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Article 370 मुश्किलें पैदा कर सकता है, इन्हें पहले से पता था

जब यह दबाव का तरीका विफल रहा, तो पठान जातियों के कश्मीर पर आक्रमण को पाकिस्तान ने उकसाया, भड़काया और समर्थन दिया। तब तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद का आग्रह किया। यह 24 अक्टूबर, 1947 की बात है।

Manali Rastogi

Manali RastogiBy Manali Rastogi

Published on 6 Aug 2019 7:30 AM GMT

Article 370 मुश्किलें पैदा कर सकता है, इन्हें पहले से पता था
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नई दिल्ली: भारत के संविधान निर्माता, चिंतक और समाज सुधारक डॉ भीमराव आंबेडकर ने भारत का संविधान लिखते समय ही धारा 370 का मसौदा बनाने से इनकार कर दिया था। यही नहीं, आंबेडकर ने इनकार करते हुए ये भी कहा था कि देश के लिए ऐसा प्रावधान ठीक नहीं होगा।

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कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो कश्मीरी लीडर शेख अब्दुल्ला से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आंबेडकर से सलाह करके कश्मीर के लिहाज से एक अलग संविधान बनाने को कहा था। हालांकि, भारत के पहले कानून मंत्री रहे डॉ आंबेडकर ने साफ मना करते हुए कहा था कि इसकी जरूरत ही नहीं है।

आंबेडकर ने पहले ही कर दिया था मना

दरअसल, आंबेडकर का शुरू से ये मानना था कि अगर जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए अलग कानून बनता है तो भविष्य में यह कई समस्याएं पैदा करेगा, जिन्हें सुलझाना और उनसे निपट पाना मुश्किल हो जाएगा। डॉ आंबेडकर का ये डर काफी हद तक सही निकला।

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ऐसे में शेख से मुलाकात के दौरान डॉ आंबेडकर ने कहा था कि, ‘आप चाहते हैं कि भारत आपकी सीमाओं की रक्षा करे, आपकी सड़कें बनवाए, आपको खाना, अनाज पहुंचाए....फिर तो उसे वही स्टेटस मिलना चाहिए जो देश के दूसरे राज्यों का है। इसके उलट आप चाहते हैं कि भारत सरकार के पास आपके राज्य में सीमित अधिकार रहें और भारतीय लोगों के पास कश्मीर में कोई अधिकार नहीं रहे। अगर आप इस प्रस्ताव पर मेरी मंजूरी चाहते हैं तो मैं कहूंगा कि ये भारत के हितों के खिलाफ है। एक भारतीय कानून मंत्री के हिसाब से मैं ऐसा कभी नहीं करूंगा।’

आर्टिकल 370 का ड्राफ्ट बनाने से किया इनकार

जब डॉ आंबेडकर ने आर्टिकल 370 का ड्राफ्ट बनाने से मना कर दिया तब शेख ने दोबारा नेहरू को एप्रोच किया। इसके बाद नेहरू ने एन। गोपालस्वामी आयंगर को मामले के लिए तैयार किया।

दरअसल, तब आयंगर राज्यसभा के सदस्य तो थे ही साथ में संविधान मसौदा समिति के भी सदस्य थे। इसके अलावा वह साथ ही महाराजा हरि सिंह के पूर्व दीवान भी रह चुके थे। जम्मू-कश्मीर विलय में आयंगर अहम भूमिका अदा की थी। यही वजह थी कि नेहरू ने उन्हे अपने कैबिनेट में शामिल किया था।

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मगर आयंगर को भी मसौदा तैयार करवाने में काफ़ों अड़चनों का सामना करना पड़ा। गोपालस्वामी आयंगर, पटेल, शेख अब्दुल्ला और उनके साथियों के बीच कश्मीर के भारत से संबंधों को लेकर अनुच्‍छेद-370 (मसौदे में अनुच्‍छेद-306 ए) को लेकर तीखी बहस चलीं। मालूम हो, जब-जब शेख अब्दुल्ला और आयंगर के बीच इस मुद्दे को लेकर चर्चा होती थी तो वो हमेशा विवाद पैदा करने वाली होती थी।

आयंगर ने जारी किया था बयान

इसपर आयंगर ने बयान भी जारी कर कहा था कि, ‘मुझसे उम्मीद की जा रही है कि मैं दिक्कतों के लिए एक समाधान पेश करूं।’ दरअसल, आयंगर भी जानते थे कि जो काम उन्हे सौंपा गया है, वो काफी पेचीदा काम है। यही वजह है कि आयंगर ने अपने एक खत में लिखा था कि, ‘समय निकलता जा रहा है। मैं समझ नहीं पा रहा हूं। बहुत सी बातों से मैं सहमत नहीं हूं।’

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शेख और आयंगर के बीच विवाद इतना बढ़ गया था कि आयंगर ने एक बार आजिज आकर संविधान सभा से त्याग पत्र देने की धमकी भी दे डाली। उन्होंने कहा कि ये ठीक नहीं हो रहा है। मगर इस दौरान नेहरू अमेरिका दौरे पर चले गए।

साथ ही, वल्लभ भाई पटेल को कह गए कि इसे वो संसद में पास करा दें। ऐसे में 12 अक्टूबर को सरदार पटेल ने संविधान सभा में कहा, 'उन विशेष समस्याओं को ध्यान में रखते हुए जिनका सामना जम्मू और कश्मीर सरकार कर रही है, हमने केंद्र के साथ राज्य के संवैधानिक संबंधों को लेकर वर्तमान आधारों पर विशिष्ट व्यवस्था की है।'

मसौदे पर बनी सहमति

विवादों के बीच 16 अक्टूबर को एक मसौदे पर सहमति बनी। हालांकि, बिना शेख को विश्वास में लिए आयंगर ने मसौदे की उपधारा-1 के दूसरे बिंदू में बदलाव कर दिया। साथ ही, इसे संविधान सभा में पास भी करा लिया। मगर जब ये बात शेख अब्दुल्ला को पता चली तो वो काफी नाराज भी हुई और उन्होने संविधान सभा से इस्तीफा देने की धमकी दी।

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मगर वस्तुस्थिति यह है कि मौजूदा एनडीए सरकार ने इसी उपधारा एक और दो में जो स्थितियां थीं, उन्हीं दरारों को भांपकर आर्टिकल 370 को बहुत हल्का कर दिया बल्कि यों कहें कि इस आर्टिकल की हवा ही निकाल दी है।

क्या है पूरा मामला?

  • साल 1947 में 560 अर्ध स्वतंत्र शाही राज्य अंग्रेज साम्राज्य द्वारा प्रभुता के सिध्दांत के अंतर्गत 1858 में संरक्षित किए गए। कैबिनेट मिशन ज्ञापन के तहत, भारत स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 द्वारा इन राज्यों की प्रभुता की समाप्ति घोषित हुई, राज्यों के सभी अधिकार वापस लिए गए, व राज्यों का भारतीय संघ में प्रवेश किया गया। ब्रिटिश भारत के सरकारी उत्तराधिकारियों के साथ विशेष राजनैतिक प्रबंध किए गए।
  • कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने पाकिस्तान और भारत के साथ तटस्थ समझौता किया। पाकिस्तान के साथ समझौता पर हस्ताक्षर हुए। भारत के साथ समझौते पर हस्ताक्षर से पहले, पाकिस्तान ने कश्मीर की आवश्यक आपूर्ति को काट दिया जो तटस्थता समझौते का उल्लंघन था।

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  • उसने अधिमिलन के लिए दबाव का तरीका अपनाना आरंभ किया, जो भारत व कश्मीर, दोनों को ही स्वीकार्य नहीं था। जब यह दबाव का तरीका विफल रहा, तो पठान जातियों के कश्मीर पर आक्रमण को पाकिस्तान ने उकसाया, भड़काया और समर्थन दिया। तब तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद का आग्रह किया। यह 24 अक्टूबर, 1947 की बात है।
  • नेशनल कांफ्रेंस, जो कश्मीर सबसे बड़ा लोकप्रिय संगठन था, व अध्यक्ष शेख अब्दुल्ला थे; ने भी भारत से रक्षा की अपील की। हरि सिंह ने गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन को कश्मीर में संकट के बारे में लिखा, व साथ ही भारत से अधिमिलन की इच्छा प्रकट की। इस इच्छा को माउंटबेटन द्वारा 27 अक्टूबर, 1947 को स्वीकार किया गया।

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  • भारत सरकार अधिनियम, 1935 और भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत यदि एक भारतीय राज्य प्रभुत्व को स्वींकारने के लिए तैयार है, व यदि भारत का गर्वनर जनरल इसके शासक द्वारा विलयन के कार्य के निष्पादन की सार्थकता को स्वीकार करे, तो उसका भारतीय संघ में अधिमिलन संभव था।
  • पाकिस्तान द्वारा हरि सिंह के विलयन समझौते में प्रवेश की अधिकारिता पर कोई प्रश्न नहीं किया गया। कश्मीर का भारत में विलयन विधि सम्मत माना गया। व इसके बाद पठान हमलावरों को खदेड़ने के लिए 27 अक्टूबर, 1947 को भारत ने सेना भेजी, व कश्मीर को भारत में अधिमिलन कर यहां का अभिन्न अंग बनाया।

क्या कहता है आर्टिकल 370?

  • भारतीय संविधान का आर्टिकल 370 एक ऐसा लेख है जो जम्मू और कश्मीर राज्य को स्वायत्तता का दर्जा देता है।
  • संविधान के भाग XXI में लेख का मसौदा तैयार किया गया है: अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान।
  • जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा को, इसकी स्थापना के बाद, भारतीय संविधान के उन लेखों की सिफारिश करने का अधिकार दिया गया था जिन्हें राज्य में लागू किया जाना चाहिए या आर्टिकल 370 को पूरी तरह से निरस्त करना चाहिए।
  • बाद में जम्मू-कश्मीर संविधान सभा ने राज्य के संविधान का निर्माण किया और अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की सिफारिश किए बिना खुद को भंग कर दिया, इस लेख को भारतीय संविधान की एक स्थायी विशेषता माना गया।
  • आर्टिकल 370 के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से सम्बन्धित क़ानून को लागू करवाने के लिये केन्द्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिये।
  • इसी विशेष दर्ज़े के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती।
  • इस कारण राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्ख़ास्त करने का अधिकार नहीं है।
  • 1976 का शहरी भूमि क़ानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता।
  • इसके तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि ख़रीदने का अधिकार है। यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में ज़मीन नहीं ख़रीद सकते।
  • भारतीय संविधान की धारा 360 जिसके अन्तर्गत देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती।
  • भारत में विलय करना जम्मू-कश्मीर की सबसे बड़ी जरूरत थी। ऐसे में धारा 370 के तहत राज्य को कुछ विशेष अधिकार दे दिए गए ताकि ये विलय का काम जल्दी हो सके।

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