राम मंदिर के लिए इस दलित ने रखी थी सबसे पहली ईंट

बिहार में सुपौल के रहने वाले कामेश्वर ने बताया था कि, संतों द्वारा एक दलित व्यक्ति से मंदिर का निर्माण करना, ठीक उसी तरह था जिस तरह शबरी द्वारा रामजी को बेर खिलाना था। ये ऐतिहासिक पल दलितों के लिए किसी गर्व के पल से कम नहीं था।

Published by Shreya Published: November 10, 2019 | 11:05 am

नई दिल्ली: देश के सबसे ज्यादा विवादित अयोध्या मामले पर कल सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुना चुका है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में राम मंदिर बनवाने का आदेश दिया गया है। लगातार चली लगभग 40 दिन की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सबके सामने रखा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से लोगों में खुशी का माहौल है। इस मौके पर हम आपको बताने जा रहे हैं कि किस तरह एक दलित ने राम मंदिर की नींव रखी थीं और साथ ही उन्होंने राम भक्तों में राम नहीं तो रोटी नहीं के नारे के साथ जोश भर दिया था।

इस दलित ने रखी मंदिर की नींव

अयोध्या में राम मंदिर शिलान्यास की नींव विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन जॉइंट सेक्रटरी कामेश्वर चौपाल ने रखी थी। बता दें कि कामेश्वर बिहार के एक दलित समुदाय से हैं। उन्होंने ही राम मंदिर शिलान्यास की नींव रखी। जब कामेश्वर ने राम मंदिर शिलान्यास के लिए पहली ईंट रखी तो उन्होंने इसके साथ राम नहीं तो रोटी नहीं का भी नारा दिया था।

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2 लाख गांवों से आई थीं ईंटें

उस वक्त साल 1989 में देश के पीएम राजीव गांधी की सरकार थी। उनकी अनुमति के बाद ही अयोध्या में लगभग 30 साल पहले प्रस्तावित राम मंदिर की नींव रखी गई थी। जब अयोध्या में राम मंदिर को बनाने के लिए संघर्ष जारी थी, तब विश्व हिंदू परिषद् के आहवान पर कामेश्वर भी अयोध्या नगरी ईंट लेकर पहुंचे थे। जानकारी के मुताबिक, राम मंदिर के शिलान्यास के लिए करीब 2 लाख गांवों से ईंटें लाई गईं थीं। हालांकि दलित के हाथों से मंदिर के शिलान्यास के लिए ईंट रखे जाने के पीछे भी एक कहानी छिपी है।

दलित के हाथों नींव रखवाना, जैसे शबरी द्वारा बेर खिलाना

बिहार में सुपौल के रहने वाले कामेश्वर ने बताया था कि, संतों द्वारा एक दलित व्यक्ति से मंदिर का निर्माण करना, ठीक उसी तरह था जिस तरह शबरी द्वारा रामजी को बेर खिलाना था। ये ऐतिहासिक पल दलितों के लिए किसी गर्व के पल से कम नहीं था। समाज दलितों को अछूत मानता है पर राम मंदिर की नींव रखने के लिए एक दलित को ही चुना गया था। बताया जाता है कि, ये फैसला सामाजिक सौहार्द को देखते हुए लिया गया था।

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फैसले का था बेसब्री से इंतजार

अब कामेश्वर चौपाल की उम्र करीब 65 साल हो चुकी है और आज भी कामेश्वर 30 साल पहले के उस पल को नहीं भूल पाते हैं। राम मंदिर के लिए पहली ईंट रखने पर उन्हें हमेशा गर्व रहता है। कामेश्वर अयोध्या मामले पर बेसब्री से कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे थे। गौरतलब है कि, राम मंदिर शिलान्यास के लिए पहली ईंट रखने की वजह से कामेश्वर इतने मशहूर हो गए कि, वो इस वजह से दो बार बिहार विधान परिषद् के सदस्य बने।

देश की बेरोजगारी और अर्थव्यवस्था है जरुरी- कामेश्वर

हालांकि अब कामेश्वर का कहना है कि, मंदिर की मांग इस वक्त सही नहीं है, जब देश में बेरोजगारी और अर्थव्यवस्था पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है। अब कामेश्वर मंदिर-मस्जिद नहीं बल्कि देश की तरक्की के बारे में ज्यादा ध्यान देते हैं।

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