्न यह भी था कि क्या जमीन जोतने वाले किसान को मनमाने ढंग से बेदखल किया जा सकता है, क्या उससे बिना मजदूरी काम कराया जा सकता है और क्या ताल्लुकेदार अपने अधिकार का उपयोग लगभग निरंकुश ढंग से कर सकता है।इसी सामाजिक विस्फोट से बाबा रामचंद्र का उदय हुआ।

बाबा रामचंद्र : आंदोलन के वास्तविक प्रारंभिक जननेता

यह तथ्य स्पष्ट रखना आवश्यक है कि अवध किसान आंदोलन जवाहरलाल नेहरू ने शुरू नहीं किया था। उसके प्रमुख प्रारंभिक जननेता बाबा रामचंद्र थे। उनका मूल नाम रामचंद्र शर्मा था। वे कुछ समय फिजी में गिरमिटिया मजदूर के रूप में रह चुके थे और भारत लौटने के बाद साधु के रूप में अवध के गांवों में घूमते रहे। धीरे-धीरे वे किसानों के बीच संगठनकर्ता बन गए। नेहरू के संकलित लेखन के संपादकीय विवरण में भी बाबा रामचंद्र को प्रथम विश्वयुद्ध के बाद उत्तर प्रदेश के किसान आंदोलन का नेता बताया गया है, जिसने प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और जौनपुर में किसानों को संगठित किया और बाद में जवाहरलाल नेहरू तथा पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे कांग्रेस नेताओं का समर्थन प्राप्त किया।


बाबा रामचंद्र की विशेषता यह थी कि वे किसानों की भाषा और धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों का प्रयोग करते थे। उनके आंदोलन में रामायण और ‘सीताराम’ जैसे अभिवादन का भी संगठनात्मक उपयोग हुआ। लेकिन आंदोलन की वास्तविक मांगें ठोस आर्थिक-सामाजिक थीं। जिनमें अत्यधिक लगान का विरोध, अवैध वसूली का अंत, बेगार बंद करना, बेदखली रोकना और ताल्लुकेदारों की मनमानी पर अंकुश लगाना शामिल थीं।

इतिहासकार मजिद हयात सिद्दीकी के अध्ययन में नेहरू के उस आकलन का उल्लेख मिलता है जिसमें उन्होंने बाबा रामचंद्र की असाधारण संगठन क्षमता को स्वीकार किया था। किसान समाज में उनका प्रभाव इतना बढ़ गया कि वे एक लोकनायक बन गए।

जून 1920 : किसान स्वयं नेहरू को अपने बीच लेकर आए

यह प्रसंग जवाहरलाल नेहरू की राजनीतिक यात्रा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जून, 1920 में बाबा रामचंद्र कुछ सौ किसानों को लेकर इलाहाबाद पहुंचे। उन्होंने गौरीशंकर मिश्र और जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की। उनसे कहा कि वे शहर में बैठकर किसानों की समस्या न समझें, बल्कि स्वयं गांवों में चलकर उनकी स्थिति देखें।

नेहरू गए। जून से अगस्त, 1920 के बीच उन्होंने अवध के ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक दौरे किए और किसान आंदोलन से उनका सीधा संपर्क बढ़ा। आधुनिक इतिहासकारों ने इसी दौर को वह समय माना है, जब नेहरू ने वास्तविक अर्थों में भारतीय किसान समाज को निकट से जाना।

इस बिंदु का महत्व बहुत बड़ा है। जवाहरलाल नेहरू कैम्ब्रिज और इनर टेंपल से शिक्षित, समृद्ध इलाहाबादी परिवार के युवक थे। ग्रामीण भारत उनके सामाजिक जीवन का स्वाभाविक परिवेश नहीं था। अवध के गांवों ने उन्हें उस भारत से परिचित कराया जो गरीबी, लगान, बेदखली और सामाजिक असमानता से जूझ रहा था।


किसानों को केवल नेहरू ने राजनीति नहीं सिखाई; किसानों ने नेहरू को भी भारत सिखाया।

बाद में स्वयं नेहरू के लेखन में यह परिवर्तन दिखाई देता है। जनवरी 1921 में उन्होंने लिखा कि किसानों के बीच रहने और उनके साथ काम करने ने अहिंसा को लेकर उनकी अपनी सोच बदली। उन्होंने स्वीकार किया कि जिन ग्रामीण किसानों को सभ्य शहरी वर्ग पिछड़ा समझता था, उन्हीं में उन्होंने साहस और आत्मसंयम देखा।

किसान सभा से अवध किसान सभा तक

यहां किसान संगठनों के नाम और स्थापना को लेकर अक्सर भ्रम हो जाता है। उत्तर प्रदेश में किसान सभा की गतिविधियां पहले से थीं। लेकिन असहयोग आंदोलन के दौर में एक अधिक उग्र और गांव-केंद्रित संगठनात्मक ढांचा सामने आया। ऐतिहासिक अध्ययन के अनुसार 17 अक्टूबर, 1920 को प्रतापगढ़ में अवध किसान सभा की स्थापना हुई। इसमें गौरीशंकर मिश्र, जवाहरलाल नेहरू, बाबा रामचंद्र, माता बदल पांडे, देव नारायण पांडे और केदारनाथ जैसे लोग जुड़े। अक्टूबर के अंत तक इसके प्रभाव में 330 से अधिक स्थानीय किसान सभाएं आ चुकी थीं। संगठन ने किसानों से बेदखल जमीन न जोतने, बेगार न करने, शोषणकारी प्रथाओं का सामाजिक बहिष्कार करने और विवादों को पंचायतों से हल कराने का आह्वान किया। दिसंबर 1920 में अयोध्या में विशाल किसान सम्मेलन हुआ, जिसकी संख्या लगभग एक लाख बताई गई है।

दूसरी तरफ रायबरेली जिला प्रशासन अपने स्थानीय इतिहास में दर्ज करता है कि 5 नवंबर, 1920 को ऊंचाहार क्षेत्र के रसूलपुर और अतरवा गांवों में किसान सभा गठित हुई। इसे व्यापक अवध किसान सभा की रायबरेली शाखाओं अथवा स्थानीय संगठनात्मक विस्तार के संदर्भ में समझना चाहिए, न कि यह मानना चाहिए कि पूरे अवध किसान आंदोलन की शुरुआत पहली बार इसी दिन हुई थी।यह भेद महत्वपूर्ण है क्योंकि रायबरेली का आंदोलन पहले से उठ रही अवध की व्यापक किसान लहर का हिस्सा था।

असहयोग आंदोलन और किसान आंदोलन का मिलन

इसी समय महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन पूरे देश में फैल रहा था। सितंबर, 1920 के कलकत्ता विशेष अधिवेशन और दिसंबर, 1920 के नागपुर अधिवेशन के बाद कांग्रेस ने असहयोग को व्यापक कार्यक्रम बना दिया। विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार, सरकारी शिक्षण संस्थाओं तथा अदालतों से दूरी और औपनिवेशिक शासन से असहयोग के साथ राष्ट्रीय आंदोलन गांवों की ओर बढ़ने लगा। अवध में एक दिलचस्प प्रक्रिया हुई। राष्ट्रीय कांग्रेस का राजनीतिक असहयोग और किसानों का स्थानीय आर्थिक-सामाजिक असंतोष आपस में मिलने लगे। लेकिन दोनों पूरी तरह एक जैसे नहीं थे।कांग्रेस का केंद्रीय लक्ष्य ब्रिटिश शासन था। किसान का तत्काल शत्रु कई बार उसका ताल्लुकेदार, जमींदार या महाजन था। यही अंतर्विरोध आगे चलकर कांग्रेस और किसान आंदोलन के बीच तनाव का कारण भी बना। कांग्रेस किसान असंतोष को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ना चाहती थी। किंतु हिंसा, लूट अथवा जमींदारों पर सीधे हमले से स्वयं को अलग रखना चाहती थी।

रायबरेली में विस्फोट

1920 के अंतिम महीनों में आंदोलन प्रतापगढ़ से रायबरेली और दूसरे जिलों में तेजी से फैल गया। रायबरेली जिला प्रशासन के अनुसार यहां स्थानीय किसान आंदोलन में अमोल शर्मा और बाबा जानकीदास प्रमुख कार्यकर्ता बने। प्रशासन ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद किसानों में यह अफवाह फैल गई कि उन्हें मार दिया गया है। इससे ग्रामीण क्षेत्र में भारी उत्तेजना पैदा हुई।


रायबरेली की स्थिति इसलिए भी संवेदनशील थी क्योंकि किसान प्रश्न केवल भूमि तक सीमित नहीं रहा था। महंगाई और बाजार भाव भी मुद्दे बन चुके थे। ऐतिहासिक अध्ययनों के अनुसार 6 जनवरी, 1921 को फुरसतगंज बाजार में बड़ी संख्या में किसान अनाज और कपड़े की ऊंची कीमतों, व्यापारियों के मुनाफे तथा ताल्लुकेदारों की ज्यादतियों के विरुद्ध जमा हुए। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने का प्रयास किया और गोली चली। छह लोगों की मृत्यु हुई। इसलिए 7 जनवरी का मुंशीगंज गोलीकांड अचानक पैदा हुई घटना नहीं था।उससे ठीक एक दिन पहले खून बह चुका था।

6 जनवरी, 1921 : फुरसतगंज

नेहरू 7 जनवरी को रायबरेली पहुंचे तो उन्हें सबसे पहले बताया गया कि एक दिन पहले फुरसतगंज में गोली चली थी। यह जानकारी हमें किसी बाद की कथा से नहीं। बल्कि स्वयं नेहरू के 6 जुलाई, 1921 के न्यायालयीन बयान से मिलती है। उन्होंने कहा कि रायबरेली स्टेशन से उन्हें डॉ. अवंतिका प्रसाद के घर ले जाया गया और वहीं उन्हें पिछले दिन की फुरसतगंज गोलीबारी तथा मुंशीगंज में किसानों की बड़ी भीड़ जमा होने की सूचना मिली। यही वह क्षण था जब नेहरू ने मुंशीगंज जाने का निर्णय किया।

जवाहरलाल नेहरू रायबरेली क्यों आए?

यह भी तथ्यात्मक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए कि नेहरू वहां पहले से आंदोलन चलाने नहीं बैठे थे। वे नागपुर कांग्रेस से 5 जनवरी, 1921 को इलाहाबाद लौटे थे। रायबरेली से कुछ किसान उनसे मिलने आए। उन्हें साथ चलने के लिए कहा लेकिन उस समय वे नहीं गए। अगले दिन, 6 जनवरी को, पंडित मार्तंड दत्त वैद्य का तार उन्हें मिला। उसमें बताया गया कि स्थिति गंभीर है।उन्हें तुरंत रायबरेली आना चाहिए।


नेहरू ने आने की सूचना तार से भेजी और 7 जनवरी, 1921 को रेल से रायबरेली पहुंचे।इससे उनकी भूमिका बिल्कुल साफ हो जाती है। उन्होंने मुंशीगंज का प्रदर्शन आयोजित नहीं किया था। वे संकट को शांत कराने के उद्देश्य से बुलाए गए राष्ट्रीय नेता के रूप में पहुंचे थे।

7 जनवरी 1921 : रायबरेली स्टेशन से मुंशीगंज तक

रायबरेली स्टेशन पर लगभग तीन दर्जन लोग नेहरू को लेने पहुंचे। उन्हें पहले डॉ. अवंतिका प्रसाद के निवास पर ले जाया गया। वहां परिस्थिति समझने के बाद नेहरू ने स्वयं सुझाव दिया कि वे मुंशीगंज चलें। घर से निकलते समय लगभग सौ-दो सौ लोगों की भीड़ उनकी गाड़ी के आसपास जमा हो गई। नेहरू खड़े हुए और लोगों से शांत और अहिंसक रहने, हथियारबंद शक्ति से न डरने और व्यवस्था बनाए रखने को कहा।उनका मूल उद्देश्य मुंशीगंज जाकर सभा करना और किसानों को समझाकर वापस भेजना था। अपने शपथ-बयान में उन्होंने यह बात स्पष्ट रूप से कही। रास्ते में जेल के पास किसानों के कई समूह दिखाई दिए। कुछ लोग नेहरू के पीछे चलने लगे। संतरी ने उन्हें रोका तो नेहरू ने किसानों को पुलिस का आदेश मानने और दूसरे रास्ते से जाने को कहा। इस विवरण से एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है—नेहरू किसानों को प्रशासन पर हमला करने के लिए नहीं उकसा रहे थे।वे लगातार उन्हें संयमित कर रहे थे।

जिलाधिकारी ने नेहरू को रायबरेली छोड़ने को कहा

मुंशीगंज की ओर जाते समय नेहरू को जिलाधिकारी की ओर से एक छोटा-सा नोट मिला। उसमें उनसे अगली ट्रेन से रायबरेली छोड़ देने के लिए कहा गया था। नेहरू ने उसी कागज की पीठ पर उत्तर लिखा। उनका आशय था कि यदि यह औपचारिक कानूनी आदेश है तो वे उसका पालन करने पर विचार करेंगे। लेकिन यदि यह केवल अनुरोध है तो वे रायबरेली छोड़कर नहीं जाएंगे। उन्होंने जिलाधिकारी से स्पष्ट करने को कहा कि यह आदेश है या अनुरोध।और वे मुंशीगंज की ओर आगे बढ़ गए। यह छोटा-सा प्रसंग नेहरू की उस समय की राजनीति को दर्शाता है। वे अराजक टकराव नहीं चाहते थे।लेकिन प्रशासनिक दबाव में क्षेत्र छोड़ने को भी तैयार नहीं थे।

सई नदी और मुंशीगंज पुल

मुंशीगंज में सई नदी का पुल उस दिन इतिहास का केंद्र बन गया। नेहरू के अपने बयान के अनुसार वे पुल से लगभग 150 गज दूर थे जब कुछ लोग दौड़ते हुए आए और बताया कि पुल के दूसरी ओर गोली चल रही है। नेहरू गाड़ी से उतरे और पैदल आगे बढ़े। पुल के सिरे पर संतरी ने उन्हें रोक दिया। एक यूरोपीय अधिकारी ने कहा कि वे किसी को भी दूसरी तरफ जाने की अनुमति नहीं दे सकते क्योंकि वहां गोलीबारी हो रही है। अर्थात नेहरू वास्तविक गोली चलने वाले स्थान के दूसरी तरफ नहीं पहुंच सके।

वे पुल की रायबरेली वाली ओर थे।गोलीबारी दूसरी ओर हो रही थी। लेकिन वे गोली की आवाज सुन रहे थे और सामने हजारों किसान एकत्र हो रहे थे।

मुंशीगंज में कितने किसान थे?

नेहरू ने अपने जुलाई,1921 के न्यायालयीन बयान में बताया कि उनके आसपास लगभग 2,000 किसान इकट्ठे हो गए थे। लेकिन नदी के दूसरी ओर तथा पूरे क्षेत्र में उपस्थित किसान संख्या इससे कहीं अधिक बताई गई है। एक शोध में मुंशीगंज पुल पर एकत्र भीड़ का अनुमान लगभग 10,000 तक दिया गया है। स्वयं नेहरू ने अपने जनवरी 1921 के लेख में ‘हजारों किसानों’ के वहां उपस्थित होने का वर्णन किया।


इसलिए निश्चित संख्या बताना संभव नहीं। लेकिन इतना निर्विवाद है कि वह एक बहुत बड़ा ग्रामीण जमावड़ा था।

गोली किसने चलाई?

यह मुंशीगंज इतिहास का सबसे विवादास्पद प्रश्न है। रायबरेली जिला प्रशासन के आधिकारिक इतिहास के अनुसार अंग्रेज शासन के समर्थक ताल्लुकेदार सरदार वीरपाल सिंह ने सबसे पहले बदलू बेड़िया नामक व्यक्ति पर तीन गोलियां चलाईं। गोली की आवाज सुनकर घुड़सवार बल ने इसे फायरिंग का आदेश समझ लिया और किसानों पर गोली चला दी। नेहरू स्वयं प्रारंभिक गोली चलते हुए नहीं देख सके थे।

लेकिन घटना के बाद उन्हें अनेक प्रत्यक्षदर्शियों और घायलों ने बताया कि वीरपाल सिंह ने पहली गोली चलाई थी। 8 जनवरी को गांवों में मिले घायल किसानों ने, और 9 जनवरी को अस्पताल में मिले घायलों ने भी यही आरोप दोहराया। नेहरू ने बाद में न्यायालय में स्वीकार किया कि उन्होंने स्वयं पहली गोली चलते नहीं देखी थी और उन्होंने उस समय बयान देने वालों के नाम-पते तथा कथन विधिवत लिखकर सुरक्षित भी नहीं किए थे। इसलिए प्रत्यक्ष इतिहासकार की तरह हमें दोनों तथ्यों को साथ रखना चाहिए।

अर्थात वीरपाल सिंह द्वारा पहली गोली चलाए जाने का आरोप अत्यंत मजबूत समकालीन साक्ष्य और स्थानीय आधिकारिक इतिहास में मौजूद है। लेकिन जवाहरलाल नेहरू स्वयं उसके चश्मदीद नहीं थे। नेहरू के Selected Works के संपादकीय नोट में भी वीरपाल सिंह को रायबरेली का ताल्लुकेदार बताया गया है। जिसके बारे में आम विश्वास था कि उसने पहली गोली चलाई थी। जिसे बाद में संयुक्त प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर ने विशेष बधाई दी।

गोलीबारी के समय नेहरू के सामने एक दूसरी भीड़

जब पुल पार करना संभव नहीं हुआ, नेहरू सड़क के किनारे एक खुली जगह पर चले गए। उनके आसपास लगभग दो हजार किसान जमा हो गए।स्थिति अत्यंत विस्फोटक थी।दूसरी ओर किसानों पर गोली चल रही थी। आवाज यहां तक आ रही थी।अपने लोगों की मौत की खबर सामने थी।हथियारबंद पुलिस और सैन्य बल मौजूद था।एक छोटी-सी उत्तेजना हजारों लोगों को हिंसा में धकेल सकती थी। यहीं जवाहरलाल नेहरू की तत्काल भूमिका ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है।


उन्होंने लगभग बीस मिनट किसानों को संबोधित किया और लगातार अहिंसा, साहस तथा संयम पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह परीक्षा की घड़ी है। उन्हें स्वयं पर नियंत्रण रखना चाहिए। उन्होंने उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखने को कहा। लेकिन हिंसा का रास्ता न अपनाने की अपील की। फिर वे जिलाधिकारी से मिले। इसके बाद दोबारा किसानों के पास गए और लगभग चार-पांच मिनट उन्हें घर लौटने के लिए समझाया।किसान लौटने लगे। नेहरू के बयान के अनुसार स्वयं जिलाधिकारी ने उनसे कहा कि उनके संक्षिप्त संबोधन का किसानों पर अच्छा प्रभाव पड़ा है।

नेहरू स्वयं हिंसा के कितने करीब पहुंच गए थे?

इस घटना के संबंध में नेहरू का एक अत्यंत आत्मस्वीकारात्मक विवरण है।22 जनवरी,1921 को लिखे अपने लेख ‘The Rai Bareli Tragedy’ में उन्होंने लिखा कि नदी के उस पार अपने लोगों पर गोली चलते देखकर क्षण भर के लिए उनका अपना खून खौल उठा और अहिंसा उनके मन से लगभग निकल गई थी। लेकिन गांधी की याद आई और फिर उन्होंने अपने सामने शांत बैठे किसानों को देखा।नेहरू ने स्वीकार किया कि जिन किसानों को वे अहिंसा समझाने आए थे, उसी क्षण शायद उन्हीं किसानों ने उन्हें अहिंसा का बड़ा पाठ पढ़ाया।उन्होंने लिखा कि किसानों ने उनकी बात मानी और शांतिपूर्वक चले गए। यह प्रसंग नेहरू के वैचारिक विकास को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।मुंशीगंज केवल एक गोलीकांड नहीं था।वह नेहरू की अपनी राजनीतिक चेतना की भी परीक्षा थी।

‘दूसरा जलियांवाला बाग’ था मुंशीगंज

समकालीन राष्ट्रवादी पत्रकारिता में मुंशीगंज की तुलना जलियांवाला बाग से की गई। रायबरेली जिला प्रशासन भी उल्लेख करता है कि गणेश शंकर विद्यार्थी के समाचारपत्र प्रताप ने घटना को बड़े नरसंहार की तरह प्रकाशित किया और इसे जलियांवाला बाग जैसी घटना कहा। जवाहरलाल नेहरू ने भी अपने लेख की शुरुआत 1919 के अमृतसर नरसंहार को याद करते हुए की। उनके लिए मुंशीगंज में किसानों पर गोली चलना ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के उसी दमनकारी चरित्र का दूसरा उदाहरण था। हालाँकि रायबरेली का जलियांवाला बाग एक शक्तिशाली समकालीन राजनीतिक उपमा है। न कि दोनों घटनाओं की मृत्यु-संख्या समान होने का प्रमाण।

कितने किसान मारे गए?

इस प्रश्न का सरल और निश्चित उत्तर देना ऐतिहासिक रूप से संभव नहीं है।नेहरू के Selected Works में संपादकीय टिप्पणी फुरसतगंज और मुंशीगंज में 6 और 7 जनवरी की दोनों गोलीबारियों को मिलाकर 13 किसान मारे जाने का उल्लेख करती है। एक अकादमिक अध्ययन मुंशीगंज में लगभग 10 से 14 मृत्यु का अनुमान देता है। रायबरेली जिला प्रशासन कहता है कि सरकारी अभिलेखों में संख्या बहुत कम दर्ज की गई, जबकि प्रत्यक्षदर्शी और प्रताप के गणेश शंकर विद्यार्थी ने मृतकों की संख्या सैकड़ों बताई...आगे की खबर पढ़ने के लिए Next Page पर क्लिक करें 

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