आंध्र विधान परिषद के खात्मे पर अब संसद की मुहर बाकी

आंध्र प्रदेश की जगन मोहन रेड्डी सरकार ने राज्य विधान परिषद को समाप्त करने का फैसला किया है। जगन कैबिनेट द्वारा विधान परिषद को समाप्त करने के फैसले के बाद राज्य विधानसभा ने भी इस बारे में प्रस्ताव पास कर दिया है।

विशाखापत्तनम: आंध्र प्रदेश की जगन मोहन रेड्डी सरकार ने राज्य विधान परिषद को समाप्त करने का फैसला किया है। जगन कैबिनेट द्वारा विधान परिषद को समाप्त करने के फैसले के बाद राज्य विधानसभा ने भी इस बारे में प्रस्ताव पास कर दिया है। तेलंगाना के साथ-साथ सिर्फ महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में विधान परिषद है। अब जगन रेड्डी के इस पैसले के बाद तेलंगाना में भी ये समाप्त हो जाएगी।

आंध्र प्रदेश में 1985 में टीडीपी संस्थापक चंद्रबाबू नायडू के शासन में विधान परिषद को समाप्त कर दिया गया था। 2007 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वाई.एस. राजशेखर रेड्डी के शासन में यह व्यवस्था फिर लागू कर दी गई।

सभी राज्यों के लिए विधानसभा का होना तो अनिवार्य होता है लेकिन विधान परिषद की स्थापना का फैसला विधानसभा पर ही छोड़ दिया गया है। विधान परिषद खत्म करने का फैसला करने के लिए विधानसभा में कम से कम दो-तिहाई बहुमत का वोट होना जरूरी है। दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास होने के बाद इस सिफारिश को केंद्र के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। इसके बाद राज्य विधान परिषद को समाप्त करने के लिए भारत की संसद द्वारा मतदान किया जाता है।

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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 169 के तहत संसद को अधिकार मिला है कि वह किसी राज्य की विधान परिषद को समाप्त करने का अधिनियम पारित कर सकती है।

आंध्र प्रदेश विधान परिषद में 58 सदस्य हैं। अन्य राज्य जहां विधान परिषद है वो हैं – बिहार (58), कर्नाटक (75), महाराष्ट्र (78), तेलंगाना (40) और उत्तर प्रदेश (100)। जम्मू कश्मीर में भी विधान परिषद हुआ करती थी लेकिन राज्य के बंटवारे के बाद यह व्यवस्था स्वत: समाप्त है।

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तमिलनाडु की तत्कालीन द्रमुक सरकार ने विधान परिषद स्थापित करने के लिए कानून पारित किया था लेकिन 2010 में सत्तासीन अन्नाद्रमुक ने इस फैसले को वापस ले लिया। ओडीशा विधान सभा विधान परिषद बनाने के लिए प्रस्ताव पारित कर चुकी है। राजस्थान और असम में विधान परिषद बनाने के प्रस्ताव राज्य सभा में लंबित हैं।

मामले की जड़

आंध्र में तीन राजधानी के फॉर्मूले को लेकर सीएम जगनमोहन रेड्डी और विपक्ष के नेता चंद्रबाबू नायडू के बीच खींचतान चल रही है। नायडू चाहते थे कि अमरावती में एक बड़ी सी राजधानी बने लेकिन जगनमोहन का तर्क है कि एक शहर में विकास के नाम पर इतना पैसा लगाना सही फैसला नहीं होगा। इससे अच्छा हैै कि तीन राजधानी बनाकर तीन अलग-अलग शहरों में विकास के काम किए जाएं।

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तीन अलग-अलग शहरों को राजधानी बनाने के लिए विधानसभा में दो अलग-अलग बिल लाए गए। एक बिल तीन राजधानी बनाने के लिए जबकि दूसरा अमरावती को सिर्फ राजधानी बनाने वाले कानून के हटाने के लिए। विधानसभा में ये बिल तो पास हो गया लेकिन ऊपरी सदन में ये अटक गया। बाद में इस बिल को सलेक्ट कमेटी के पास भेजा गया। इससे नाराज रेड्डी ने विधान परिषद को ही खत्म करने का फैसला ले लिया।

जगनमोहन का कहना है कि विधान परिषद का होना अनिवार्य नहीं है। यह हमारा ही बनाया हुआ है और केवल हमारी सुविधा के लिए है। विधान परिषद राज्य सरकार पर आर्थिक रूप से बोझ भी बन गई है। विधान परिषद पर हर साल 60 करोड़ रुपये खर्च कर रहे हैं।