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Good News: संकेत अच्छे हैं, प्रदूषण घटने से लौट आई तितलियां

प्रदूषण को भांपने में तितलियां बेहद संवेदनशील होती हैं। आप अपने कपड़े पर डियो या परफ्यूम लगाकर उनके पास जाएं, वे आपसे दूर भागेंगी।

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NewstrackBy Newstrack

Published on 25 July 2020 7:10 AM GMT

Good News: संकेत अच्छे हैं, प्रदूषण घटने से लौट आई तितलियां
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नील मणि लाल

लखनऊ। कोरोना महामारी का एक असर ये हुआ है कि रंग-बिरंगी तितलियां फिर से दिखने बाग-बगीचों और हमारे घर के गार्डेन में दिखने लगी हैं। दरअसल, कोरोना महामारी की वजह से लॉकडाउन लाग्ने के कारण प्रदूषण में कमी आई है और तितलियों को संजीवनी मिल गई है। दूषित पर्यावरण की वजह से तितलियां विलुप्त हो रही थीं। तितलियां पर्यावरण के स्वस्थ होने की संकेतक होती हैं। जिस इलाके का पर्यावरण संतुलन बिगड़ता है वहां से सबसे पहले तितलियां पलायन कर जाती हैं।

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प्रदूषण को भांपने में तितलियां बेहद संवेदनशील

प्रदूषण को भांपने में तितलियां बेहद संवेदनशील होती हैं। आप अपने कपड़े पर डियो या परफ्यूम लगाकर उनके पास जाएं, वे आपसे दूर भागेंगी। मानसून के आते ही प्रकृति में नए पौधे और फूल खिलने की तैयारी शुरू हो जाती है। इसी समय तितलियां सबसे अधिक दिखाई पड़ती हैं। मानसून में नए फूल और पौधों के उगने से तितलियों को अपने पोषण और प्रजनन के लिए भरपूर साधन मिलते हैं इसलिए बारिश गिरने के बाद प्रकृति में उनकी संख्या अचानक बढ़ जाती है।

अंधाधुंध शहरीकरण, पेड़-पौधों के विनाश, कंक्रीटीकरण, अनुपयोगी पौधों के रोपण, मोबाइल टॉवरों की तरंगें, फसलों में इस्तेमाल होने वाली कीटनाशक दवाइयां जैसे तमाम कारण हैं जिससे तितलियों का खात्मा होता जा रहा है। तितलियां जैव विविधता का महत्वपूर्ण अंग हैं। परागण की प्रक्रिया में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इनकी कमी फसल के उत्पादन को भी प्रभावित करती हैं। दुनिया में तितलियों की करीब 2400 प्रजातियां हैं जिनमें से 1600 प्रजातियां भारत में देखी गई हैं। इसमें से करीब 150 प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं।

भारत में आमतौर पर मिलने वाली तितलियाँ

भारत में तितलियों का नामकरण ब्रिटिश अध्ययनकर्ताओं की देन है जो सैन्य अधिकारी या शिकारी थे। इसलिए तितलियों के नामों में जंगल के प्राणियों और मिलिट्री रैंक जुड़े हुए हैं (जैसे प्लेन टाइगर तितली, कमांडर तितली आदि)।

प्लेन टाइगर : यह हिमालय के ऊंचे इलाकों को छोड़कर लगभग संपूर्ण भारत में पाई जाने वाली नारंगी-गेरुए रंग की खूबसूरत तितली है। आप इन्हें जमीन के निकट अलग-थलग उगे किसी फूल पर देख सकते हैं। पूरी तरह खुली अवस्था में पंख के एक छोर से दूसरे छोर तक की दूरी 6-7 सेंटीमीटर होती है लिहाजा यह एक बड़े आकार की तितली है। बरसात में इनका रंग और भी चटख हो जाता है। भारत के अलावा यह लगभग संपूर्ण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में पाई जाती है।

स्ट्राइपड टाइगर : प्लेन टाइगर से मिलती-जुलती इस तितली के पंखों पर धारियां होती हैं जिस कारण इसका यह नाम पड़ा। आकार में यह प्लेन टाइगर जितनी और कभी-कभी उससे छोटी भी होती है। इनका रंग भी नारंगी-गेरुआ होता है लेकिन प्लेन टाइगर जैसा चटख नहीं। भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी,पूर्वी और दक्षिणी तटीय इलाकों तक इनका विस्तार है।

कॉमन क्रो : चॉकलेटी-भूरे रंग वाली यह तिलती अपने खुले पंखों के साथ लगभग 8-9 सेंटीमीटर की होती है। यह खुले पंख के साथ कम दिखाई पड़ती है। अकसर ये आपको ऊपर को पंख समेटे फूलों पर अधिक देर तक बैठी दिखाई पड़ेंगी। शरीर में जहरीले टॉक्सिन होने के कारण इसे चिड़िया या दूसरे जीव-जंतु इसका शिकार नहीं करते। इसलिए ‘कॉमन क्रो’ तितली को दुश्मन का डर नहीं होता। इसका भी विस्तार भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक है।

ब्लू टाइगर : इस तितली के काले पंखों पर छोटे-बड़े सफेद चकत्ते भरे होते हैं। 10.5 सेमी के पंख विस्तार के साथ आकार में काफी बड़ी होती है। हिमालय छोड़कर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक पाई जाती है।

ग्रास येलो : यह 3-4 सेंटीमीटर पंख विस्तार वाली छोटी तितली है। चटख पीले रंग की यह तितली आपको कहीं भी जमीन के पास घास में मंडराती हुई मिल जाती है। धूप रहने पर ये हमेशा उड़ती रहती हैं। लगभग संपूर्ण एशिया, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों, मैडागास्कर, फिजी और सोलोमन द्वीप में पाई जाती है।

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भारत की सबसे बड़ी तितली

हिमालय की गोल्डन बर्डविंग तितली को 88 वर्षों के बाद भारत की सबसे बड़ी तितली का तमगा दिया गया है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के दीदीहाट कस्बे में 194 मिमी पंखों वाली मादा गोल्डन बर्डविंग तितली पाई गई, जबकि 106 मिमी पंखों वाले नर गोल्डन बर्डविंग तितली शिलांग के वानखर तितली संग्रहालय में मौजूद है। हाल ही में इसकी और अन्य 24 प्रजातियों की तितलियों के नए मापों की जानकारी प्रकाशित की गई थी।

67 वर्ष बाद दिखी डेजर्ट ग्रिजलड स्कीपर तितली

विलुप्त प्रजाति की एक तितली को जैसलमेर में 67 साल बाद फिर से देखा गया है। ये तितली है डेजर्ट ग्रिजलड स्कीपर जिसका वैज्ञानिक नाम स्पिलिया डोरिस इवानिडा है और इसे सिंध स्किपर के नाम से भी जाना जाता है। इस तितली को जैसलमेर के अमर सागर क्षेत्र में देखा गया है। इस तितली को अंतिम बार गुजरात के डीसा में वर्ष 1949 में देखा गया था।

राजस्थान में ही उदयपुर अंचल के पर्यावरण वैज्ञानिकों ने एक नवीन प्रजाति की तितली को खोज निकाला है। दक्षिणी राजस्थान के कुंभलगढ़ अभयारण्य में स्लॉथ बीयर की पारिस्थितिकी पर शोध के दौरान दुर्लभ लाइलक सिल्वरलाइन नामक तितली का पता चला है। इस प्रजाति की खोज 1880 के दशक में की गई थी, और बंगलुरु में ऐसी सिर्फ एक तितली देखी गई थी।

यह प्रजाति पहले कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब और भारत के उत्तरी राज्यों और पाकिस्तान में रावलपिंडी में बहुत कम संख्या में देखी जा चुकी है। राजस्थान में अब तक तितलियों की 112 प्रजातियां दिखी हैं।

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अरुणाचल में दो नई प्रजातियां मिलीं

अरुणाचल प्रदेश के दो तितली प्रेमियों ने भारत में तितलियों को दो नई प्रजातियां खोज निकाली हैं। इनकी पहचान यहां बटरफ्लाई शोध संस्थान में की गई। ऐसे में अब देश में तितलियों की प्रजाति बढ़कर 1327 हो गई हैं। जो दो नई प्रजातियां खोजी गई हैं उनका नाम स्ट्राइपड हेयरस्ट्रीक व एल्युजिव प्रिंस है। उत्तराखंड के भीमताल बटरफ्लाई शोध संस्थान द्वारा वर्ष 2015 में प्रकाशित कैटलॉग में भारत में पाई जाने वाली तितलियों की प्रजाति की संख्या 1318 थी। बीते पांच साल में सात और नई प्रजाति की खोज हो चुकी है। दो नई तितलियां मिलने से अब यह संख्या 1327 पहुंच गई है।

अरुणाचल में मिली स्ट्राइपड हेयरस्ट्रीक तितली आमतौर पर दक्षिण चीन व उत्तरी म्यांमार में पाई जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ये एक दुर्लभ प्रजाति है और एक साल में इसकी एक ही पीढ़ी होती है। एल्युजिव प्रिंस की कहानी भी रोचक है। वर्ष 2019 में इटली के अंटोन्यो गिडिची भूटान में तितली देखने गए। इस दौरान उन्होंने ब्लैक प्रिंस नाम की तितली की फोटो खींची।

थाइलैंड में पाई जाने वाली एल्यूजिव प्रिंस भी उन फोटो में शामिल

उन्हें लगा थाइलैंड में पाई जाने वाली एल्यूजिव प्रिंस भी उन फोटो में शामिल थी, पर वह उसकी पुष्टि नहीं कर सके। उसी साल अरुणाचल प्रदेश बिजली विभाग में जेई मिनाम पर्रिटन ने ब्लैक प्रिंस के नमूने पहचान के लिए भीमताल भेजे। यहां विशेषज्ञों ने जब उसके जनन अंगों का निरीक्षण किया तो वह एल्युजिव प्रिंस का नर प्रजाति निकला। पता चला कि भारत में भी यह एल्युजिव प्रिंस पाया जाता है।

बटरफ्लाई शोध संस्थान भीमताल के निदेशक पीटर स्मैटाचैक ने बताया कि स्ट्राइपड हेयरस्ट्रीक के पंख में काली घनी लकीरें हैं और उसका पैटर्न भी इससे संबधित प्रजातियों से अलग है। वहीं एल्युजिव प्रिंस के अंगों को जब देखा गया तो इसका प्रजनन अंग अन्य तितलियों से अलग दिखाई दिया। यह दोनों तितलियां भारत के लिए नई हैं।

राज्य तितली का दर्जा

उत्तराखंड और महाराष्ट्र ने अपने यहाँ पायी जाने वाली विशेष तितलीयों को राज्य तितली का दर्जा दिया है। 'कॉमन पीकॉक' नाम की तितली प्रजाति को उत्तराखंड राज्य वन्य जीव बोर्ड ने राज्य तितली का दर्जा दिया है। 'कॉमन पीकॉक' तितली की एक दुर्लभ प्रजाती है जो केवल भारत के हिमालयी क्षेत्रों (7000 फीट) में पाई जाती है। दूसरी ओर महाराष्ट्र ने सहयाद्रि की पहाड़ियों में मिलने वाली ब्लू मॉरमॉन प्रजाति की तितली को राजकीय तितली घोषित किया है। महाराष्ट्र में राजकीय प्राणी बड़ी गिलहरी और राजकीय पक्षी हरियल है।

आम राज्य का राजकीय वृक्ष और जारूल राजकीय फूल है। राज्य में करीब 225 प्रजातियों की तितलियां हैं। मखमली कालेरंग की ब्लू मॉरमॉन तितली बर्डविंग के बाद आकार में सबसे बड़ी तितली है। देश में पाई जाने वाली कुल तितलियों में से 15 फीसदी तितलियां महाराष्ट्र में पाई जाती हैं। श्रीलंका के अलावा इस प्रजाति की तितली महाराष्ट्र के पश्चिम घाट, दक्षिण भारत व पूर्वी समुद्री किनारे वाले इलाके में पाई जाती है।

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तितली फक्त फाइल

- तितली कीट की श्रेणी में आने वाला एक जीव है। तितलियों का जीवनकाल बेहद छोटा होता है और यह लगभग 1 से 2 सप्ताह तक ही जीवित रह सकती है। तितली का सम्पूर्ण जीवन चार भागों में विभाजित होता है जिनमें अंडा, लार्वा (केटरपिलर), प्यूपा (क्रिस्लिस) और वयस्क शामिल है।

- तितली 17 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ़्तार से उड़ सकती है।

- तितली को ठंडे खून का प्राणी माना जाता है।

- दुनिया की सबसे बड़ी तितली का नाम जायंट बर्डविंग है जो सोलमन द्वीपों पर पाई जाती है। विश्व में पाई जाने वाली तितलियों में सभी बड़ी तितली 12 इंच की और सबसे छोटे तितली आधे इंच की होती है।

- तितलियाँ किसी भी चीज का स्वाद उस पर खड़ी होकर लेती हैं। क्योंकि इनके स्वाद चखने वाले सेंसर पैरों में पाए जाते है।

- तितलियां 100 किलोमीटर तक बिना अपना रास्ता भटके सटीक तरीके से अपने लक्ष्य तक पहुंच सकती हैं।

- तितली में सुनने की क्षमता नहीं होती लेकिन यह वाइब्रेशन को महसूस कर सकती है।

- तितलियां अगले दिन के मौसम का अंदाजा एक दिन पहले ही लगा सकती हैं।

- तितली भोजन के रूप में फूल,पत्तियां इत्यादि खाती हैं और लगभग अधिकांश तितलियां शाकाहारी ही होती हैं।

- तितलियां पराबैंगनी किरणों को देख सकती हैं जिन्हें इंसान नहीं देख सकते और तितली का आँख में 6000 लेंस होते हैं।

- तितलियां 3000 फीट की ऊंचाई तक उड़ सकती हैं। विश्व की सबसे तेज़ उड़ने वाली तितली मोनार्च है जो एक घंटे में 17 मील की दूरी तय कर लेती है।

- तितलियां होस्ट प्लांट पर अंडे देती हैं व नेक्टर प्लांट से भोजन और ऊर्जा ग्रहण करती हैं। होस्ट प्लांट में पत्थरचटा, मीठी नीम, आम, केसिया, नींबू, पीलू, पीकॉक फ्लॉवर, अरंडी आदि आते हैं। नेक्टर प्लांट में गुलाब, चित्रक, पलाश, सैभल, शिरिश, जैट्रोफा, गेंदा, अनार, गुड़हल, खैर, कैथ, महुआ, पलाश, सहजन, सूरजमुखी आदि पौधे आते हैं।

कार्बेट पार्क में तितलियों का संसार

उत्तराखंड के कार्बेट नेशनल पार्क में अब तितलियों का रंगबिरंगा संसार पर्यटकों के सामने उपलब्ध होगा। पार्क के वनों में ग्रे पैन्सी, कामन नवाब, कामन जैस्टर, ओरेंज आकलेट, कामन सेलर, कामन लाइम, ब्लू पैंसी आदि सैकड़ों प्रजातियों की तितलियां पाई जाती हैं। पार्क में लैंटाना व हरी झाड़ियों व ईश्क पेचा के फूलों पर तितलियां मंडराती रहती हैं। अब पार्क प्रशासन ने योजना तैयार की है कि तितलियों के संरक्षण के लिए पार्क में तितली पार्क बनाया जाए।

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