कोरोना इफेक्ट : वेंटिलेटर बनाने की दौड़ में लगे देश

कोविड-19 या कोरोना वायरस की दवा या वैक्सीन आने में अभी समय लगेगा। तब तक गंभीर रूप से बीमार मरीजों को बचाने के लिए वेंटिलेटर ही सहारा या उपाय हैं। जैसे जैसे कोरोना वायरस का संकट गहराता जा रहा है। वैसे ही भारत समेत विश्व भर में हार्डवेयर एक्स्पर्ट्स के लिए एक चुनौती खड़ी हो गई है।

‘वेंटिलेटर की बढ़ती मांग लॉकडाउन और सोशल डिस्टेन्सिंग से बेपरवाह देशों और लोगों के लिए चेतावनी है।‘

लखनऊ। कोविड-19 या कोरोना वायरस की दवा या वैक्सीन आने में अभी समय लगेगा। तब तक गंभीर रूप से बीमार मरीजों को बचाने के लिए वेंटिलेटर ही सहारा या उपाय हैं। जैसे जैसे कोरोना वायरस का संकट गहराता जा रहा है। वैसे ही भारत समेत विश्व भर में हार्डवेयर एक्स्पर्ट्स के लिए एक चुनौती खड़ी हो गई है। चुनौती कम से कम समय में अधिक से अधिक वेंटिलेटर बनाने की। जो कंपनियाँ कार के पुर्जे बनाती हैं, जिन कारखानों में रेलवे के डिब्बे बनाये जाते हैं, जहां अन्य मशीनें बनती हैं अब वहाँ वेंटिलेटर बनाने का काम हो रहा है।

कोरोना से ग्रस्त मरीजों को बचाने के लिए वेंटिलेटरों की जरूरत

वजह ये है कि कोरोना वायरस से ग्रस्त गंभीर मरीजों को बचाने के लिए वेंटिलेटरों की जरूरत है। जैसे जैसे इस बीमारी का प्रकोप बढ़ेगा,
वेंटिलेटर की मांग बढ़ेगी। एक अनुमान के अनुसार अस्पताल में भर्ती कोरोना के 30 फीसदी मरीजों को यांत्रिक वेंटिलेटर की आवश्यकता होगी।

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एकमात्र उपाय सोशल कांटैक्ट खत्म करना

कोरोना वायरस से बचने का एकमात्र उपाय सोशल कांटैक्ट खत्म करना है। जिन देशों ने इस पर ध्यान नहीं दिया या देर से कदम उठाया उनको इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। अमेरिका में ही न्यूयॉर्क मे गवर्नर ने 30 हजार वेंटिलेटरों की मांग की है।

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एक सिम्पल मशीन

वेंटिलेटर का मूल काम देखें तो ये कोई बहुत जटिल मशीन नहीं है। ये एक तरह के पम्प होते हैं जो मरीज के फेफड़ों में ऑक्सिजन और हवा के फ्लो को कंट्रोल करते हैं। जब तक फेफड़े अपना काम खुद नहीं करने लगते तब तक ये मशीन उनको मदद करने के लिए जरूरी होती है। कोरोना वायरस बीमारी में जब संक्रमण गंभीर स्थिति में पहुँच जाता है तो फेफड़े निमोनिया से ग्रस्त हो कर 40 फीसदी या उससे भी कम काम करने लगते हैं।

नतीजतन रक्त को जरूरी ऑक्सिजन नहीं मिल पाती है। यहीं पर वेंटिलेटर काम आता है। एक मशीन के तौर पर वेंटिलेटर जटिल नहीं है लेकिन इसका काम बेहद बारीक होता है। ऑक्सिजन और हवा का सही मिश्रण और फ्लो तथा लगातार सही गति से काम करना बेहद जरूरी होता है।

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मशीन की जरा सी चूक मरीज की जान ले सकती है। इसीलिए इन मशीनों का निर्माण काफी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। कमर्शियल निर्माताओं के लिए वेंटिलेटर बनाने के बाद दो वर्षों तक का परीक्षण करना पड़ता है।

भारत में जरूरत

एक रिपोर्ट के अनुसार अगर भारत में बुरे हालत हुये तो 15 मई तक 1 लाख 10 हजार से 2 लाख 20 हजार के बीच वेंटिलेटरों की जरूरत पड़ेगी। आज देश में अधिकतम 57 हजार वेंटिलेटर हैं। इनमें कितने काम करने की स्थिति में ये कहना मुश्किल है। इसी कमी को पूरा करने के लिये आज देश में वेंटिलेटर निर्माण के अलावा आयात भी किया जा रहा है।

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देश में जरूरत सस्ते वेंटिलेटरों की ज्यादा जरूरत है। अभी भारत में चंद कंपनियाँ वेंटिलेटर बनाती हैं वह भी इंपोर्टेड पुर्जों से। इनकी एक मशीन की कीमत डेढ़ लाख रुपये है। इन कंपनियों ने अपना प्रोडक्शन दोगुना कर भी दिया है। इसके अलावा इन कंपनियों ने मारुति, महिंद्रा, टाटा मोटर्स, हुंदई, और कल्याणी ग्रुप के साथ वेंटिलेटर निर्माण के लिए उनके कारखानों के इस्तेमाल करने का करार भी किया है।

वेंटिलेटर बनाने का काम मैसूर स्थित स्कानरे टेक्नालजी, नई दिल्ली की आगवा हेल्थकेयर, वडोदरा स्थित एबी इंडस्ट्रीज़, चेन्नई की एयर लिक्विड मेडिकल सिस्टम्स, मुंबई की एवीआई हेल्थकेयर, अहमदाबाद की लाइफ लाइन बिज़ और ठाणे की मेडिओन हेल्थकेयर करती हैं। इन सबने मिलकर फरवरी में 2500 वेंटिलेटर बनाए थे। मार्च में उत्पादन दोगुना हो कर 5580 यूनिट्स हो गया है। मई के अंत तक 50 हजार यूनिट्स प्रतिमाह उत्पादन का लक्ष्य है।

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कई तरह की मशीनें बनाने का काम

सरकार और उद्योग जगत वेंटिलेटर की कमी को पूरा करने के लिए दो-तीन अलग अलग तरह के मॉडेल पर काम कर रहा है। इनमें सस्ता रेस्पिरेटर, मल्टी पेशेंट वेंटिलेटर और आईसीयू मॉडेल शामिल हैं। पुणे में युवा इंजीनियरों के टीम 30 हजार वेंटिलेटर बनाने में जुटी है। इस कंपनी का लक्ष्य 50 हजार रुपये कीमत का वेंटिलेटर बनाने का है।

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