जम्मू-कश्मीर: आर्टिकल 370 पर अभी बाकी है ‘सुप्रीम’ न्याय

संविधान सभा के ज्यादातर सदस्य भी अब जीवित नहीं हैं। फिलहाल, यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि संविधान सभा के भंग होने से पहले सेक्शन 370 के बारे में स्थिति भी स्पष्ट नहीं की गई थी कि यह स्थायी होगा या इसे बाद में समाप्त किया जा सकेगा।

Published by Manali Rastogi Published: August 6, 2019 | 9:24 am
Modified: August 6, 2019 | 4:07 pm
जम्मू-कश्मीर: ज्यादा न हों खुश, आर्टिक्ल 370 पर अभी बाकी है ‘सूप्रीम’ न्याय

जम्मू-कश्मीर: ज्यादा न हों खुश, आर्टिक्ल 370 पर अभी बाकी है ‘सूप्रीम’ न्याय

नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन और आर्टिकल 370 को हटाने से संबंधित संकल्प को नरेंद्र मोदी सरकार सोमवार को राज्यसभा में बहुमत से पास करवा चुकी है। अब ऐसे में राज्य पर पूरी तरह से भारतीय संविधान लागू होगा और प्रदेश से अब विशेष राज्य का दर्जा भी वापस ले लिया गया है। आर्टिकल 370 हटने के बाद से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख अब से केंद्र शासित राज्य होंगे, जिसमें लद्दाख बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित राज्य होगा।

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अभी बाकी है ‘सूप्रीम’ न्याय

हालांकि, मोदी सरकार को अभी इस मामले में सूप्रीम कोर्ट से झटका मिल सकता है। कयास लगाए जा रहे हैं कि सरकार को कई अड़चनों का सामना करना पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट में आर्टिकल 370 में निर्धारित प्रावधानों को आधार बनकार इसे ‘असंवैधानिक’ बताकर चुनौती अभी भी दी जा सकती है। दरअसल, संविधान में अस्थायी आर्टिकल 370 को समाप्त करने का एक विशिष्ट प्रावधान निर्धारित है।

जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की लेनी बाकी है इजाजत

सोमवार को गृह मंत्री द्वारा राज्यसभा में पेश संकल्प को बहुमत से पारित तो करा लिया गया है लेकिन संविधान का अनुच्छेद 370 (3) कहता है कि 370 को हटाने या बदलने के लिए जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की अनुमति लेनी जरूरी है। हालांकि, साल 1956 में ही जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा को भंग कर दिया गया था।

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इसके अलावा संविधान सभा के ज्यादातर सदस्य भी अब जीवित नहीं हैं। फिलहाल, यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि संविधान सभा के भंग होने से पहले सेक्शन 370 के बारे में स्थिति भी स्पष्ट नहीं की गई थी कि यह स्थायी होगा या इसे बाद में समाप्त किया जा सकेगा।

सबसे बड़ा पॉइंट होगा संविधान सभा

सभी कश्मीरी दलों ने केंद्र सरकार के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है। दरअसल, सोमवार को राष्ट्रपति ने जम्मू-कश्मीर से जुड़ा संवैधानिक आदेश जारी किया, जिसपर सीनियर एडवोकेट एम.एल. लाहौटी ने कहा कि आर्टिकल 370 (3) के तहत संविधान सभा की सहमति से ही राष्ट्रपति विशेष दर्जा वापस ले सकते हैं।

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इसपर सवाल ये उठता है कि संविधान सभा 1956 में ही भंग हो गई थी तो ऐसे में क्या नए संवैधानिक आदेश को संविधान सभा की सहमति है। ऐसे में कहा गया कि संविधान सभा को विधानसभा पढ़ा जाए। यह राष्ट्रपति के आदेश में भी कहा गया है। बता दें, जम्मू-कश्मीर विधानसभा अभी भंग है, इसलिए चुनी हुई सरकार के अधिकार गवर्नर में निहित हैं और राज्य सरकार (गवर्नर) की सिफारिश पर राष्ट्रपति ने यह प्रावधान खत्म किया है।

क्या संविधान सभा और विधानसभा में कोई अंतर नहीं?

हालांकि, इसके बाद भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या संविधान सभा और विधानसभा में कोई अंतर नहीं है। इसके अलावा यह भी सवाल हो रहा है कि क्या गवर्नर की सहमति को राज्य सरकार की सहमति माना जाएगा/ लोकसभा के पूर्व सेक्रेटरी जनरल पी.डी.टी. अचारी भी मानते हैं कि राष्ट्रपति के आदेश को चुनौती देने का यह सबसे बड़ा पॉइंट संविधान सभा हो सकता है।

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अब देखना ये है कि सूप्रीम कोर्ट में ये मामला कब और कैसे जाता है। ये भी देखने वाली बात है कि विपक्ष के सभी दल एकजुट होकर इस बार भी मोदी सरकार के खिलाफ आवाज उठाएंगे। अगर ऐसा होता भी है तो ये मामला किसके पक्ष में जाने की उम्मीद है। इस मामले में कुछ लोगों ने अपनी राय दी है। इन लोगों का कहना है कि अगर केंद्र सरकार ने ये कदम उठाया है तो संविधान के हर पहलू को देखते हुए ही ऐसा किया होगा।