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गूगल पर खूब सर्च किये जा रहे मैथमेटिक्स गुरु आरके श्रीवास्तव, जानिए क्यों

मैथमेटिक्स गुरु फेम आरके श्रीवास्तव ने क्लासरूम प्रोग्राम में बिना रुके पाइथागोरस थ्योरम को 50 से ज्यादा अलग-अलग तरीकों से सिद्ध कर इतिहास रचा है

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NewstrackBy Newstrack

Published on 20 July 2020 3:15 AM GMT

गूगल पर खूब सर्च किये जा रहे मैथमेटिक्स गुरु आरके श्रीवास्तव, जानिए क्यों
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लखनऊ: मैथमेटिक्स गुरु फेम आरके श्रीवास्तव ने क्लासरूम प्रोग्राम में बिना रुके पाइथागोरस थ्योरम को 50 से ज्यादा अलग-अलग तरीकों से सिद्ध कर इतिहास रचा है। इसके लिए इनका नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकार्ड्स लंदन में भी दर्ज हो चुका है।

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सैकड़ों असहाय गरीब स्टूडेंट्स को इंजीनियर बनाकर उनके सपने को पंख लगाने वाले मैथमेटिक्स गुरु फेम आरके श्रीवास्तव ने क्लासरूम प्रोग्राम में बिना रुके पाइथागोरस थ्योरम को 50 से ज्यादा अलग-अलग तरीकों से सिद्ध कर इतिहास रचा। इसके लिए इनका नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकार्ड्स लंदन में भी दर्ज हो चुका है। बिहार के रोहतास जिले के छोटे से गांव बिक्रमगंज के रहने वाले आरके श्रीवास्तव है हजारो स्टूडेंट्स के रोल मॉडल।

अभी तक कि सबसे बड़ी Weird number को खोजने का कर चुके हैं दावा

200 से ज्यादा अंको के weird number को खोजने का किया दावा, यदि इस संख्या पद्धति के अंक सही पाए गए तो जल्द ही आरके श्रीवास्तव का नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी दर्ज हो जाएगा। आरके श्रीवास्तव अपने शैक्षणिक कार्यशैली के लिए हमेशा सुर्खियों में रहते है, चाहे वह वंडर किड्स प्रोग्राम हो या स्टूडेंट्स को अग्नि के सामने शपथ दिलाकर सेल्फ स्टडी के लिए प्रेरित करना हो या इनके द्वारा चलाया जा रहा नाईट क्लासेज अभियान।

450 क्लास से अधिक बार आरके श्रीवास्तव ने पूरे रात लगातार 12 घण्टे जगकर स्टूडेंट्स को निःशुल्क शिक्षा दे चुके हैं। इसके लिए इनका नाम इंडिया बुक रिकार्ड्स और एशिया बुक ऑफ रिकार्ड्स में भी दर्ज हो चुका है।

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सिर्फ 1 रुपया गुरु दक्षिणा

निःशुल्क शिक्षा के अलावा प्रत्येक वर्ष अपनी माँ के हाथों से 50 गरीब स्टूडेंट्स को निःशुल्क किताबें भी बंटवाते हैं। गरीब परिवार में जन्मे आरके श्रीवास्तव का जीवन काफी संघर्षो से गुजरा। आरके श्रीवास्तव के द्वारा ” आर्थिक रूप से गरीबों की नही रुकेगी पढ़ाई” अभियान भी चलाया जाता है। इस अभियान के तहत स्टूडेंट्स से सिर्फ 1 रुपया गुरु दक्षिणा लेकर उसे शिक्षा दिया जाता है। प्रत्येक वर्ष सिर्फ 1 रुपया बढ़ता है गुरु दक्षिणा।

इस अभियान के तहत सैकड़ों गरीब स्टूडेंट्स आईआईटी, एनआईटी, बीसीईसीई सहित देश के अनेकों प्रतिष्टित संस्थाओ में पहुँचकर अपने सपने को लगा रहे पंख। बिहार सहित देश को गौरव दिलाने वाले आरके श्रीवास्तव के बारे लोग गूगल पर इन दिनों खूब सर्च कर रहे।

अपनी शैक्षणिक कार्यशैली और परिश्रम से पहचान बनाने वाले मैथमेटिक्स गुरु फेम आरके श्रीवास्तव गूगल सर्च में अंग्रेजी में Rk srivastava ( Rk srivastava Mathematics Guru एवं Rk shrivastava Mathematician, Rk Shrivastava , Rk Shrivastava pythagoras, Rk Shrivastava bihar के अलावा हिंदी में भी आरके श्रीवास्तव ) ट्रेंड करने लगा है। बिहार सहित देश- विदेश के लोग उनके बारे में जानने और उनके शैक्षणिक कार्यशैली को समझने को लेकर अच्‍छे-खासे सर्च कर रहे हैं। गूगल ट्रेंड्स के अनुसार आरके श्रीवास्तव से जुड़ा सबसे ज्‍यादा सर्च किया जाने वाला विषय अंग्रेजी में आरके श्रीवास्तव मैथमेटिक्स गुरु, आरके श्रीवास्तव मथेमैटिशन, आरके श्रीवास्तव पाईथागोरस और आरके श्रीवास्तव बिहार है। इनके शैक्षणिक कार्यशैली को जानने की लोगो मे जिज्ञाषा दिखा।

बिहार के एक छोटे से गांव के शिक्षक की शैक्षणिक कार्यशैली और उपलब्धियों को जानने की देश- विदेश के लोगो की जिज्ञाषा यह साबित करता है कि ” जीतने वाले छोड़ते नहीं, छोड़ने वाले जीतते नहीं”।

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कचरे से खिलौने बनाकर 1000 से ज्यादा स्टूडेंट्स को गणित सिखाने वाला बिहारी जीनियस

हर बच्चे का खिलौनों से प्यार होना आम बात है। खिलौने बच्चों की आंखों में चमक भर देते हैं, ऐसे में, हर माता पिता कोशिश करते हैं कि वे अच्छे से अच्छा खिलौना लाकर अपने बच्चे के बचपन में रंग भर सकें। हालांकि, आज भी ग्रामीण इलाकों में सभी परिवार अपने बच्चों के लिए खिलौने खरीदने में असमर्थ हैं।

लेकिन, बिहार के आर के श्रीवास्तव नाम के एक शख्स ने बच्चों की जिंदगी में पैसों की वजह से किसी खुशी की कमी न रह जाए, के लिए काम किया। साथ ही, आर के श्रीवास्तव ने खिलौने के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को गणित पढ़ाने का एक मजेदार तरीका सोचा।

इसके लिए उन्होंने सस्ती सामग्री से नए खिलौने बनाने के तरीके खोजे और विकसित किए। बिहार के रोहतास जिला के बिक्रमगंज मे जन्मे, आरके श्रीवास्तव ने बचपन मे पिता के गुजरने के बाद गरीबी के कारण पैसो के अभाव मे अपनी पढाई वीर कुवँर सिंह विश्वविद्यालय से किया। प्रारंभिक, माध्यमिक और हाईस्कूल की भी पढाई पैसो के अभाव के चलते सरकारी विधालय से किया। उन्हें अपने शिक्षा के दौरान यह एहसास हो गया था कि देश मे वैसे लाखो- करोड़ों प्रतिभायें होंगी जो महंगी शिक्षा, महंगी किताबें इत्यादि के कारण अपने सपने को पूरा नही कर पा रहें।

टीबी की बिमारी के कारण नहीं दे पाये थे आईआईटी प्रवेश परीक्षा

टीबी की बिमारी के कारण आईआईटीयन न बनने की टिस ने बना दिया सैकङो गरीब स्टूडेंट्स को इंजीनियर। टीबी की बिमारी के दौरान स्थानीय डाॅक्टर ने करीब 9 महीने दवा खाने का सलाह दी थी। उसी दौरान इन 9 महीने मे अकेले घर मे बैठे बैठे बोर होने लगे। फिर उनके दिमाग मे आईडिया आया क्यों न आसपास के स्टूडेंट्स को बुलाकर गणित का गुर सिखाया जाये।

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इन खिलौनों के साथ उन्होंने स्कूलों में सेमिनार करके भी बच्चों को गणित के मूल सिद्धांतों को पढ़ाया, उन्होंने मजेदार तरीके से बच्चों को इन खिलौने के जरिए पढ़ाया। ये खिलौने को आकर्षित करते हैं और वह पढ़ने में अपनी रुचि दिखाते हैं।

माचिस की तीलियों और साइकल वाल्व ट्यूब के छोटे-छोटे टुकड़ों से लेकर बेकार कागज का इस्तेमाल करते हैं। इनसे वह सुंदर खिलौने बनाने समेत बच्चों के बीच ‘बेस्ट आउट ऑफ़ वेस्ट’ का आईडिया भी डाल रहे हैं। गणित के ज्यमिती, क्षेत्रमिती, बीजगणित, त्रिकोणमिती सहित अनेकों गणित के कठिन से कठिन प्रश्नों को हल कर देते हैं। इसका मुख्य कारण है खिलौने के सहारे थ्योरी को क्लियर कर चुटकियों मे छात्र-छात्राएँ प्रश्न को हल कर दे रहें।

उन्होंने छोटे ग्रामीण गांव के स्कूलों से लेकर देश के विभिन्न राज्यों के शैक्षणिक संस्थानों तक के 1000 से अधिक बच्चों को खिलौने बनाकर गणित के प्रश्नों को हल करना सिखाया है।

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