पी. सी. महालनोबिस की विरासत

प्रो महालनोबिस अपने शानदार करियर के दौरान कई अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय पदों पर रहे। उन्होंने 1947 से 1951 तक सांख्यिकीय नमूनाकरण पर संयुक्त राष्ट्र उप-आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।

प्रोफेसर यशवीर त्यागी

भूतपूर्व अध्यक्ष अर्थशास्त्र विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय

नई दिल्ली: 29 जून को ,स्वर्गीय प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस की जयंती के उपलक्ष्य में, ‘राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस ’के रूप में मनाया जाता है. महालनोबिस का जन्म 1893 में हुआ था। महलनोबिस ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कलकत्ता में पूरी की। उन्होंने 1912 में प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता से भौतिकी में स्नातक( ऑनर्स) की उपाधि प्राप्त की। बाद में वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में भौतिकी और गणित का अध्ययन करने के लिए इंग्लैंड चले गए और इन विषयों में उच्च डिग्री कोर्स ‘ट्रिपोज़’(Tripos) पूरा किया।

महालनोबिस का सांख्यिकी से परिचय प्रसिद्ध पत्रिका बायोमेट्रिका के माध्यम से हुआ Iइस पत्रिका को महान सांख्यिकीविद् कार्ल पियर्सन द्वारा प्रारम्भ किया गया था। महालनोबिस ने इस पत्रिका में प्रकाशित लेखों को काफी दिलचस्प पाया और उन्होंने पत्रिका के कई संस्करणों को खरीदा और भारत वापस आ गए। भारत वापस आने पर महालनोबिस भौतिकी विभाग, प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता में नियुक्त हुए और कालांतर में प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष पद को सुशोभित किया।

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सांख्यिकी में प्रमुख योगदान

सांख्यिकीय के क्षेत्र में महालनोबिस का पहला प्रयास मानवमिति (एन्थ्रोपोमेट्री में था। उन्होंने कलकत्ता के एंग्लो इंडियन लोगों से संबंधित मानवशास्त्रीय आंकड़ों का विश्लेषण किया। महालनोबिस ने मौसम विज्ञान और बाढ़ नियंत्रण की समस्याओं का भी अध्ययन किया। एक व्यावहारिक सांख्यिकीविद् के रूप में महालनोबिस ने समस्याओं के समाधान खोजने में हमेशा नवाचार और व्यवस्थित पद्धति को अपनाया I

प्रो महालनोबिस ने सांख्यिकी के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान दिया है I लेकिन इस क्षेत्र में उनके तीन कार्यों को पथप्रदर्शक माना जाता है। पहला मानवशास्त्रीय सर्वेक्षण पर उनके काम से संबंधित है. इसमें समग्रों की तुलना और समूहन हेतु एक बहुचरीय दूरी मप की प्राविधि के आविष्कार से सम्बंधित है। इस मप को (D वर्ग) द्वारा निरूपित किया जाता है, जिसे अब महालनोबिस दूरी कहा जाता है। महालनोबिस का दूसरा महत्वपूर्ण योगदान बड़े पैमाने पर नमूना सर्वेक्षण (सैंपल सर्वे )करने के क्षेत्र में था।

उन्होंने बंगाल में जूट की फसल के क्षेत्र और उपज के आकलन करने हेतु नमूना सर्वेक्षण पर अपना काम शुरू किया। अपने ऐसे कई अध्ययनों के दौरान उन्होंने सर्वेक्षण के नमूने के क्षेत्र में कई अभिनव प्रयोग किये और इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किए, जिसमें नमूना डिजाइन का इष्टतम चुनाव भी शामिल था। पायलट सर्वेक्षण के उनके विचार को अनुक्रमिक नमूने (सिक्वेंसिंग सैंपलिंग ) का प्रारम्भिक रूप माना जाता है I जिसे इस पद्धति को ए. वाल्ड द्वारा विकसित किया गया I महालनोबिस का सांख्यिकी के क्षेत्र में तीसरा महत्वपूर्ण योगदान फ्रैक्टाइल ग्राफिकल एनालिसिस का तरीका था, जिसका उपयोग लोगों के विभिन्न समूहों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों की तुलना के लिए किया जा सकता है।

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आर्थिक नियोजन में भूमिका

प्रो महालनोबिस का नियोजन मॉडल एक बहु प्रचलित मॉडल है और यह भारत की द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61) का आधार था। उनके मॉडल के दो प्रकार हैं- एक दो सेक्टर मॉडल और एक चार सेक्टर मॉडल। औद्योगीकरण की रणनीति उनके मॉडल का परिणाम थीI इस रणनीति में भारी उद्योगों को बढ़ावा देने और पूंजीगत सामान क्षेत्र में निवेश को प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया।

उन्होंने अपने मॉडल से गणितीय रूप से साबित किया कि यह रणनीति, जिसे कभी-कभी भारी निवेश रणनीति कहा जाता है, इससे लंबे समय में अर्थव्यवस्था दीर्घकालीन संवृद्धि दर में वृद्धि होगी। इस रणनीति में सार्वजनिक क्षेत्र को भी प्रमुख भूमिका दी गई। कतिपय कारणों से इस रणनीति के परिणाम भले ही शानदार न रहे हों, लेकिन इसने निश्चित रूप से भारत में एक विविधतापूर्ण औद्योगिक संरचना की नींव रखी और कई क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता के उद्देश्य को प्राप्त करने में काफी हद तक मदद की।

भारतीय सांख्यिकी के जनक (Father of Indian Statistics)

महालनोबिस के अनुसार, समंक राष्ट्रीय योजना और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन वह एक मात्र बौद्धिक विचारक नहीं थे। उन्होंने दिखाया कि वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग व्यावहारिक समस्याओं के समाधान खोजने और समाज के सामान्य कल्याण के लिए निर्णय लेने में किया जा सकता है। उन्हें सही मायने में ‘भारतीय सांख्यिकी का पिता ’कहा जाता है और 2006 में भारत सरकार ने उनकी जयंती को ‘राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस’ के रूप में नामित करने का निर्णय लिया और इसे 2007 से मनाया जा रहा है।इस वर्ष ये चौदहवां ‘राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस’हैI

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राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मान्यता

प्रो महालनोबिस अपने शानदार करियर के दौरान कई अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय पदों पर रहे। उन्होंने 1947 से 1951 तक सांख्यिकीय नमूनाकरण पर संयुक्त राष्ट्र उप-आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। वह लंदन के रॉयल सोसाइटी के फेलो , अमेरिकन सांख्यिकीय एसोसिएशन के फेलो और अंतर्राष्ट्रीय सांख्यिकीय संस्थान के मानद अध्यक्ष थे। प्रो महालनोबिस 1955-1967 के दौरान भारत के योजना आयोग के सदस्य रहे थे।

उन्होंने 1972 में अपनी मृत्यु तक, 1949 से भारत सरकार के मानद सांख्यिकीय सलाहकार का पद भी संभाला।1968 में महलनोबिस को राष्ट्र और विज्ञान की सेवा में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण दिया गया।

समकालीन प्रासंगिकता

वर्तमान समय में जहां ‘बिग डेटा एनालिटिक्स ’(Big Data Analytics)अनुसंधान का एक आला क्षेत्र बन गया है और डेटा अर्थव्यवस्था का नया तेल है, महालनोबिस के कार्यों और अभिनव दृष्टिकोण में एक सार्थक प्रासंगिकता है। महालनोबिस द्वारा औद्योगीकरण को प्राथमिकता दिया जाना और एक सशक्त, आत्मनिर्भर भारत का उनका विज़न सही साबित हुआ था क्योंकि अब नीति निर्माताओं ने ‘मेक इन इंडिया ’कार्यक्रम शुरू करके विनिर्माण पर नए सिरे से जोर दिया है I

हाल ही में ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ (सेल्फ-रिलाएंट इंडिया मिशन) भी इसी क्रम में एक नया कदम है । पी. सी. महालनोबिस की समृद्ध विरासत ,भारत में वैज्ञानिकों की वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी।

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