यू हीं नहीं बन जाते थे महान योद्धा, झेलनी पड़ती थी ये दर्दनाक यातनाएं

आपने इतिहास में कई योद्धाओं के बारे में सुना होगा। मध्यकालीन युग में योद्धा की उपाधि मिलना बहुत सम्मान की बात होती थी। इस उपाधि को प्राप्त करना आसान नहीं होता था, इसके लिए कई दर्दनाक यातनाओं को को झेलना पड़ता था।

लखनऊ: आपने इतिहास में कई योद्धाओं के बारे में सुना होगा। मध्यकालीन युग में योद्धा की उपाधि मिलना बहुत सम्मान की बात होती थी। इस उपाधि को प्राप्त करना आसान नहीं होता था, इसके लिए कई दर्दनाक यातनाओं को को झेलना पड़ता था।

एक समय में सिर्फ राजा या योद्धा वर्ग के लोगों तक सीमित यह उपाधि आम लोगों को भी दी जाने लगी, जो इसके लायक वाकई में थे।

इस उपाधि के लिए छोटी-सी उम्र से ही बहुत मेहनत करनी पड़ी थी जिसमें बच्चे को अपने आप को साबित करते हुए योद्धा होने के सभी गुणों को सीखने पड़ते थे।

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दूसरे चरण में उन्हें एक मौजूदा योद्धा के अंदर रहकर उसकी सेवा करना होता था। उसका दिल जीतने जैसा मुश्किल पड़ा भी पार करना पड़ता था।

मध्यकालीन युग में ऐसे मिलती थी योद्धा की उपाधि…

सात साल की उम्र से होती थी ट्रेनिंग

13वीं शताब्दी में यूरोप में आमतौर योद्धाओं को वंश के तौर पर संरक्षित रखने के लिए ही सिखाया या बनाया जाता था। फ्रांस और जर्मनी के अलावा, पूरे यूरोप में एक योद्धा का बेटा ही योद्धा बन सकता था।

मध्य युग में आमतौर पर योद्धा बनने की ट्रेनिंग या तो राजा के बेटे या फिर सिर्फ योद्धाओं के बच्चों को ही दी जाती थी। हालांकि, बाद में आम आदमी के बच्चे भी युद्ध के लिए तैयार किए जाने लगे।

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एक योद्धा के घुड़सवारी से लेकर तलवारबाजी में पारंगत होना बहुत जरूरी रहता था। उसे युद्ध में चलाने वाले हथियार जैसे कटार, भाला, तीर आदि भी चलाने में महारत हासिल होती थी।

योद्धा के तौर पर होने वाले बच्चे सात वर्ष की उम्र होने तक महल की महिलाओं कि देख-रेख में ही रहते थे। इसके बाद वह अलग घर यानी ‘हाउस ऑफ़ लार्ड या नाइट’ में चले जाया करते थे। यहां इन बच्चों को ‘पेज’ की उपाधि दी जाती थी। इस अंतराल के दौरान, उन्हें अलग-अलग क्षेत्र में जरूरी शिक्षा प्रदान की जाती थी।

उन्हें शिकार करना, बाज पालना और उनसे कैसा निपट जाए यह सब सिखाया जाता था। जबकि पुजारी या पादरी उन्हें धर्म की सीख दिया करते थे। साथ ही, वह उन्हें पढ़ना और लिखना भी सिखाते थे।

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इसके अलावा, ‘पेजेस’ योद्धाओं को देख-देखकर युद्ध का अभ्यास किया करते थे। इसके लिए वह पहले लकड़ी की तलवार को चलाना सीखते थे। वह आपस में ही युद्ध का अभ्यास करके अपने कौशल को बढ़ाते थे।

ऐसा होता था दूसरा पड़ाव

7 साल की उम्र से लेकर 13 साल की उम्र तक वे बच्चे पेजेस कहलाते थे। इसके बाद 14 साल की उम्र होते ही, अब ये पेजेस से बदलकर स्क्वायर बन जाते थे।

स्क्वायर शब्द फ्रेंच शब्द ecuyer से आया है, जिसका मतलब है ‘कवच वाहक’। उन्हें हैंडलिंग और घुड़सवारी के अलावा, रचनात्मक गुण भी सीखाए जाते थे। अब स्क्वायर बन जाने की दूसरी अवस्था में इन्हें आगे की शिक्षा प्रदान की जाती थी।

एक धार्मिक रस्म का आयोजन के साथ नए स्क्वायर को पादरी द्वारा एक पवित्र तलवार मिलती थी। स्क्वायर इस पवित्र तलवार को लेते समय इस बात की कसम खाते कि वह इसे सिर्फ धार्मिक और सम्मान के लिए ही इस्तेमाल करेंगे।

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इस रस्म को पूरा करने के बाद स्क्वायर लार्ड्स के विभिन्न कामों को करने लगते हैं। हर दायित्व को पूरा करने के लिए एक वर्ग समर्पित होता था जिसमें नाइट्स को पॉलिश, रात में नाइट की देखभाल आदि और दूसरे स्क्वायर को कवच पहनने में मदद किया करते थे।

इसमें स्क्वायर ऑफ बॉडी, स्कवायर ऑफ चैम्बर, द कार्विंग स्कवायर, स्कवायर ऑफ वाइन, स्कवायर ऑफ द पैंट्री, स्कवायर ऑफ आर्म्स, स्कवायर ऑफ ऑनर शामिल थे। अब अगर इनके कामों कि बात करें तो, स्क्वायर ऑफ बॉडी में अपना दायित्व निभाने वालों को किसी योद्धा या उसकी पत्नी का निजी नौकर बनकर अपनी सेवा देनी होती थी।

सीखते थे रचनात्मक गुण

वह उनसे मिले सारे कार्यों को पूरा किया करता था। स्कवायर ऑफ़ चैम्बर में काम करने वाले स्क्वायर को महल में मौजूद सभी कमरों में अपनी सेवा देनी होती थी। इसी तरह हर वर्ग को अपने काम विभाजित होते थे।

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सिर्फ युद्ध की कुशलता सिखाने के अलावा उन्हें संगीत, डांस और फ्रेंच और लैटिन भाषा भी पढ़नी और लिखनी आनी थी। उन्हें कविताएं बोलनी सिखाई जाती थी। साथ ही, अच्छी आदतों को अपनाने पर भी जोर दिया जाता था। खासकर की महिलाओं के साथ, इसके लिए वे उनके साथ शतरंज का खेल खेलते और शिकार पर भी जाया करते थे।

उन्हें शिकार करना सिखाया जाता था जिसमें उनके द्वारा किये गए शिकार को योद्धा के टेबल पर खाने के लिए परोसा जाता था। स्क्वायर को पेजेस का ख्याल रखना होता था यानी उन्हें ट्रेनिंग देने की जिम्मेदारी उनकी ही होती थी।

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एक स्क्वायर ट्रेनिंग के दौरान असली बरछे और तलवार से अभ्यास करता था। इन तलवारों को असली युद्ध के मैदान में इस्तेमाल होने वाली तलवारों से भी ज्यादा भारी और खतरनाक बनाया जाता था। ताकि योद्ध को असली युद्ध में लड़ते समय अपनी लड़ाई आसान लगे।

जब असली युद्ध होता था तब स्क्वायर नाइट के सहायक के तौर पर युद्ध मैदान में उतरता था। उसे योद्धा के आगे ज्यादा घोड़ों और सामान के साथ चलना पड़ता था। युद्ध क्षेत्र में योद्धा के जख्मी हो जाने पर उसे वहां से बाहर निकालने की ज़िम्मेदारी स्क्वायर की होती थी। पूरी तरह से इन कलाओं में ट्रेनिंग लेकर उसमें पारंगत होने के बाद उन्हें योद्धा की उपाधि मिल जाती थी।

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योद्धा की 18 से 21 साल में मिल जाती थी। साथ ही, एक स्क्वायर को योद्धा लार्ड्स बनाया करते या फिर उसका योद्धा। इस बात के बारे में कई मतभेद हैं कि जो स्क्वायर योद्धा नहीं बन पाता था उसका क्या होता था। माना जाता है कि उन्हें चर्च में काम मिल जाया करता था।

योद्धी की उपाधि तीसरी और आखिरी होती थी। उन्हें एक रस्म का आयोजन करते हुए धूम-धाम से इसकी उपाधि दे दी जाती थी।